शीर्ष रेटिंग व रिसर्च एजेंसी क्रिसिल का आकलन है कि इस साल हमारा निर्यात बहुत हुआ तो 2-4% ही बढ़ सकता है क्योंकि हमारे निर्यात के दो सबसे ठिकानों – अमेरिका व यूरोप की विकास दर क्रमशः 2% से घटकर 1.4% और 3.5% से घटकर 0.7% रह जाने का अंदेशा है। ऐसे में हमारी अर्थव्यवस्था कैसे ज्यादा बढ़ सकती है? बीते वित्त वर्ष 2022-23 की विकास दर का अगला अनुमान 31 मई को आना है। यह दरऔरऔर भी

आर्थिक विकास अगर प्रतिबद्धता के बजाय चुनाव जीतने का राजनीतिक नारा बन जाए तो देश के सामने कभी सच्ची तस्वीर नहीं आती और उसकी अर्थव्यवस्था का बेड़ा गर्क होना तय हो जाता है। कहा जा रहा है कि हम बहुत तेज़ी से विकास कर रहे हैं। लेकिन सरकारी आंकड़े ही बताते हैं कि देश का वस्तु निर्यात लगातार पांच महीनों से घटता जा रहा है। दिसंबर 2022 में यह 3.1% घटा था। उसके बाद इस साल जनवरीऔरऔर भी

श्रम बाज़ार में स्नातकों की बढ़ती शिरकत यकीनन शुभ संकेत है। लेकिन देश की श्रमशक्ति में उनका हिस्सा अब भी काफी संकुचित है। कोरोना से आने से पहले सितंबर-दिसंबर 2019 में यह हिस्सा 13.2% हुआ करता था। कोरोना के दौरान जनवरी-अप्रैल 2020 में थोड़ा-सा बढ़कर 13.7% हो गया। लेकिन सितंबर-दिसंबर 2020 में घटकर 11.7% पर आ गया। लेकिन उसके बाद भी 12% के आसपास ठहरा हुआ है, जबकि श्रम बाज़ार में उनीक भागीदारी बढ़ गई है। इसकीऔरऔर भी

अच्छी बात यह है कि अपने यहां ग्रेजुएट युवक-युवतियां थक-हारकर घर बैठ जाने के बजाय नौकरी मांगने के लिए श्रम बाज़ार में पहले से ज्यादा उतरने लगे हैं। हालांकि आमतौर पर काम मांगनेवाले श्रमिकों का श्रम बाज़ार में आना घटा है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, देश में श्रम भागीदारी की दर (एलपीआर) वित्त वर्ष 2016-17 में 46.2% हुआ करती है। यह बीते वित्त वर्ष 2022-23 में घटकर 39.5% पर आ गई है। लेकिन बेरोज़गारी की ऊंची दरऔरऔर भी

जो जितना ज्यादा पढ़-लिख लेता है, उसे देश के भीतर काम मिलना उतना ही मुश्किल हो जाता है। इसकी तस्दीक करते हैं बेरोज़गारी के आंकड़े। सीएमआईई के मुताबिक, भारत में बेरोज़गारी की औसत दर 7.5% चल रही है। लेकिन अगर ग्रेजुएट, पोस्ट ग्रेजुएट व इंजीनियरों वगैरह की बेरोजगारी को अलग से गिनें तो उनका आंकड़ा 17.2% निकलता है। यूं तो जिनकी अधिकतम पढ़ाई 10वीं से 12वीं तक हुई है, उनमें भी ज्यादा बेरोज़गारी है, फिर भी उनकीऔरऔर भी

हमारा पूंजी बाज़ार बम-बम कर रहा है। एनएसई दुनिया में पहले नंबर का डेरिवेटिव्स एक्सचेंज बन चुका है। लेकिन जिस श्रम की बूंद-बूंद से पूंजी बनती है, उसी श्रम बाज़ार की हालत खस्ता है। इसमें कम पढ़े-लिखे लोगों को काम मिल जाता है। लेकिन उच्च शिक्षा की अवहेलना होती है। हुआ यह कि अपने यहां 1990 के दशक के उत्तरार्ध में उच्च शिक्षा जमकर बढ़ी। इंजीनियरिंग कॉलेज खूब खुले ताकि आईटी इंजीनियरों की मांग पूरी की जाऔरऔर भी

भारत में रोज़गार प्राप्त लोगों में से ज्यादातर बहुत कम पढ़े-लिखे हैं। सितंबर-दिसंबर 2022 की तिमाही के आंकड़ों के मुताबिक रोज़गार में लगी हमारी श्रमशक्ति में से 40% दसवीं से बारहवीं तक पढ़े हैं। वहीं, 48% श्रमिक तो दसवीं तक भी नहीं पढ़े हैं। इनमें से 28% छठी से आठवीं तक पढ़े हैं, जबकि 20% केवल पांचवीं पास हैं जिन्हें अशिक्षित ही माना जा सकता है क्योंकि पहली से पांचवीं तक बच्चों को यूं ही आगे खिसकाऔरऔर भी

अमेरिका के श्रम विभाग ने 5 मई को घोषित कर दिया कि वहां अप्रैल में बेरोज़गारी की दर 3.4% थी। अपने यहां तो बेरोजगारी का सबसे नया सरकारी आंकड़ा वित्त वर्ष 2021-22 का है। एक महीना नहीं, पूरे एक साल से ज्यादा पुराना। उस राष्ट्रव्यापी रोज़गार सर्वे में बताया गया था कि देश में बेरोज़गारी की दर मात्र 4.1% थी। जिस भारत देश में चपसारी के 91 पदों के लिए 2.25 लाख आवेदन आ जाते हों, जिनमेंऔरऔर भी

इंडिया दैट इज़ भारत। इंडिया और भारत एक ही हैं। लेकिन दो भारत बने हुए हैं और दोनों का दरमियानी फैसला बढ़ता ही जा रहा है। एक तरफ हमारे अधिकांश शहर बम-बम कर रहे हैं। मॉल्स में लोगों का मेला है। हवाई अड्डे भरे पड़े हैं। फ्लाइट्स सारी बुक हैं। ट्रेनों में रिजर्वेशन नहीं मिलता। तमाम फिल्में करोड़ों का धंधा कर रही हैं। रेस्टोरेंट खचाखच। जीएसटी कलेक्शन बढ़ता ही जा रहा है। दूसरी तरफ महानगरों में फ्लाईओवरऔरऔर भी

अपने भारत की ज़मीनी हकीकत यह है कि यहां बेरोज़गारी के सारे आंकड़े व पैमाने फेल हो जाते हैं। दुनिया भर में बेरोज़गारी दर की परिभाषा यह है कि 15 साल से ऊपर की कामकाज़ी उम्र के जितने लोग काम की मांग कर रहे हैं, उनमें से कितने प्रतिशत लोगों को काम नहीं मिल रहा। जितने लोग काम मांग रहे हैं, उनकी कुल संख्या को देश की श्रमशक्ति भी कहा जाता है। अपने यहां विचित्र स्थिति हैऔरऔर भी