शेयरों की ट्रेडिंग बाज़ार में सक्रिय निवेशकों व ट्रेडरों की मानसिकता व आवेग को जानकर उनके बर्ताव को पहले से भांप लेने का खेल है। लेकिन यह कितना संभव है? आप अपने को समझ सकते हैं, अपने जैसे अन्य ट्रेडरों की चाल को समझ सकते हैं, लेकिन जहां देश के कोने-कोने के लाखों अनजान लोग ही नहीं, विश्व स्तर पर करोड़ों धनवान सक्रिय हों जिनकी नुमाइंदगी फाइनेंस की दुनिया के दिग्गज प्रोफेशनल कर रहे हों, वहां साराऔरऔर भी

रिटेल ट्रेडर को सबसे पहले अपनी मानसिकता व आवेगों को कायदे से जानना चाहिए। इससे वह अपने जैसे लाखों ट्रेडरों की मानसिकता को समझने के साथ ही खुद के आवेगों पर नियंत्रण पा सकता है। लेकिन उसके लिए सबसे बड़ी बात है प्रोफेशनल, एचएनआई और देशी-विदेशी संस्थागत निवेशकों व ट्रेडरों के रुख को समझना। इसमें उसकी सबसे ज्यादा मदद टेक्निकल एनालिसिस करती है। चार्ट असल में इस दमदार श्रेणी के निवेशकों व ट्रेडरों की सारी हरकत काऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग दरअसल कंपनियों के फंडामेंटल नहीं, बल्कि इस बाज़ार में सक्रिय ट्रेडरों के संभावित बर्ताव, उनकी मानसिकता और आवेगों को समझने का खेल है। यह ज़रूर है कि शेयरों के भाव खबरों से भी प्रभावित होते हैं। लेकिन रिटेल ट्रेडरों को खबरों से खेलने का ज़ोन पूरी तरह बड़े उस्तादों के लिए छोड़ देना चाहिए। इसलिए जिन दिन भी कंपनी या अर्थव्यवस्था की बड़ी खबर आनी हो, उस दिन उन्हें ट्रेडिंग नहीं करनी चाहिए।औरऔर भी

सितंबर तिमाही के जीडीपी आंकड़ों के बाद मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने कहा था कि चालू वित्त वर्ष 2022-23 में अर्थव्यवस्था 6.8% से 7% बढ़ सकती है क्योंकि बढ़ती मांग से मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र में उछाल आ सकता है। लेकिन जो क्षेत्र सितंबर तिमाही में 4.3% सिकुड़ा हो, उसमें अचानक कैसे उछाल आ सकता है? वह भी तब, जब रिजर्व बैंक बराबर ब्याज दर बढ़ाकर मांग घटाने में लगा है! दो दिन पहले बुधवार को हीऔरऔर भी

अपना शेयर बाज़ार रिकॉर्ड ऊंचाई के आसपास मंडरा रहा है। निफ्टी और सेंसेक्स कुलांचे मार रहे हैं। लेकिन अर्थव्यवस्था या उसकी माप करनेवाले जीडीपी की क्या स्थिति है? चालू वित्त वर्ष 2022-23 में जुलाई से सितंबर तक की तिमाही में हमारा जीडीपी 6.3% बढ़ा है। इसमें भी कृषि क्षेत्र की विकास दर 4.6% रही है जिस पर बहुत सारे विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि जब खुद केंद्रीय कृषि मंत्रालय कि इस बार खरीफऔरऔर भी

किसी समय शेयर बाज़ार को अर्थवयवस्था का बैरोमीटर माना जाता था। लेकिन क्या आज ऐसा नहीं है। हमारा शेयर बाज़ार इस समय ऐतिहासिक ऊंचाई के इर्दगिर्द घूम रहा है। लेकिन अर्थव्यवस्था की हालत नवंबर 2016 की नोटबंदी के बाद जो बिगड़ी और कोरोना महामारी से जैसा उसे तहस-नहस किया गया, उसके बाद उमंग नहीं लौट पा रही। टैक्स संग्रह ज़रूर बढ़ रहा है। लेकिन सरकार के फालतू खर्च ज्यादा रफ्तार से बढ़ रहे हैं। इन खर्चों कोऔरऔर भी

देश की मुद्रा की विनिमय दर और उसकी अर्थव्यवस्था में क्या सम्बन्ध है? कोई भी सीधा रिश्ता नहीं। दशकों पहले पीपीपी (परचेज़िंग पावर पैरिटी) का पैमाना चलता था। तब मुद्रा का बाहरी मूल्य उसके आंतरिक मूल्य से तय होता था। अलग-अलग मुद्राओं से संबंधित देश के भीतर चल रही मुद्रास्फीति के अंतर से उसकी मुद्रा की विनियम दर तय होती थी। तब देश के निर्यात व आयात का अंतर या चालू खाता खास मायने रखता था। लेकिनऔरऔर भी

बड़ी सीधी साफ-सी बात है कि किसी देश की अर्थव्यवस्था हमेशा उसकी अपनी मुद्रा में चलती है। अमेरिका की डॉलर में, ब्रिटेन की पौंड में, यूरोप की यूरो में तो भारत की रुपए में। लेकिन टेढ़ी-सी बात यह है कि क्या आज की ग्लोबल दुनिया में देश की अर्थव्यवस्था की अंतर्निहित शक्ति और उसकी मुद्रा की विनिमय दर में कोई सीधा रिश्ता है? फिर सवाल यह भी उठता है कि क्या आज के माहौल में शेयर बाज़ारऔरऔर भी

निफ्टी के गिरने की गुंजाइश खत्म हो चुकी है। वो तो हर दिन नए से नया शिखर बनाता जा रहा है। 20,000 अंक से महज 6% दूर रह गया है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की खरीद जारी रही तो यह मंज़िल हफ्ते-दस दिन में ही हासिल हो सकती है। इसलिए हाल-फिलहाल ऐतिहासिक शिखर से 20% गिरने की आशंका खत्म हो चुकी है। दूसरे शब्दों में बाज़ार में मंदड़ियों का शिकंजा कसने के आसार नहीं दिख रहे। इसलिए ज्यादाऔरऔर भी

अतीत में निफ्टी के शिखर पर पहुंचने के बाद जो करेक्शन आए, वे अलग-अलग रहे हैं। जनवरी 2008 में निफ्टी शिखर पर पहुंचने के बाद सवा साल में 50% तक गिर गया था। यकीनन, अब उतना बड़ा करेक्शन होने की गुंजाइश नहीं दिखती। लेकिन बड़ा करेक्शन तो आ ही सकता है, इस आशंका से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता। हाल का जो करेक्शन अक्टूबर 2021 के शीर्ष के बाद जून 2022 तक आया था, वोऔरऔर भी