रैखिक बनाम गोलाकार
इंसान की नज़र की सीमा है कि वह रैखिक ही देख सकता है। इसलिए रैखिक ही सोचना सहज है। लेकिन हकीकत यह है कि इस दुनिया में ही नहीं, पूरी सृष्टि में हर चीज का आकार आखिरकार गोल है। इसलिए सहज सोच अक्सर कारगर नहीं साबित होती।और भीऔर भी
तितली रानी, नहीं सयानी!
यही कोई दोपहर बाद की बेला थी। तितली रानी दो घंटे से कमरे में फंसी हुई थी। लंबी-लंबी कांच की खिड़कियों से उसे रोशनी नजर आती तो बाहर निकलने के लिए वहीं से भागने की कोशिश करती। उसमें नरम, मुलायम, नाजुक पंख पारदर्शी कांच से टकराते और वो नहीं निकल पाती। पूरी मेहनत करती। पंख पूरे ज़ोर से चलाती। लेकिन हर बार वही हश्र क्योंकि जिसे वह खुला द्वार समझ रही थी, बाहर छिटकी हरियाली तक पहुंचनेऔरऔर भी



