बाज़ार को दो साल से चढ़ाए जा रहे देश के प्रोफेनशल निवेशक हों, संस्थाएं या विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) हो, वे इधर जमकर मुनाफावसूली कर रह हैं तो यह एकदम स्वाभाविक है। जो भी ज्यादा कमा लेता है, उसे सब गंवा देने की चिंता सताती है। वो भी तब जब तरफ अनिश्चितता के घने बादल छाते जा रहे हों। बाहर ही नहीं, अब तो देश के भीतर भी पांच राज्यों के ताज़ा विधानसभा चुनावों ने अनिश्चितता बढ़ाऔरऔर भी

बकने को कोई भी कुछ बक सकता है। लेकिन जिन तथाकथित विशेषज्ञों या एक्सपर्ट्स को आप हर दिन बिजनेस चैनलों पर देखते है कि वे भी गारंटी नहीं दे सकते कि आगे शेयर बाज़ार का क्या हाल होगा। रूस-यूक्रेन का युद्ध तो तात्कालिक मामला है। इससे पहले भी अमेरिका समेत सारी दुनिया में बढ़ती मुद्रास्फीति और उसे समतल करने के लिए ब्याज दरें बढ़ाने की तलवार लटकी हुई थी। यह काम इसी मार्च महीने में होना है।औरऔर भी

बाज़ार में इस समय इतनी उथल-पुथल चल रही है कि किसी भी स्टॉक के भाव का अनुमान लगाना लगभग असंभव है। लम्बे समय से दबा चला आ रहा किसी अच्छी कंपनी का शेयर अचानक 5-6% उछलता है तो लगता है कि अब इसने तेज़ी की राह पकड़ ली। लेकिन अगले ही दिन उसके पुराने निवेशक मुनाफावसूली कर डालते हैं तो शेयर फिर धड़ाम हो जाता है। ट्रेडरों का रवैया बेहद छोटा हो गया है। वे मुनाफे काऔरऔर भी

बाज़ार गिर रहा है। गिरता ही जा रहा है। कहा जा सकता कि या तो यह करेक्शन है या तेज़ी के दौर का अंत और मंदी की शुरुआत। अगर करेक्शन है तो फिलहाल समझदारी इसी में है कि बाज़ार का तमाशा दूर खड़े रहकर बाहर से देखा जाए। नहीं तो अगर रिस्क लेने की भरपूर क्षमता हो, तरीका पता हो तो बाज़ार को शॉर्ट किया जाए, डेरिवेटिव सेगमेंट में शॉर्ट सेलिंग की जाए। हम सभी इंसान हैंऔरऔर भी

अनिश्चितता में फंसा शेयर बाज़ार गिर रहा होता है तब तलहटी और उभार की भविष्यवाणी करना बड़ा आसान लगता है। लेकिन इतने सारे अनजान कारक सक्रिय होते हैं कि कोई भविष्यवाणी काम नहीं करती। ऐसे में सतर्क रहते हुए सक्रियता घटाने के विकल्प पर गौर करना चाहिए। लेकिन दिक्कत यह है कि बाज़ार में हमेशा ऐसे ट्रेडर मिल जाते हैं जो अनिश्चितता की थाह लेने और उससे पार पाने में कहीं ज्यादा सुलझे होते हैं। बाज़ार मेंऔरऔर भी

जीवन के तमाम क्षेत्र हैं जहां जमकर मेहनत करो तो अच्छे नतीजे मिलते हैं। पढ़ाई से लेकर खेल तक में कठिन-कठोर प्रयास व अभ्यास से ज्यादा सफलता मिलती है। लेकिन शेयर बाज़ार के निवेश व ट्रेडिंग में अक्सर ऐसा नहीं होता। वहां तो अनिश्चितता की भंवर में ज्यादा हाथ-पैर मारने पर आप डूब सकते हैं। फिर भी कुछ बावले होते हैं जो मानते हैं कि वे बाज़ार या स्टॉक्स की तहलटी पकड़ने में माहिर है और वहांऔरऔर भी

आगे क्या होगा, कोई पक्के तौर पर नहीं जानता। शेयर बाज़ार यह सच बार-बार, हर बार साबित करता रहता है। सौ सालों की सबसे भयंकर महामारी साल 2020 से 2021 तक दुनिया को जकड़े रहे। लेकिन इस दौरान शेयर बाज़ार 50% से ज्यादा बढ़ गए। हमारे यहां तो निफ्टी मार्च 2020 में 7600 तक गिरने के बाद अक्टूबर 2021 में 18500 तक चला गया। जिस आपदा ने अर्थव्यवस्था को चूर-चूर कर दिया, उस दौरान निफ्टी-50 सूचकांक 143.42%औरऔर भी

शेयर बाज़ार में आशाओं और उम्मीदों का दौर खत्म। अब हर तरफ अनिश्चितता और चिंता छा गई है। यूक्रेन पर रूस के हमले का पांचवां दिन। फाइनेंस की दुनिया के केंद्र अमेरिका में मुद्रास्फीति चार दशकों के शिखर पर। जहां से भारत जैसे देशों में जमकर सस्ता धन आता है, वहां का केंद्रीय बैंक मौद्रिक नीति को कठोर बनाकर धन को महंगा करने जा रहा है। मार्च में ही ब्याज दरें बढ़ाने की योजना है। आर्थिक विकासऔरऔर भी

रूस ने 31 साल पहले तक अपने ही सोवियत संघ का हिस्सा रहे यूक्रेन पर भीषण हमला कर दिया है। यूक्रेन की सेनाएं भी लड़-मर रही हैं। यूरोप रूस के खिलाफ आर्थिक प्रतिबंध लगाने की तैयारी में है। अमेरिका ने नाटो के दम पर चेतावनी दी है कि रूस को जबाव देना पड़ेगा। लेकिन रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने ललकारा है कि अगर कोई भी रूस भिड़ने की जुर्रत करेगा तो उसे इतिहास का भंयकरतम परिणाम भुगतान पड़ेगा।औरऔर भी

आशावाद के बाद बाज़ार में अभी अनिश्चितता का आलम है। जहां बेहतरी की कहानियां शेयर बाज़ार में लालच की भावना को हवा देती रहीं, वहीं अनिश्चितता भय को बढ़ाती जा रही है। बाज़ार से लालच की भावना भाग चुकी हैं। कभी यूक्रेन पर रूस के हमले और जवाब में अमेरिकी कार्रवाई के खतरे तो कभी अमेरिका में ब्याज दर बढ़ाए जाने की आशंका के नाम पर बाज़ार में बिकवाली बढ़ जाती है। इसमें भारत ही नहीं, दुनियाऔरऔर भी