शेयर बाज़ार के रुख को भांपनेवाला तीसरा अहम संकेतक है मार्केट वाइड पोजिशन लिमिट (MWPL)। इसका भी वास्ता डेरिविटिव्स सेगमेंट से है। इसका डेटा हर दिन एनएसई की वेबसाइट पर डेली मार्केट रिपोर्ट्स के डेरिवेटिव्स वाले हिस्से में मिलता है। इससे पता चलता है कि सेबी और एनएसई ने जितने डेरिवेटिव एक्सपोज़र की इजाज़त दे रखी है, उसमें से बाज़ार ने कितना इस्तेमाल किया है। मान लीजिए कि किसी स्टॉक के फ्यूचर्स व ऑप्शंस में एक करोड़औरऔर भी

शेयर बाज़ार की अभी जो स्थिति चल रही है, उससे कभी-कभी तो दिन की ट्रेडिंग के दौरान निफ्टी का बेसिस ऋणात्मक हो जाता है। मतलब तब निफ्टी फ्यूचर्स का भाव निफ्टी के कैश बाज़ार के भाव से कम या डिस्काउंट पर रहता है। इस तरह शेयर बाज़ार में निराशा की भंवर से निकल कर तेज़ी की राह दिखानेवाला ‘बेसिस’ नाम का दूसरा संकेतक फिलहाल निराश कर रहा है। मंदड़ियों में शॉर्ट करने का जबरदस्त माद्दा है औरऔरऔर भी

कुछ महीने पहले जब अपने शेयर बाज़ार पर तेज़ी का सुरूर छाया था, तब अक्टूबर, नवंबर व दिसंबर में बैंक निफ्टी व निफ्टी से लेकर स्टॉक्स तक के फ्यूचर्स व कैश सेगमेंट के भाव में काफी अंतर था। उस दौरान फ्यूचर्स का प्रीमियम या बेसिस काफी ज्यादा हुआ करता था। लेकिन आज यह बेसिस बहुत मामूली रह गया। अमूमन होता यह है कि डेरिवेटिव चक्र या महीने की शुरुआत में फ्यूचर्स का प्रीमियम बहुत ज्यादा होना चाहिएऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग का रिस्क दिन तक ही सीमित रखनेवाले इंट्रा-डे ट्रेडरों के रुझान का पता लगाने का संकेतक है एडवांस-डिक्लाइन अनुपात। दूसरी तरह के ट्रेडर वे हैं जो ज्यादा रिस्क लेते हैं, जिनके पास ज्यादा धन है। वे मार्क टू मार्जिन चुकाकर अपने सौदे कई दिन तक आगे बढ़ा सकते हैं। अक्सर वे डेरिवेटिव सेगमेंट में शामिल स्टॉक्स और निफ्टी व बैंक निफ्टी में ट्रेड करते हैं। इनकी सक्रियता बाज़ार की भावी चाल के दूसरेऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में सबसे ज्यादा उछल-कूद और धमाचौकड़ी मचाते हैं इंट्रा-डे ट्रेडर। ऐसे ट्रेडर जो खरीद या बिक्री (लॉन्ग या शॉर्ट) की पोजिशन अगले दिन तक नहीं ले जाते। इन्हीं की सक्रियता से बनता है दिन का एडवांस-डिक्लाइन अनुपात, किसी दिन कितने शेयर बढ़े और कितने घटे, इसका अनुपात। अगर यह एक से ज्यादा है तो बाज़ार में खरीद या तेजड़ियों का दम ज्यादा है और एक से कम है तो बिकवाली या मंदडियों का ज़ोर अधिकऔरऔर भी

विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक बेचे ही जा रहे हैं। फिर भी कुछ दिन से बाज़ार बढ़ रहा है। लेकिन निफ्टी-50 अब भी अपने शिखर से 10% से ज्यादा नीचे है। सबसे दिमाग में यही सवाल नाच रहा है कि आखिर बाज़ार की तलहटी क्या होगी, जहां से वह पलटकर उठने लगेगा? जब हो जाएगा, तब इसका पता चलेगा। अभी तो इसका सटीक जवाब किसी के भी पास नहीं है। जो है वो केवल कयासबाज़ी है। फिर भी इंसानऔरऔर भी

मुद्रास्फीति से लड़ने में हमारा रिजर्व बैंक तारे गिनता नज़र आ रहा है। उसके ब्याज दर बढ़ाने के बावजूद मुद्रास्फीति थम नहीं रही। अप्रैल में रिटेल मुद्रास्फीति आठ साल के शिखर 7.79% और थोक मुद्रास्फीति 15.08% रही है जो 2011-12 की नई सीरीज का शिखर है। रिजर्व बैंक जिस तरह ब्याज दर और सीआरआर (रिजर्व बैंक के पास बैंकों द्वारा रखे जानेवाली जमा का हिस्सा) बढ़ाकर सिस्टम में धन का प्रवाह रोक रहा है, उसका नकारात्मक असरऔरऔर भी

अमेरिका हर तरह के आर्थिक संकट से निपटने के लिए मुफ्त में नोट छापकर सिस्टम में डालता रहा। साल 2008 के वित्तीय संकट के बाद उसने ऐसा किया। फिर यही काम कोरोना महामारी के दौरान किया। अमेरिका में जितने डॉलर है, उसका लगभग 20% हिस्सा केवल साल 2020 में छापा गया। अमेरिका व अन्य विकसित देशों के केंद्रीय बैंकों को करना यह चाहिए था कि सिस्टम में डाले गए अतिरिक्त नोट संकट हल्का होते ही वापस खींचतेऔरऔर भी

दशकों में पहली बार ऐसा हो रहा है कि मुद्रास्फीति भारत ही नहीं, अमेरिका व यूरोप समेत तमाम विकसित देशों तक के सिर चढ़कर बोल रही है। ऐसे में इन देशों के केंद्रीय बैंकों की पहली प्राथमिकता बन गई है कि सिस्टम में डाले गए नोट वापस खींचो और ब्याज दरें बढ़ा दो। लेकिन इधर खिंचते जा रहे रूस-यूक्रेन युद्ध ने सप्लाई में दिक्कतें पैदा कर दी और महंगाई बढ़ाने का नया आधार बना दिया। अमेरिका नेऔरऔर भी

हम शेयर बाज़ार में रिटेल निवेशकों व ट्रेडरों की ताकत की बात करते रह सकते हैं। लेकिन बढ़ती मुद्रास्फीति ने उन्हें निचोड़ना शुरू कर दिया। नौकरी और काम-धंधे से होनेवाली आय ठहरी पड़ी है। खर्च बढ़ते जा रहे हैं। वह भी तब, जब अभी तक बढ़ती ब्याज दर का असर ईएमआई पर नहीं पड़ा है. सवाल उठता है कि क्या घर-गृहस्थी चलाने के बढ़े खर्च के अनुरूप आम लोगों की आमदनी भी बढ़ने जा रही है? साफऔरऔर भी