घबराहट व अफरातफरी के माहौल में रिटेल ट्रेडर बहुत ज्यादा चौकन्ने हो जाते हैं और दो कदम पीछे, एक कदम आगे की डिफेंसिव रणनीति अपनाते हैं। वहीं, बड़े व प्रोफेशनल ट्रेडर रिस्क को समझते हुए एक कदम पीछे, दो कदम आगे की एग्रेसिव रणनीति अपनाते हैं। असल में तमाम जानकारों का मानना है कि डेल्टा वैरिएंट भी बाज़ार को ज्यादा गिरा नहीं पाया था तो ओमिक्रॉन का असर भी अंततः कुछ दिनों बाद ठंडा पड़ जाएगा। वैसेऔरऔर भी

कोरोना वायरस का डेल्टा से कहीं ज्यादा खतरनाक वैरिएंट ओमिक्रॉन दुनिया में दस्तक दे चुका है। बताते हैं कि दक्षिण अफ्रीका में किसी एचआईवी संक्रमित मरीज से म्यूटेट होकर निकले इस वैरिएंट पर वैक्सीन भी असर नहीं करती। यूरोप से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक इसकी धमक पहुंच चुकी है। भारत सरकार भी चौकन्नी हो गई है। हालांकि कुछ डॉक्टरों का कहना है कि अपने यहां जीनोम सीक्वेंसिंग का व्यापक सुविधा नहीं है तो कोरोना मरीजों के असली वायरसऔरऔर भी

वित्तीय बाजार में ट्रेडिंग से कमाने निकले हैं तो पहली बात समझ लीजिए कि यह एक बिजनेस है। लागत जितनी कम होगी, मुनाफे का मार्जिन उतना ज्यादा होगा। दूसरी बात, आपके पास बहुत सीमित पूंजी है। इस ट्रेडिंग पूंजी को हमेशा इतना बचाना है कि यह उड़ने न पाए। तीसरी और अंतिम बात। शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग से कमाना अपने दिलोदिमाग को संयत रखते हुए दूसरों के मनोविज्ञान को ताड़ने का खेल है। शेयरों के रोज़मर्रा केऔरऔर भी

वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग में अब पायथन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और मशीन लर्निंग (एमएल) का नया फंडा घुमाया जा रहा है। दावा किया जा रहा है कि पायथन के साथ एआई और एमएल सीख लिया तो बाज़ार में कभी हार नहीं सकते। 100% सफलता की गारंटी। बस कोडिंग की भाषा सीखते जाइए। क्या कहा? इसे सीखना बहुत कठिन है, आपके लिए मुमकिन नहीं! कोई बात नहीं, हम आपको सॉफ्टवेयर दिला देते हैं। आइरिस+ आपको 55 से 60औरऔर भी

पहले टेक्निकल एनालिसिस का बड़ा हल्ला था। इसे सिखाने का दावा करनेवाले अच्छा कमा लेते थे। लेकिन अब मुफ्त का इतना माल-मत्ता इंटरनेट पर है कि ऐसे गुरुओं का कोई पुछत्तर नहीं रहा। फिर दौर आया अल्गोरिदम ट्रेडिंग का। इसे भी बताने, सिखाने और बेचनेवाले रिटेल ट्रेडरों के झुंड पर टूट पड़े। लेकिन धीरे-धीरे पता चला कि अल्गो ट्रेडिंग कुछ नहीं, बस कुछ नियमों का पुलिंदा है जिसे किसी को भी ट्रेडिंग करते वक्त ध्यान में रखनाऔरऔर भी

अजीब हाल है। जो लोग आईएएस-पीसीएस नहीं बन पाए वे आईएएस-पीसीएस बनाने का कोचिंग सेंटर चलाने लग गए। जो खुद अपनी शादी नहीं करा पाए वे शादियां कराने की दुकान खोल बैठे। जो खुद वित्तीय बाज़ार में ट्रेडिंग से कमा नहीं पाए. ऐसे तमाम तोतले घर-बैठे ट्रेडिंग सिखाने का चैनल चलाने लगे। समाज में फैली बेरोज़गारी, बढ़ती ज़रूरतों और लोगों के लालच का फायदा उठाकर ऐसे नाकारा लोग महीने में लाखों कमाने लग गए। इससे भी पूरीऔरऔर भी

बराबरी के स्तर पर लड़ाई हो तो रिंग में हो रही बॉक्सिंग की तरह हार या जीत महज एक सहज व स्वाभाविक खेल है। लेकिन हमारे शेयर बाज़ार में बराबरी का यह स्तर देशी-विदेशी संस्थाओं और प्रोफेशनल ट्रेडरों के दायरे से बाहर निकलते ही भेड़ियाधसान बन जाता है। यहां रिटेल ट्रेडर सबसे असहाय जीव है। बाज़ार के इर्दगिर्द हर शाख पर इतने शिकारी बैठे हैं जो उसकी हड्डी तो छोड़िए, चमड़ी तक निचोड़ डालते हैं। लालच कोऔरऔर भी

ट्रेडिंग के लिए कौन-से स्टॉक्स चुनें, इसका फैसला हमेशा मुख्य सूचकांकों में से किया जाना चाहिए। निफ्टी-50 नहीं तो नेक्स्ट-50 पर नज़र डालें। इसी तरह मिडकैप और स्मॉलकैप सूचकांकों से होते हुए अलग-अलग उद्योग व सेवा क्षेत्र के सूचकांकों तक उतर जाएं। इनमें से भी सही स्टॉक्स न मिलें तो निफ्टी-50 एल्फा तक चले जाएं। हालांकि, इस वक्त सबसे बड़ी दिक्कत है बाज़ार में चल रही भारी सट्टेबाज़ी, जिसके केंद्र में हैं रिटेल ट्रेडर। बीते डेढ़-दो सालऔरऔर भी

लम्बे निवेश का फंडा एकदम अलग है और ट्रेडिंग का एकदम अलग। ट्रेडिंग में कंपनी के ईपीएस, बुक वैल्यू और स्टॉक के पी/ई व पी/बी अनुपात का कोई फर्क नहीं पड़ता। वहां तो बस इतना देखना पड़ता है कि धन का प्रवाह किन स्टॉक्स का पीछा कर रहा है और किनसे दूर भाग रहा है। खासकर, एफआईआई का रुख क्या है? यह भी कि इस दौरान एचएनआई और प्रोफेशनल ट्रेडरों का क्या व्यवहार है? डीआईआई तो हमेशाऔरऔर भी

अमूमन इंट्रा-डे ट्रेडर के लिए वही स्टॉक्स माफिक होते हैं जो 52 हफ्तों के शिखर से 2-4% नीचे हों। ऐसे स्टॉक्स निफ्टी-50 से लेकर नेक्स्ट-50 और दूसरे सूचकांकों में साफ देखा सकता है। इन्हें देखकर ट्रेडर को अपना-अपना नियम-कायदा या अल्गोरिदम लगाना पड़ता है। लेकिन चूंकि स्विंग, मोमेंटम या पोजिशनल ट्रेडर कम से कम 5-10% कमाने के लिए ट्रेड करते हैं तो 52 हफ्ते के शिखर से 2-4% नीचे चल रहे स्टॉक्स उन्हें नहीं जमते। उन्हें तोऔरऔर भी