अमूमन छोटी कंपनियों के शेयर उछलते और बड़ी कंपनियों के शेयर मध्यम चाल से चलते हैं। दिसंबर 2017 में निफ्टी स्मॉलकैप-50 सूचकांक 57 के पी/ई अनुपात पर ट्रेड हो रहा था तो निफ्टी-50 सूचकांक 26 पर। लेकिन इधर यह रीत उलट गई। महीने भर पहले निफ्टी-50 सूचकांक 26.32 के पी/ई पर था तो स्मॉलकैप-50 कहीं नीचे 17.83 पर। शुक्रवार को ये सूचकांक क्रमशः 29.35 और 20.22 के पी/ई पर ट्रेड हुए। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी

डेरिवेटिव सेगमेंट के उन्हीं स्टॉक्स में ट्रेडिंग जिनमें दिन में कम से कम 3000 कॉन्ट्रैक्ट हों। ऐसा इसलिए क्योंकि रोज़ाना 375 मिनट ट्रेडिंग होती है। 3000 को 375 से भाग दें तो प्रति मिनट आठ कॉन्ट्रैक्ट। अगर स्टॉक में प्रति मिनट आठ सौदे भी न हो तो उसे भरपूर तरल नहीं माना जाएगा और खरीदने/बिड और बेचने/आस्क मूल्य में अंतर या इम्पैक्ट लागत अधिक होगी। इससे बचने के लिए 3000 कॉन्ट्रैक्ट की सीमा। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

टर्नओवर व तरलता के लिहाज से डेरिवेटिव सेगमेंट में शामिल 141 स्टॉक्स ट्रेडिंग के लिए सबसे मुफीद हैं। पर दिक्कत यह है कि इनमें से करीब आधे उतने सक्रिय नहीं रहते। जानकार सक्रिय स्टॉक्स को पकड़ने का पैमाना मानते हैं कि डेरिवेटिव सेगमेंट में चालू महीने में खत्म होने वाले उनके कम से कम 3000 कॉन्ट्रैक्ट होने चाहिए। एक लॉट में बहुत सारे शेयर। कई लॉट का एक कॉन्ट्रैक्ट। फिर ऐसे 3000 कॉन्ट्रैक्ट! अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

चाहे इंट्रा-डे ट्रेडिंग करें या स्विंग व मोमेंटम या पोजिशनल ट्रेड, स्टॉक्स चुनने का सबसे अहम पैमाना है उनमें भरपूर तरलता। एक्सचेंज में सबसे ज्यादा टर्नओवर वाले स्टॉक्स में ट्रेडिंग करेंगे तो आराम से उसमें घुसकर बाहर निकल आएंगे। निफ्टी-500 की पांच सौ कंपनियों में भी हर दिन बहुतों में ट्रेडिंग नहीं होती। इसलिए हमें दायरा और छोटा करना पड़ेगा। इसे एफ एंड ओ सेगमेंट में शामिल 141 कंपनियों तक समेट दें तो! अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

जानकार कहते हैं कि ट्रेडिंग हमें उन्हीं स्टॉक्स में करनी चाहिए जिनमें रोजाना का टर्नओवर कम से कम चार करोड़ रुपए का हो। दिक्कत यह है कि 2500 सक्रिय कंपनियों में से ऐसे स्टॉक्स कैसे चुनें? रेडीमेड तरीका है कि निफ्टी-50 और नेक्स्ट निफ्टी-50 में शामिल 100 स्टॉक्स को चुन लें। इनसे भी संतोष न हो तो निफ्टी-500 की पांच सौ कंपनियों को चुन लें। इनके बाहर जाने की कतई कोई ज़रूरत नहीं। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

अचानक कोई जान-पहचाना शेयर उछल जाए और उस पर नजर भी पड़ी हो तो लगता है कि काश! हमने इसमें ट्रेड किया होता तो एक ही दिन में 10% से ज्यादा कमा लेते। बीते हफ्ते इन्फोसिस और रैलिस इंडिया के साथ ऐसा ही हुआ। लेकिन अचानक होनेवाली चीज़ों को ट्रेडिंग के नियम में नहीं बांधा जा सकता। मोटेतौर पर ध्यान रखें कि ट्रेडिंग उन्हीं स्टॉक्स में करनी चाहिए जिनमें अच्छा-खासा टर्नओवर होता है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

कहते हैं, शेयर बाज़ार को कोई पकड़ नहीं सकता। पर उसका स्वभाव तो वहां सक्रिय इंसानों की हरकत से ही बनता है। इंसान लालच व डर की भावना और इनसे जुड़े एड्रेनलीन और कोर्टिज़ोल हॉर्मोन का वशीभूत होकर बाज़ार में उतरता है। तुरत-फुरत में ये भावनाएं और हॉर्मोन इंसान का माथा घुमा देते हैं। लेकिन लंबे समय में उसका दिमाग ठिकाने आ जाता है। शेयर बाज़ार का भी यही बर्ताव है। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी

कहना या बता देना बहुत आसान है। लेकिन करना कितना मुश्किल है, इसे सचमुच ट्रेडिंग करनेवाला ही जानता है। अनुमान गलत होने पर उसे भारी चपत लगती है। इससे बचने के लिए हमें वित्तीय बाज़ार का चौतरफा 360 डिग्री का नज़रिया रखना होता है। हर समय आंख, कान, दिमाग खुला रखना पड़ता है। इससे हम व्यापक तस्वीर बना सकते हैं। उसके बाद टेक्निकल व डेटा एनालिसिस से उसे फाइन ट्यून कर सकते हैं। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

शेयरों के दैनिक भाव खबरों के प्रति सबसे ज्यादा संवेदनशील होते हैं। लेकिन खबरों का पता रिटेल ट्रेडर को पहले से हो नहीं सकता। ऐसे में इंट्रा-डे ट्रेडर को मजबूरन भावों के चार्ट पर निर्भर रहना पड़ता है। उन्हें 1, 5, 15, 30 व 60 मिनट के चार्टों के साथ ही दैनिक भावों का चार्ट भी देखना चाहिए। इससे स्टॉक की समग्र चाल के मद्देनज़र लक्ष्य और स्टॉप-लॉस तय करना आसान हो जाएगा। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

अगर आम लोग शेयर बाज़ार में आना ही चाहते हैं तो उन्हें ऐसा करतब करना चाहिए जिससे उन्हें थोड़ी बहुत बंधी-बंधाई रकम मिल जाए। मुझे पक्का नहीं पता, लेकिन शायद इंट्रा-डे ट्रेडर कुछ ऐसा की काम करते हैं। उन्हें दिन भर में कुछ घंटे शेयरों के भावों के उतार-चढ़ाव पर खेलना होता है। यकीनन इसमें काफी रिस्क है। लेकिन वे स्टॉक्स के सही चुनाव और उपयुक्त चार्ट अपनाकर रिस्क न्यूनतम कर सकते हैं। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी