हर तिमाही होली
होलिका व प्रह्लाद तो बहाना हैं। मकसद है हर साल नियम से तन, मन, रिश्तों व धरती में जमा कंकास को जलाकर खाक करना, उल्लास मनाना। अभी तो कंकास इतना है कि हर तिमाही होली की जरूरत है।और भीऔर भी
होलिका व प्रह्लाद तो बहाना हैं। मकसद है हर साल नियम से तन, मन, रिश्तों व धरती में जमा कंकास को जलाकर खाक करना, उल्लास मनाना। अभी तो कंकास इतना है कि हर तिमाही होली की जरूरत है।और भीऔर भी
किसी से मिलते ही हम समानता के बिंदु पहले तलाशने शुरू कर देते हैं। लेकिन समानता से शुरू हुए रिश्ते अंततः तनावग्रस्त हो जाते हैं। वहीं, अगर हम असमानता से शुरू करें तो रिश्ते दीर्घजीवी बनते हैं।और भीऔर भी
हम अमूमन यही माने रहते हैं कि हम तो चलते रहे, जबकि दूसरे ठहरे रहे। पर ये कैसे संभव है? एक पांव वर्तमान और दूसरा अतीत में रखकर रिश्ते नहीं चल सकते हैं। उन्हें समय के साथ लाना जरूरी है।और भीऔर भी
चीजें वही, लोग भी वही रहते हैं। लेकिन जान-पहचान होते ही उनका पूरा स्वरूप बदल जाता है। पूर्वाग्रह छंट जाते हैं। असली छवि सामने आ जाती है। इसलिए दूर के नहीं, पास के रिश्ते बनाने जरूरी हैं।और भीऔर भी
ज्ञान का हर चिप खुशी के नए स्रोत खोलता है। चीजें वही रहती हैं, लेकिन नजरिया बदलने से उनके साथ आपके रिश्ते बदलकर नए बन जाते हैं। खुशी की चादर इन्हीं रिश्तों के तानेबाने से ही बुनी जाती है।और भीऔर भी
जब गांठें पड़ती हैं तो उसे हम खोलकर सुलझाते हैं, काटकर नहीं। काट देने से गांठ नहीं जाती, बल्कि रिश्तों की डोर छोटी होती चली जाती है। रिश्तों की डोर को बढ़ाना है तो हर गांठ खोलकर सुलझानी पड़ेगी।और भीऔर भी
हर सजीव वस्तु या रिश्ते का पोर-पोर बेहद बारीक तंतुओं से जुड़ा होता है। एक भी तंतु हिल जाए तो उससे उपजी तकलीफ हमें अंदर तक हिलाकर रख देती है और, तब हमें उसके होने का अहसास होता है।और भीऔर भी
शब्दों के बिना विचारों की कनात नहीं तनती। रिश्तों की डोर न हों तो भावनाएं नहीं निखरतीं। औरों की नज़र न हो तो अपनी गलती का एहसास नहीं होता। विराट न हो तो शून्य सालता है, सजता नहीं।और भीऔर भी
जब हमें यह लगने लगे कि इस दुनिया में हमारे लिए कोई नहीं है तो हमें यह सोचना शुरू कर देना चाहिए कि हम सबके लिए हैं। फिर एक दिन किसी से न जुड़ते हुए भी हम सबसे जुड़ जाते हैं।और भीऔर भी
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