भारत में खपत की असलियत को क्यों छिपाने में लगी है मोदी सरकार? यह अभी नहीं, बल्कि 2014 से 2019 तक के अपने पहले कार्यकाल से ही कर रही है। यह मोदी सरकार की नीयत है या फितरत? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य रह चुके जानेमाने अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला ने खुलासा किया है कि 2011-12 के बाद देश में 2017-18 में रोज़गार के साथ ही घरेलू खपत खर्च का भी सर्वे हुआ था। इसमें से काफी हो-हल्ला मचने के बाद रोज़गार का सर्वे तो अंततः सार्वजनिक कर दिया, जिससे पता चला कि देश में बेरोज़गारी 45 सालों के सर्वोच्च स्तर पहुंच गई है। लेकिन सरकार ने अभी तक 2017-18 के घरेलू खर्च सर्वे को सेंसर कर रखा है। भल्ला की मांग है कि इस सर्वे के नतीजे जल्दी से जल्दी से सार्वजनिक किए जाएं। असल में यह सर्वे रिपोर्ट इसलिए छिपाई गई है क्योंकि लीक हुई खबरों के मुताबिक 2011-12 से 2017-18 के बीच के छह सालों में देश में खपत का वास्तविक स्तर 3.7% घट गया था। इसमें भी जिस ग्रामीण भारत में देश के अधिकांश गरीब बसते हैं, वहां खपत के स्तर में 8.8% की भारी कमी आई, जबकि शहरी इलाकों में यह 2% बढ़ी थी। देश के सांख्यिकी तंत्र से दशकों तक जुड़े रहे भल्ला का कहना है कि कभी भारत के डेटा को अचूक माना जाता था। लेकिन 2014 के बाद ऐसा सारा विश्वास चकनाचूर हो चुका है। अब मंगलवार की दृष्टि…
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