सरकार अगर सुनने व गुनने को तैयार हो तो संकट से निकलने की सटीक राह बतानेवालों की कोई कमी नहीं है। तमाम अर्थशास्त्री बराबर लिखते रहे हैं। इनके सुझावों का सार यह है कि अभी तक हम देश के शीर्ष 10-15 करोड़ लोगों को ध्यान में रखकर उत्पादन करते रहे हैं। अर्थव्यवस्था का फोकस विदेश के बजाय अगर 125 करोड़ लोगों के घरेलू बाज़ार पर हो तो देश का उद्धार हो सकता है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

सरकार के मंत्री-संत्री और मुख्य आर्थिक सलाहकार तक कह रहे हैं कि चीन के संकट का भारतीय अर्थव्यवस्था पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा, बल्कि इससे हमें निर्यात के नए अवसर मिल जाएंगे। लेकिन हकीकत यह है कि चीन हमारा सबसे बड़ा व्यापार भागीदार है। हम उसे कार्बनिक रसायन, यार्न, धातु अयस्क, भवन सामग्री व कपास का निर्यात करते हैं। चीन की अभी की स्थिति से हमें 34.8 करोड़ डॉलर का नुकसान होगा। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

ग्लोबल दुनिया के झटके भारत को भी बराबर तेज़ी से लग रहे हैं। अमेरिका ने घबराकर एक पखवाड़े में दूसरी बार ब्याज दर घटा दी। उधर चीन का आंकड़ा आया कि वहां औद्योगिक उत्पादन में तीन दशकों की सबसे ज्यादा कमी आ गई है। इससे भारत के वित्तीय बाज़ार हिल गए। रिजर्व बैंक ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की। लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। सरकारी बांडों पर यील्ड घट गई। शेयर बाज़ार गोता लगा गया। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

दुनिया में कोरोना वायरस का कहर जारी है। लेकिन क्या वित्तीय बाज़ारों से उसका काला साया अब उठ गया है? क्या उसे जितनी उथल-पुथल मचानी थी, वह अब बीत चुकी है? यह सवाल इस समय हर तरफ पूछा जाने लगा है। वैसे, इस हकीकत से इनकार नहीं कि शेयर बाज़ार में डर का कोप इस समय ग्यारह साल के सर्वोच्च स्तर पर पहुंचा हुआ है। उसने सामान्य स्तर तक आने में वक्त लगेगा। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

सब कुछ आराम से चले तो उसे शेयर बाज़ार नहीं कहते। बीते हफ्ते के आखिरी दो दिन देश-दुनिया के बाज़ारों में जैसा हुआ, उसने 1987 के काले सोमवार की याद दिला दी। तब अमेरिका का डाउ जोन्स सूचकाक एक दिन में 22.6% गिर गया था। शुक्रवार को निफ्टी 10% गिरा तो निचला सर्किट लग गया। फिर उठा तो 3.81% बढ़कर बंद हुआ। एक दिन में 1600 अंक या 16% का चक्कर! अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने कोरोना वायरस को सर्वव्यापी महामारी घोषित कर दिया है। दुनिया का कोई भी देश इसकी चपेट में आने से नहीं बचा है। जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल ने तो यहां तक कह दिया है कि जर्मनी में रह रहे 70% लोग इसके शिकार हो सकते हैं। भारत में भी इसके मामले दिन-ब-दिन बढ़ते जा रहे हैं। इस महामारी का डर समूची विश्व अर्थव्यवस्था पर कहर बनकर बरपा है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

अर्थव्यवस्था अगर 1991 जैसी हालत में पहुंच गई है तो यह बुरी खबर के साथ अच्छी खबर भी है क्योंकि देश ने संकट से उबरने के लिए आर्थिक सुधारों का दौर तभी शुरू किया था। इसलिए प्रचंड बहुमत वाली मोदी सरकार चाहे तो मुख्य़तः विदेशी माल व पूंजी को छूट देनेवाले आर्थिक सुधारों के दायरे से बाहर निकल अब घरेलू बाज़ार पर केंद्रित कर सकती है और विकास को गति दे सकती है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…और भीऔर भी

ठीक उस वक्त, जब लग रहा था कि हमारी अर्थव्यवस्था बुरे दिनों को पीछे छोड़कर नया उभार पकड़ने जा रही है, तभी कोरोना वायरस के विश्वव्यापी प्रकोप ने सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। उसकी हालत अब चाकू की धार पर चलने जैसी हो गई है। ज़रा-सा चूके तो सीधे गहरी घाटी में। कुछ आलोचक तो यहां तक कहने लगे हैं कि अर्थव्यवस्था की हालत 1991 के आर्थिक संकट जैसी हो गई है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

कोरोना वायरस का कहर थम नहीं रहा। ऑस्ट्रेलिया के राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के एक अध्ययन के अनुसार इससे दुनिया में 1.5 करोड़ लोगों की मौत हो सकती है और विश्व अर्थव्यवस्था को 2.4 ट्रिलियन डॉलर का नुकसान हो सकता है। इसकी सर्वाधिक मार  चीन के बाद भारत को लग सकती है। होली के मौके पर यह आशंका रंग में भंग न डाल सके, यही शुभकामना है। लेकिन सच का सामना तो करना ही पड़ेगा। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

डेढ़ साल पहले 24 अगस्त 2018 को यस बैंक का शेयर 404 रुपए के शिखर पर था। लेकिन 6 मार्च 2020 को 5.50 रुपए तक लुढ़क गया। सारी की सारी पूंजी लगभग स्वाहा। ऐसा तब हुआ, जब यस बैंक का पूंजी पर्याप्तता अनुपात मार्च 2019 में 16.5% और सितंबर 2019 में 16.3% रहा है जबकि बासेल-3 का अंतरराष्ट्रीय मानक 10.5% का है। यह है शेयरों में निवेश का रिस्क। फिर भी तथास्तु में आज एक और बैंक…और भीऔर भी