संघे-शक्तिः कलियुगे। आज जिसके पास संगठन और समूह है, वही जीतता है। अक्सर ट्रेडिंग में अकेले पड़ जाने के बाद हमें भी ऐसा लगता है। हम किसी न किसी ग्रुप से जुड़ने की फिराक में पड़ जाते हैं। कहीं नहीं तो फेसबुक जैसी सोशल वेबसाइट्स पर ही ग्रुप बना लेते हैं। लेकिन इससे ट्रेडिंग की सफलता में सचमुच हमें कुछ फायदा मिलता है या इसमें भी अच्छी-बुरी संगत से फर्क पड़ता है? अब परखें मंगलवार की बुद्धि…औरऔर भी

होली का रंग हर साल निखरता है। लेकिन धन का रंग हर साल उड़ता क्यों जाता है? वजह साफ है कि होली को हमारी खुशियों की तमन्ना का साथ मिलता है, जबकि धन को मुद्रास्फीति या हमारा गलत निवेश खोखला कर देता है। धन को अगर अच्छे बिजनेस या अच्छा बिजनेस करती कंपनी में लगाया जाए तो वह सालों-साल बढ़ता जाता है। तथास्तु में आज ऐसी कंपनी जो चार साल में निवेश पांच गुना बढ़ा चुकी है…औरऔर भी

एकांगी सोच से जीवन में कभी सफलता नहीं मिलती। वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग में भी अगर आप केवल अपनी सोचेंगे तो सफल नहीं होंगे। बराबर समझने की कोशिश करें कि अगर आप खरीदने पर आमादा हैं तो सामने कौन है जो बेचने को आतुर है। दोनों को क्यों ऐसा करने में फायदा दिखता है! ध्यान रखें कि बाजार में हमेशा अनजान लोगों का धन जानकारों के खाते की तरफ बहता है। अब करते हैं शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में वही ट्रेडर बराबर मुनाफा कमाते हैं जो किसी स्टॉक में मांग व सप्लाई के असंतुलन को सही ढंग से पकड़ पाते हैं। यह असंतुलन हमारे-आप जैसे रिटेल ट्रेडरों की खरीद-बिक्री से नहीं, बल्कि बैंक, वित्तीय संस्थाओं व हाई नेटवर्थ व्यक्तियों की चाल से बनता है। उस्ताद ट्रेडर इसके लिए टेक्निकल एनालिसिस से इतर तरीके अपनाते हैं। वे उस स्टॉक के फ्यूचर्स के बदलते ओपन इंटरेस्ट पर भी ध्यान देते हैं। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

अन्य बाज़ारों की तरह शेयर बाजार में भी मांग व सप्लाई का संतुलन बनता-बिगड़ता रहता है। आप कहेंगे कि हर कंपनी के जारी शेयरों की संख्या बंधी रहती है। प्रमोटर के हिस्से को हटाकर कंपनी का फ्लोटिंग स्टॉक भी बंधा रहता है। ऐसे में नई मांग आ सकती है। लेकिन नई सप्लाई कहां से आएगी। असल में बाज़ार में लगाकर भूल जानेवाले निवेशक काफी कम हैं। बाकी ज्यादातर निकालते व लगाते रहते हैं। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

बाज़ार में चीजों के दाम चलते, बढ़ते व गिरते क्यों रहते हैं? वे एक जगह चिपककर क्यों नहीं रहते? ऐसा इसलिए क्योंकि बाज़ार में उस चीज़ की मांग व सप्लाई में बराबर असंतुलन बना रहता है। संतुलन तक पहुंचते-पहुंचते फिर नया असंतुलन बन जाता है और भाव चल निकलते हैं। पुराने समय में भाप से चलनेवाले रेल इंजिनों के पहियों पर एक तरफ धातु का वक्र टुकड़ा लगाकर असंतुलन पैदा किया जाता था। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

वैसे तो शेयर बाजार की ट्रेडिंग कच्चे दिलवालों या नौसिखिया लोगों के लिए नहीं है क्योंकि इसमें ऐसे घाघ व मंजे हुए खिलाड़ी घात लगाए बैठे हैं जो बेपरवाह व ‘नए मुल्लों’ को चुटकी में हज़म कर जाते हैं। इसलिए नए लोगों को अक्सर हमारी सलाह यही रहती है कि पहले आप साल-दो साल के निवेश को आजमाकर देखें। फिर भी ट्रेडिंग करनी है तो इसमें इफरात पूंजी का केवल 5% हिस्सा लगाएं। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

कहते हैं कि लंबे समय का निवेश फलदायी होता है। यह भी मानते हैं कि स्मॉल-कैप कंपनियां कई गुना रिटर्न देती हैं। पर, बीएसई स्मॉल-कैप सूचकांक 31 दिसंबर 2007 से 3 मार्च 2017 के बीच 13,348.37 से महज 2.03% बढ़कर 13,620.17 पर पहुंचा है। यानी, इस सूचकांक में दस साल पहले लगाए गए आपके 100 रुपए अभी तक मात्र 102 रुपए हुए होते। इसलिए मिथकों में फंसकर निवेश सफल नहीं होता। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी

याद रखें कि आज तक ट्रेडिंग का ऐसा कोई तरीका नहीं निकाला गया है जो 100% कामयाबी की गारंटी दे सके। वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग प्रायिकता का खेल है। इसलिए यहां हमेशा घाटे को न्यूनतम रखने के लिए स्टॉप-लॉस व पोजिशन साइजिंग जैसे तरीके अपनाए जाते हैं। इधर, हमारे सीखते जाने का सिलसिला जारी है। हाल ही में आरएसआई के 20% से नीचे चले जाने और ओपन इंटरेस्ट का नया तरीका सीखा है। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

हम आपके लिए जो भी स्टॉक चुनते हैं, उसके मूल में रहता है कि किसी स्टॉक में संस्थागत ट्रेडर कहां पर एंट्री और एक्जिट ले सकते हैं। इसके लिए हम मुख्य रूप से कैंडल के आकार, स्थान, मूविंग औसत और आरएसआई जैसे गिने-चुने इंडीकेटरों का इस्तेमाल करते हैं। साथ ही भावों की चाल को चार्ट पर अलग-अलग टाइमफ्रेम में देखते हैं। चार्टिंग का सॉफ्टवेयर हम बीएसई व एनएसई का ही इस्तेमाल करते हैं। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी