छह महीनों से भारतीय शेयर बाज़ार में लगातार बेच रहे विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक अब खरीद थोड़ा-थोड़ा बढ़ाने लगे हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध से लंदन मेटल एक्सचेंज में धातुओं व अन्य जिंसों के दाम तेज़ी से बढ़ गए तो एफपीआई ने मेटल स्टॉक्स में खरीद बढ़ा दी है। साथ ही सुरक्षित क्षेत्र जानकर वे हेल्थकेयर व एफएमसीजी सेक्टर की तरफ झुके हैं। सवाल उठता है कि आगे की राह क्या है? विदेशी निवेशक पहले भी भारतीय शेयर बाज़ार सेऔरऔर भी

जनवरी में एफआईआई के बेचने से आईटी व हेल्थकेयर कंपनियों के शेयर गिरते रहे, जबकि फरवरी में उनकी बिकवाली का दबाव आईटी कंपनियों पर कहर बरपाता रहा। पिछले दो महीनों के दौरान विदेशी संस्थाओं ने गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) में जमकर मुनाफावसूली की। इसका साफ असर एचडीएफसी जैसी मजबूत कंपनियों के शेयरों तक पर पड़ा। एफआईआई को लगता है कि रिजर्व बैंक नए वित्त वर्ष 2022-23 में 6-8 अप्रैल को होनेवाली पहली मौद्रिक समीक्षा में ब्याज दरऔरऔर भी

हमारी अर्थव्यवस्था का अच्छा हो या बुरा हो, आज के हालात में शेयर बाज़ार के लिए इसका कोई मतलब नहीं रह गया है। लेकिन विदेशी संस्थागत या पोर्टपोलियो निवेशक (एफआईआई/एफपीआई) अगर शेयर बाज़ार में खरीदने से ज्यादा बेचते हैं तो इसका सीधा असर बाज़ार के सूचकांक और स्टॉक्स पर पड़ता है। चिंता की बात यह है कि पिछले कुछ महीनों से एफआईआई भारतीय शेयर बाज़ार से निकलते जा रहे हैं। एनएसडीएल के डेटा के मुताबिक एफआईआई भारतऔरऔर भी

हमारे रिजर्व बैंक ने तो ब्याज दरों को मई 2020 से थाम रखा है। लेकिन अमेरिका के फेडरल रिजर्व ने दिसंबर 2018 से ब्याज दरें नहीं बढ़ाई थीं। हमारा भी मकसद है कि देश में उद्योग व उपभोक्ता को कम ब्याज पर धन मिल सके और निवेश बढ़ने के साथ खपत भी बढ़े। अमेरिका की भी यही सोच रही है। लेकिन अभी जो हालात हैं, उसमें हमारी अर्थव्यवस्था की हालत सुधरती नहीं दिख रही। रिजर्व बैंक नेऔरऔर भी

दुनिया भर का वित्तीय प्रवाह जहां से चलता है, उस अमेरिका ने ब्याज दर बढ़ा दी तो बाकी देशों में भी यह सिलसिला शुरू हो गया है। इसके अगले ही दिन ब्रिटेन के केंद्रीय बैंक, बैंक ऑफ इंग्लैंड ने ब्याज दर बढ़ा दी। हांगकाग ने भी ब्याज दर बढ़ा दी। दरअसल, दुनिया का हर प्रमुख देश ऐसा करेगा। नहीं तो वहां का धन निकलकर अमेरिका की तरफ भागेगा। अपने यहां भारत में रिजर्व बैंक ने 22 मईऔरऔर भी

मुद्रास्फीति जब 40 सालों के उच्चतम स्तर 7.9% पर पहुंच गई हो, तब अमेरिका के केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व को सांकेतिक ब्याज दर की रेंज को बढ़ाकर 0.25-0.50% करना ही था। मार्च 2020 में कोरोना महामारी के बाद से वहां इसे शून्य से 0.25% रखा गया था ताकि अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन मिलता रहे। लेकिन बुधवार को भारतीय समय के मुताबिक रात 11 बजे फेडरल रिजर्व ने ब्याज दर बढ़ाने का फैसला कर लिया। इस साल फेडरल ओपनऔरऔर भी

विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) दुनिया भर की उभरती अर्थव्यवस्थाओं में से उसी देश में निवेश करते हैं जहां कम रिस्क में ज्यादा रिटर्न पाने की भरपूर संभावना होती है। भारत यकीनन दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ सकनेवाली अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। लेकिन बढ़ती मुद्रास्फीति, महंगे कच्चे तेल पर निर्भरता, बेलगाम राजकोषीय़ घाटे और अटके आर्थिक सुधारों ने भारत की संभावनाओं को कमज़ोर किया है। क्या एफआईआई इस वजह से भारत से निकल रहे हैं? वेऔरऔर भी

यूं तो किसी भी देश में घुसे विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों का स्वभाव ही है फटाफट मुनाफा कमाकर निकल जाना। लेकिन उनके द्वारा भारतीय शेयर बाज़ार में लगातार छह महीने से बेचते जाना और दो लाख करोड़ रुपए से ज्यादा निकाल लेना अपने-आप में चौंकानेवाली घटना है। आखिर जिस भारत को लेकर वे दशकों से आशावान रहे हैं, वहां से इस कदर भागने की वजह क्या है? क्या उनकी आशा निराशा में बदल गई है और वे ‘बुलिश’औरऔर भी

विदेशी संस्थागत या पोर्टफोलियो निवेशक पिछले छह महीनों से लगातार भारतीय शेयर बाज़ार में बेचे जा रहे हैं। यह सिलसिला तब से शुरू हुआ है, जब से 19 अक्टूबर 2021 को निफ्टी-50 ने 18,604.65 अंक छूकर अब तक का ऐतिहासिक शिखर बनाया। उस हफ्ते से दिसंबर के अंत तक एफआईआई या एफपीआई ने हमारे शेयर बाज़ार के कैश सेगमेंट से 99,461 करोड़ रुपए की शुद्ध निकासी की। सेबी की तरफ से व्यवस्थित डेटा रखनेवाली संस्था एनएसडीएल केऔरऔर भी

सवाल उठता है कि शेयर बाज़ार में बने आज के हालात में क्या किया जाए? ट्रेडर या निवेशक का रास्ता क्या है? अगर ट्रेडिंग करना चाहते हैं तो सीधा-सा जवाब है कि ट्रेडिंग में ऐसी ऊंच-नीच बराबर आती रहती है। यह  बाज़ार का मूल स्वभाव है। इसलिए ट्रेडिंग में सफलता या बाज़ार से नियमित कमाई के लिए आपको अपने माफिक अच्छा-सा ट्रेडिंग सिस्टम विकसित करना होगा और लगातार सच्चाई पर उसे कसते और आजमाते हुए बराबर अपग्रेडऔरऔर भी