वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग ऐसा धंधा है जहां कुछ लोग कमाते और ज्यादातर लोग गंवाते हैं। हालांकि इधर स्थिति सुधरती जा रही है। लेकिन अब भी गंवानेवालों का अनुपात बहुत ज्यादा है। आठ-दस साल पहले तक हालत यह थी कि शेयर, कमोडिटी व फॉरेक्स बाज़ार में 95% गंवाते और केवल 5% कमाते थे। अब यह अनुपात थोड़ा सुधरकर 88% और 12% का हो गया है। लोग जितना जानते जाएंगे, गंवानेवाले उतना घटते जाएंगे। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग का नाम बहुतों ने सुना होगा। लेकिन उसे जानने व समझनेवालों की संख्या बहुत सीमित है। सबको लगता है कि यह गंगा की निर्मल धारा है जिसमें से जब चाहा, तब कुछ लोटा या बाल्टी पानी निकाल लिया। बात काफी हद तक सही है। लेकिन यह गंगा की धारा नहीं, यक्ष के उस तालाब की तरह है जहां प्रश्नों का उत्तर जाने बगैर आपको जीवन नहीं, मृत्यु मिलती है। अब मंगलवार की दृष्टि…और भीऔर भी

एक जमाना था, जब लोग अपनी धन-संपदा तिजोरियों में, ज़मीन के नीचे या दीवारों में छिपाकर रखते थे। लेकिन आज धन-संपदा बहती हुई धारा बन गई है। जिनमें हुनर है वे उस धारा में से जब चाहें, मनचाही मात्रा निकाल लेते हैं और जिनमें ऐसा हुनर नहीं है, वे अपनी टूटी किस्मत का रोना रोते रह जाते हैं। वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग बहती धारा से धन निकालने का ऐसा ही एक ज़रिया है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

जब भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर घनघोर निराशा की ही खबरें आ रही हों, तब दुनिया के सबसे अमीर शख्स बिल गेट्स ने कहा है कि अगर सरकार स्वास्थ्य व शिक्षा को प्राथमिकता देते हुए ‘उत्साही तरीके’ से निवेश करे तो भारत अगले एक दशक में बहुत तेज़ी से आर्थिक विकास कर सकता है। अन्य जानकार भी यही मानते हैं कि बिना मानव पूंजी के देश आगे नहीं बढ़ सकता। फिलहाल तथास्तु में लीक से हटकर एक कंपनी…औरऔर भी

कहां तो अर्थव्यवस्था को हर साल कम से कम 8% की दर से बढ़ना था और कहां उसकी विकास दर 4-5% तक गिर गई। वह भी तब, जब जीडीपी की गणना का तरीका बदल दिया गया। राजनीति में लंबी जुबान या लफ्फाजी चल जाती है। लेकिन अर्थनीति में बड़बोलापन करोड़ों लोगों की ज़िंदगियां तबाह कर देता है। नोटबंदी ने जिन लाखों छोटे उद्योगों की कमर तोड़ी, वे आज तक नहीं उठ पाए हैं। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

प्रधानमंत्री मोदी ने साल 2024 तक भारत को 5 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का दावा कर रखा है। ये उसी तरह का दावा है जैसे साल 2022 तक किसानों की आय को दोगुनी करने था। हकीकत यह है कि पिछले पांच सालों में किसानों की आय घटती जा रही है। लेकिन व्यापक अर्थव्यवस्था के साथ ऐसा होने का मतलब है भारत की सारी चमक का उड़ जाना और बेरोजगारी की महामारी। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

देश की अर्थव्यवस्था की हालत की समग्र तस्वीर पेश करता है सकल घरेलू उत्पाद या जीडीपी। चालू वित्त वर्ष की जून तिमाही में साल भर पहले की समान अवधि की तुलना में यह 5% बढ़ा था जो 24 तिमाहियों की न्यूनतम विकास दर थी। लेकिन सितंबर तिमाही की विकास दर इससे भी बदतर होने का अंदेशा है। एसबीआई के 4.2% के बाद नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लायड इकनॉमिक रिसर्च का अनुमान 4.9% का है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

जो एसबीआई पहले सरकार का पक्ष लेकर अभी तक अर्थव्यवस्था की हालत अच्छी बताता रहा था, वह भी अब अपना टेम्पो नहीं बनाए रख पा रहा है। वह सबसे बड़ा बैंक और सरकारी ही नहीं, सरकार के सारे खाते संभालने वाला बैक भी है। जहां सब उम्मीद कर रहे थे कि पहली तिमाही में 5% तक डूबी विकास दर दूसरी तिमाही में 5.5% हो सकती है, वहीं एसबीआई का अनुमान 4.2% का है। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

इस बार का त्योहारी सीज़न खराब रहा। आम उपभोक्ता से लेकर उनके लिए सामान बनानेवाली कंपनियों के लिए। फिर भी इसे तात्कालिक मामला मानकर छोड़ा जा सकता है। लेकिन जब देश मे डीजल से लेकर बिजली तक की मांग घट रही हो और आंकड़े इसकी तस्दीक कर रहे हों तो यह गंभीर चिंता का मसला बन जाता है। शेयर बाज़ार भले ही ऊपर से बेफिक्र दिखे, लेकिन अंदर-अंदर उसकी भी हालत खराब है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

शेयर बाज़ार बड़ा ही दगाबाज़ है। पूरा सोच-समझकर रिसर्च के बाद आपने निवेश के लिए अच्छी कंपनियां चुनीं। लेकिन बाज़ार जब उनके शेयरों को दबा डालता है, तब आपको सारी समझ व सावधानी पर संदेह होने लगता है। आपको लगता है कि आपने भारी गलती कर दी। लेकिन जब बाजार आपके विश्वास को यूं तोड़ रहा हो, अक्सर वही वक्त पूरे विश्वास के साथ खड़े हो जाने का होता है। अब तथास्तु में आज की दमदार कंपनी…औरऔर भी