भविष्य की बात कौन नहीं जानता चाहता! आम जीवन में लोग इस कुतूहल को शांत कर थोड़ा आश्वस्त हो जाते हैं, जबकि शेयर बाज़ार में लोग इससे नोट बनाना चाहते हैं। लेकिन पक्की बात यह है कि भविष्य के बारे में भगवान भी कुछ पक्का नहीं कह सकता। उसको लेकर महज कयास लगाए जा सकते हैं। शेयर बाज़ार में इसे ही सट्टेबाज़ी या सटोरियापन कहते हैं। लेकिन ट्रेडिंग इससे आगे की चीज़ है। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

बाज़ार फिलहाल ढलान पर है। ठीक पिछले एक साल में बीएसई सेंसेक्स 13.04% गिरा है, जबकि स्मॉल कैप सूचकांक 4.66% ही गिरा है। सेंसेक्स 18.15 के पी/ई अनुपात पर ट्रेड हो रहा है, जबकि स्मॉल कैप सूचकांक 56.25 के पी/ई पर। ऐसे में बाज़ार में आगे छोटी कंपनियों के शेयरों का बुलबुला फट सकता है। इसलिए सावधान रहने की ज़रूरत है। पर, अच्छी छोटी कंपनियों के आने का क्रम बना रहता है। ऐसी ही एक अच्छी कंपनी…औरऔर भी

स्टॉक्स को चुनने व समझने में टेक्निकल चार्ट काम आते हैं। लेकिन चार्ट अपने-आप में पर्याप्त नहीं क्योंकि वे पुराने भावों से बनते हैं और, हम समय में पीछे जाकर ट्रेड नहीं कर सकते। चार्ट की उपयोगिता यह है कि हम उससे अंदाज़ा लगा सकते हैं कि कोई स्टॉक कमज़ोर हाथों (डे-ट्रेडरों व सटोरियों के हाथों) से मजबूत हाथों (इनसाइडरों, प्रॉपराइटरी ट्रेडरों व संस्थाओं) में जा रहा है या स्थिति इससे उलट है। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

खुद को बड़ा उस्ताद बताने वालों के पास असल में कोई नई खबर नहीं होती। होती भी है तो बहुत पहले पिट चुकी होती है। खुद का उल्लू सीधा करना ही इनका मकसद है। इसलिए इनके किसी भी संदेश को तवज्जो नहीं देना चाहिए। ऐसे टिप्स देने वाले तो आजकल सोशल मीडिया पर भी छाने लगे हैं। उन्हें छोड़िए। अपना सिस्टम बनाइए। काम के 10-15 स्टॉक्स चुनिए, उनका स्वभाव समझिए और ट्रेड कीजिए। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

सनसनी महज न्यूज़ चैनलों पर ही नहीं, शेयर बाज़ार में भी फैलाई जाती है। स्मार्टफोन से खटाखट संदेश भेजे जाते हैं। अब तो व्हाट्स अप का ज़माना है। किसी वाहियात कंपनी का नाम लेकर बताते हैं कि बड़ा ब्रोकिंग हाउस उस पर खरीद रिपोर्ट जारी करनेवाला है। रिपोर्ट आते ही 22 रुपए से अगले हफ्ते यह शेयर 50 तक पहुंच जाएगा। इसलिए फटाफट खरीद लें। वरना पछताएंगे। उनकी इस चाल में फंसे बगैर देखें बुध की बुद्धि…औरऔर भी

बाज़ार में अफवाह फैलाने के पीछे शोबाज़ मानसिकता के ही लोग होते हैं। दिखाते ऐसे हैं कि रतन टाटा, मुकेश अंबानी या कुमारमंगलम बिड़ला तक इनकी सीधी पहुंच हो। वित्त मंत्रालय के आला अधिकारियों और वित्त मंत्री अरुण जेटली को तो ये लोग जेब में लिए टहलते हैं। असल में ये लोग मानसिक रूप से बीमार होते हैं। इसलिए हमें न तो उनका अपमान करना चाहिए, न ही उन्हें कोई अहमियत देनी चाहिए। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

हमारे समाज में बहुतेरे लोग आदतन खुद को तोप-तमांचा साबित करने में लगे रहते हैं। जानते नहीं कि मैं कौन हूं? ऐसे जुमले आपने भी बराबर सुने होंगे। यही लहज़ा शेयर बाज़ार से जुड़े लोगों में भी नज़र आता है। डंके की चोट पर बताते हैं कि फलांना शेयर कहां तक जानेवाला है। दरअसल, इस हवाबाज़ी के पीछे खुद को महत्वपूर्ण बताने की मानसिकता काम कर रही होती है। इन्हें किनारे रखकर देखें अब सोम का व्योम…औरऔर भी

मंगलम ड्रग्स में हमने निवेश की पहली सलाह पांच साल पहले जब 22 नवंबर 2010 को दी थी, तब उसका शेयर 20 रुपए पर था। 1 जनवरी 2015 तक वो वहीं अड़ा रहा। लेकिन वहां से उठा तो 8 दिसंबर तक 20 से सीधे 441 तक पहुंच गया। फिर गिरा तो महीने भर में 261 तक पहुंच गया। फिर भी 2015 में 1205% का सर्वाधिक रिटर्न इसी शेयर ने दिया है। अब आज का तथास्तु…और भीऔर भी

हम हाई-फ्रीक्वेंसी या अल्गोरिदम ट्रेडिंग से आक्रांत रहते हैं। भूल जाते हैं कि उन्नत से उन्नत सॉफ्टवेयर भी इंसान को मात नहीं दे सकता। हम आक्रांत रहते हैं कि संस्थाएं और एचएनआई करोड़ों में खेलते हैं, जबकि हम उनके सामने पिद्दी भी नहीं हैं। लेकिन हर कमज़ोरी में कोई न कोई ताकत छिपी होती है। जिस तरह हाथी को मुड़ने में वक्त लगता है, वैसे ही संस्थाएं छोटे सौदों से नहीं कमा पातीं। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

पूंजी, दरअसल हमारी बड़ी सीमा है। हम ऑप्शंस खरीदते हैं क्योंकि उसमें कम पूंजी लगती है। लेकिन हकीकत यह है कि ऑप्शंस खरीदना अक्सर घाटे का सौदा होता है। रिसर्च से पता चला है कि ऑप्शंस के दाम अमूमन औकात से ज्यादा चढ़े होते हैं। इसलिए फायदा उन्हें बेचने या राइट करने में है, न कि खरीदने में। लेकिन ऑप्शंस बेचने के लिए कम से कम 5 लाख रुपए की पूंजी होनी चाहिए। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी