भीषण है यह दुष्चक्र। ज्यादा उफान ट्रेडरों को किनारे लगा देता है। लेकिन किनारे लगे ट्रेडर ज़ोर से पलटते हैं। इस छपाक-झपाक में उफान और ज्यादा बढ़ जाता है। दैनिक वोलैटिलिटी या चंचलता पहले से ज्यादा हो जाती है। हमें VIX सूचकांक से नापी जाने वाली और इस सांख्यिकी चंचलता का अंतर समझना होगा। इस समय VIX वाली वोलैटिलिटी घटकर 20-22% की रेंज में आ चुकी है जिसे खतरनाक नहीं माना जा सकता। अब बुद्ध की बुद्धि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार की शांत और उफनती धारा में क्या अंतर है? मोटेतौर पर जब निफ्टी दिन में 90-100 अंकों के दायरे में चले तो बाज़ार की धारा शांत मानी जा सकती है। वहीं, जब वह 120 अंकों के ज्यादा के दायरे में उछलता-कूदता है, तब बाज़ार की धारा उफनती मानी जा सकती है। फिलहाल औसतन यही स्थिति चल रही है। ट्रेडरों को घाटा, फिर उसे कवर करने की मशक्कत। बनता जाए घनघोर दुष्चक्र। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

आसानी से कमाना कौन नहीं चाहता! लेकिन शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग से कमाना हर किसी के बूते की बात नहीं। यहां हाथी जैसी सुस्ती नहीं, चीते जैसी फुर्ती चाहिए। नहीं तो बाज़ार के मगरमच्छ पलक गिरते आपको निगल जाएंगे। शेयर बाज़ार ऐसा शांत तालाब नहीं कि कांटा लगाकर बैठ गए और इंतज़ार किया तो मछली हाथ लग जाएगी। यहां तो ट्रेडर उफनती धारा में शिकार करते हैं। जितना ज्यादा उफान, उतनी ज्यादा कमाई। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

कहावत है कि गीदड़ की मौत आती है तो वह शहर की तरह भागता है। अपने यहां लोगों की नौकरी छूटती है तो वे शेयर बाज़ार की तरफ भागते हैं। खुद नहीं तो बीवी से चाहते हैं कि वह ट्रेडिंग/निवेश से कुछ कमाकर लाए। भूल जाते हैं कि शेयर बाज़ार आम लोगों के लिए कमाने का नहीं, बल्कि जो पहले से कमा रखा है, उसे बचाने या बढ़ाने का जरिया है। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी

डेरिवेटिव सेगमेंट में शॉर्ट और लॉन्ग दोनों तरह के सौदे लीवरेज्ड होते हैं। जितना धन लगाया है, उससे कहीं ज्यादा बड़ा असल सौदा होता है। लेकिन मार्क-टू-मार्केट भुगतान के दबाव में लॉन्ग सौदे करने वाले ट्रेडर को मजबूरी में अपनी पोजिशन छोड़नी होती है तो बाज़ार गिर जाता है। वहीं, शॉर्ट सेलिंग करने वाले ट्रेडर को अक्सर अपनी पोजिशन कवर करने के लिए घबराहट में खरीदना पड़ता है तो बाज़ार चढ़ जाता है। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

बाज़ार की सांस इधर बहुत तेजी से उठ-गिर रही है। निफ्टी प्रतिदिन औसतन 120 से 160 अंक ऊपर-नीचे होता है। सीमित खरीद में बाज़ार चढ़ता है तो भारी वोल्यूम के साथ गिर जाता है। इस समय हालत यह है कि गिरते वक्त केवल कैश सेगमेंट में ही वोल्यूम नहीं बढ़ता, डेरिवेटिव सेगमेंट में ओपन इंटरेस्ट भी बढ़ जाता है। मतलब, शॉर्ट सेलिंग करनेवाले बाज़ार गिरने की उम्मीद में सौदे बढ़ाते जा रहे हैं। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

विदेशी निवेशक बाहर से सस्ते उधार का धन ला रहे हैं। देशी संस्थाएं आम लोगों से सस्ते में मिला धन लगा रही हैं। अपने बाज़ार में उधारी का एक अलग खेल डेरिवेटिव सौदों के रूप में चलता है जिन्हें लीवरेज्ड सौदे भी कहते हैं। एक रुपए लगाकर पांच से बीस गुना ज्यादा रकम का सौदा। कैश ही नहीं, फ्यूचर्स सेगमेंट में भी मार्जिन का जबरदस्त खेल। भाव बढ़े तो मार्क-टू-मार्केट की लटकी तलवार। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

सीधी-सी बात है कि किसी शेयर/स्टॉक के भाव और शेयर बाज़ार के सूचकांक तभी बढ़ते हैं जब उन्हें खरीदनेवाले ज्यादा ही आतुर हों। लेकिन सवाल उठता है कि जब सारी दुनिया में कोरोना का कहर बरपा हो और अर्थव्यस्था में धन भयंकर की तंगी हो, तब शेयरों को खरीदने इतना तगड़ा धन आ कहां से रहा है?  यह धन है अमेरिका, जापान और यूरोप से बेहद कम ब्याज पर लिए गए उधार का। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

आज़ाद भारत के इतिहास में अर्थव्यवस्था कभी भी इतनी भयंकर गिरी नहीं थी। बेरोजगारी 40 साल के चरम पर। फैक्ट्रियों में पूरा उत्पादन शुरू नहीं हुआ। बैंकों के गले में एनपीए का फंदा ज्यादा कस गया। आईएमएफ ने इस साल जीडीपी के 10.3% और रिजर्व बैंक ने 9.5% घटने का अनुमान लगाया है। फिर भी सेंसेक्स दोबारा 40,000 तक जा पहुंचा है। आखिर शेयर बाज़ार में छाए इस उन्माद की वजह क्या है? अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

दुविधा का दौर है। निफ्टी, सेंसेक्स कभी उछल जाते हैं तो कभी निपट जाते हैं। कुछ स्टॉक्स बढ़े चले जा रहे हैं तो कुछ उठने का नाम नहीं ले रहे। ऐसे में समझदारी से किया गया निवेश भी गलत साबित हो सकता है। इसलिए ज़रूरी है कि जब तक शेयर बाज़ार सामान्य अवस्था में नहीं लौट आता, तब तक हम जितना धन निवेश करना है, उसका आधा ही लगाएं। बाकी कैश बचाकर रखें। अब आज का तथास्तु…औरऔर भी