वजह चाहे जो हो, दहाई अंक के विकास का सपना 2018-19 की आखिरी तिमाही तक आते-आते जीडीपी के 5.8% बढ़ने तक सिमट गया। यह पांच साल की न्यूनतम विकास दर है। सरकार ने चुनावों के बाद आखिरकार मान लिया कि बेरोजगारी 45 सालों के उच्चतम स्तर तक पहुंच चुकी है। पांच सालों से देश का निर्यात जहां का तहां अटका रहा, वहीं घरेलू बचत दर 24% से घटकर 17% पर आ चुकी है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

पांच साल पहले मोदी सरकार आई तो लगा कि जल्दी ही वह अर्थव्यवस्था की विकास दर को दहाई अंक में ले जाएगी। 2014-15 की आर्थिक समीक्षा में तो बाकायदा ऐलान कर दिया गया कि भारत उस ऐतिहासिक मुकाम पर आ गया है जहां से वह दस प्रतिशत से ऊपर की विकास यात्रा शुरू कर सकता है। लेकिन फरवरी 2015 में की गई यह घोषणा बाद के चार सालों में दिवास्वप्न बनकर रह गई। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

अर्थव्यवस्था के सारे इंजिनों को एकसाथ फायर करनेवाले बजट की तारीख आ ही गई। फरवरी में तो अंतरिम बजट आया था जिसका मकसद चुनावों में सरकार की हवा बनाना था। मोदी सरकार की बम्पर जीत के बाद समूचे देश की उम्मीदें चरम पर हैं। कॉरपोरेट से लेकर व्यापारी, नौकरीपेशा लोग, किसान व गरीब तक अब हवा-हवाई नहीं, ठोस काम की उम्मीद लगाए बैठे हैं। वित्त मंत्री के सामने इस बार बड़ी चुनौती है। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

अर्थव्यवस्था की लटें शिव की जटाओं की तरह उलझी हुई हैं। एक लट खुलते ही गंगा बह निकलती है। अर्थव्यवस्था की लटें भी जितनी अच्छी तरह खोली जाएं, देश में विकास की गंगा उतनी ही बेधड़क बहने लगती है। हर साल बजट इन्हीं लटों को खोलने का काम करता है। देखना यह है कि पांच साल के कदमताल के बाद मोदी सरकार नए कार्यकाल के पहले बजट में क्या करती है। तथास्तु में एक और संभावनामय कंपनी…औरऔर भी

मुश्किल यह है कि शेयर बाज़ार में लाख पारदर्शिता के बावजूद हम देख नहीं सकते कि हमारे सौदे के सामने कौन है। हम खरीद रहे तो कौन बेच रहा है और हम बेच रहे हैं तो खरीद कौन रहा है। लेकिन दैनिक व साप्ताहिक चार्ट पर भावों का पैटर्न देखकर सोचा-समझा अंदाज़ा लगाया जा सकता है। ऐसे पैटर्न की समझ हमें न्यूनतम रिस्क में जीत की अधिकतम संभावनावाले सौदे पकड़ना सिखा सकती है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

सौदा करने से पहले सबसे ज़रूरी बात है यह समझना कि हम खरीद रहे हैं तो सामने से बेच कौन रहा है। लगे कि संस्थाएं या प्रोफेशनल ट्रेडर सामने से बेच रहे हैं तो फौरन सौदे से हाथ खींच लेना चाहिए क्योंकि तब हमारा दांव उल्टा पड़ने की आशंका बहुत ज्यादा नहीं, शत-प्रतिशत है। वहीं, अगर रिटेल ट्रेडर हमारा सौदा पूरा कर रहा है तो समझिए कि सफलता की संभावना बहुत ज्यादा है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

परम्परागत सोच से बाहर निकलने का सीधा-सरल तरीका यह है कि हम भावों के चार्ट को परखकर समझें कि डिमांड-सप्लाई का नियम क्या कह रहा है। अगर लगे कि उस वक्त के भाव पर बैंक, वित्तीय संस्थाएं व प्रोफेशनल निवेशक खरीद कर सकते हैं तो हमें भी खरीद का फैसला लेना चाहिए। वहीं, अगर शेयर सप्लाई ज़ोन में हो और संस्थागत निवेशक बेचकर मुनाफा कमाने की स्थिति में नजर आएं तो बेचना चाहिए। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में उतरे ज्यादातर रिटेल ट्रेडर घाटा खाते हैं क्योंकि वे पारम्परिक सोच से बाहर नहीं निकल पाते। वे भावनाओं को अपने फैसले पर हावी होने देते हैं। बाज़ार जब काफी चढ़ चुका होता है और हर तरफ खरीदने-खरीदने का हल्ला होता है तो वे शोर का शिकार बनकर खरीदने लग जाते हैं और बाज़ार जब काफी गिर चुका है तो बेचने-बेचने के शोर में खुद भी घबराकर बेचने लग जाते हैं। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

चढ़े हुए शेयर बाज़ार में बहुत ज्यादा तेज़ी का मानसिकता उसके बढ़ने के लिए कतई अच्छी नहीं होती क्योंकि ज्यादा भाव के कारण तब कम से कम लोग खरीदने को उत्सुक होते हैं। उनकी खरीद तभी शुरू सकती है जब भाव गिरकर वाजिब स्तर पर आ जाएंगे। वाजिब स्तर मतलब वहां जहां समझदार निवेशकों को लगता है कि अब किसी शेयर के लिए दिया गया भाव उसके वाजिब मूल्य से काफी कम है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

बड़ी व ब्लूचिप कंपनियों के शेयर चढ़ते जा रहे हैं, जबकि स्मॉल व मिडकैप कंपनियों के शेयर ज़मीन से उठ नहीं पा रहे। यह सिलसिला जनवरी 2018 के बाद से बदस्तूर जारी है। खास वजह यह है कि अर्थव्यवस्था के मुश्किल वक्त में निवेशकों को ब्लूचिप कंपनियों में सुरक्षा दिखती है, जबकि छोटी व मझोली कंपनियों में खतरा। लेकिन वक्त सुधरते ही शीर्ष सूचकांकों से बाहर पड़ी कंपनियां भी चमक सकती हैं। तथास्तु में एक संभावनामय कंपनी…औरऔर भी