दो महीने पहले 7 सितंबर को 52 हफ्तों का शिखर छूनेवाला निफ्टी अब तक 7.5% गिर चुका है। संभव है कि दिसंबर में अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ने से यह और गिर जाए। लेकिन इसी दौरान मजबूत शेयर कुलाचें मार रहे हैं। हम आज तथास्तु में जो कंपनी उठा रहे हैं, उसका शेयर जून में 60 के आसपास था। अभी 300 रुपए के करीब है। बाज़ार में सतह के नीचे की इन अंतर्धाराओं को पकड़ना ज़रूरी है।औरऔर भी

आप सामान्य ट्रेडर हैं, आपके पास पांच लाख रुपए से कम पूंजी है तो शेयर बाज़ार में शॉर्ट सौदों से परहेज़ करें। सुनने में बड़ा अच्छा लगता है कि कुशल ट्रेडर बाज़ार में उठने या गिरने, दोनों ही सूरत में कमाता है। लेकिन गिरने पर कमाना बड़ी पूंजीवालों के लिए ही संभव है। एक तो ऐसे सौदे डेरिवेटिव सेगमेंट में ही संभव हैं। दूसरे इंट्रा-डे में की जानेवाली मार्जिन ट्रेडिंग बहुत रिस्की है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

बराबर बढ़ रहा शेयर जब मुनाफावसूली के चलते गिरता है, जिसे टेक्निकल शब्दावली में रिट्रैसमेंट कहते हैं, तब उसे खरीद लेना चाहिए। यहां ध्यान रखना पड़ता है कि उसमें पूरा रिट्रैसमेंट हुआ है या नहीं। इसमें हड़बड़ी नहीं करनी चाहिए। जब वो संस्थाओं या प्रोफेशनल ट्रेडरों की खरीद से उठने लगे और इसकी पुष्टि भी हो जाए, तभी हमें उसे खरीदना चाहिए। हम यह भी पता लगाएं कि ब्रेकआउट ट्रेड क्या होते हैं। अब गुरु की दशादिशा…औरऔर भी

ज्यादा ट्रेडिंग वाली कंपनियों की संख्या भी सैकड़ों में होती है। हर दिन उनकी चाल को परखना अल्गोरिदम ट्रेड करने वाली संस्थाओं के लिए ही संभव है, आम ट्रेडरों के लिए नहीं। ऐसे में हमें दो-तीन साल से लगातार बढ़ रहे शेयरों की सूची बना लेनी चाहिए। इनमें से 40-50 ऐसी कंपनियां छांट लेनी चाहिए जिनका बिजनेस भी बराबर अच्छा चल रहा हो। बढ़ता शेयर मुनाफावसूली के बाद गिरे तो पकड़ लेना चाहिए। अब बुध की बुद्धि…औरऔर भी

हमेशा के लिए एक बात गांठ बांध लें कि ट्रेडिंग में सफलता का मूल मंत्र है न्यूनतम रिस्क में अधिकतम लाभ कमाने की कोशिश। हर दिन लगभग 1700 कंपनियों में ट्रेडिंग होती है। हर किसी को आजमाने लगेंगे तो कोई फैसला ही नहीं कर पाएंगे। इसलिए ट्रेडिंग के लिए अमूमन वही कंपनियां चुननी चाहिए जिनमें ज्यादा कारोबार होता है। ऐसी कंपनी किसी न किसी सूचकांक में शामिल हो तो ज्यादा अच्छा है। अब पकड़ें मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

लंबे निवेश के लिए शेयर चुनना ज्यादा मुश्किल नहीं है। कंपनी के धंधे का इतिहास, बिजनेस मॉडल और भावी संभावनाओं वगैरह को देखकर चुन सकते हैं। इसमें कई अनुपात हमारी मदद कर देते हैं। लेकिन ट्रेडिंग के लिए शेयर चुनना काफी मुश्किल है। लेकिन इसका बड़ा आसान समाधान है कि जब मुश्किल लगे तो ट्रेडिंग ही नहीं करनी चाहिए। डॉक्टर ने तो कहा नहीं है कि हर दिन ट्रेडिंग करना ज़रूरी है। अब परखें सोमवार का व्योम…औरऔर भी

अपना समाज मूल्य को लेकर बड़ा सतर्क रहा है। तभी इसके लिए अंग्रेज़ी में दो ही शब्द हैं वैल्यू और प्राइस। लेकिन अपने यहां इसके लिए कम से कम चार शब्द हैं दाम, कीमत, मूल्य और भाव। मूल्य का थोड़ा व्यापक और सकारात्मक अर्थ है। उसका इस्तेमाल जीवन मूल्यों के संदर्भ में भी किया जाता है। भाव बाज़ार तय करता है, जबकि कीमत और दाम में हम मोलतोल कर सकते हैं। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी

हर बिजनेस की तरह ट्रेडिंग में पूंजी लगती है। कितनी? यह रिस्क लेने की क्षमता पर निर्भर है। डेरिवेटिव सेगमेंट में एक लॉट 5 लाख रुपए का है तो उसके लिए पांच लाख रुपए से कम नहीं। वहीं, कैश सेगमेंट में ट्रेडिंग के लिए न्यूनतम एक लाख रुपए होने चाहिए। नियमतः शेयर बाज़ार के लिए रखे धन का 5% ही ट्रेडिंग में लगाना चाहिए। यानी, 20 लाख रुपए अतिरिक्त हों, तभी ट्रेडिंग करें। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

जिस तरह बिना लागत लगाए कोई बिजनेस नहीं हो सकता, उसी तरह वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग में स्टॉप-लॉस या घाटे से नहीं बचा जा सकता। आप कितनी भी अच्छी ट्रेडिंग रणनीति बना लें, महंगी से महंगी सेवा ले लें, उसमें चूक का होना लाजिमी है। इसलिए रणनीति को बराबर मांजते रहना पड़ता है और उस पर अनुशासन में बंधकर अमल करना होता है। यहां मन की नहीं, बुद्धि की सुननी पड़ती है। अब पकड़ें गुरुवार की दशादिशा…औरऔर भी

नया संवत मांग करता है कि हम कुछ मूलभूत सबक दोहरा लें। सबसे पहली बात याद रखें कि वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग एक तरह का बिजनेस है। हर बिजनेस की तरह ही इसमें मेहनत, बुद्धि व समय के साथ आमदनी व लागत का पूरा हिसाब-किताब रखना पड़ता है। जो ट्रेड सही पड़ते हैं, उनसे मिला लाभ इस धंधे की आमदनी है। वहीं, जो सौदे उलटे पड़ते हैं, उनमें लगा स्टॉप-लॉस इसकी लागत है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी