सरकार तक का काम खुद कैसे नौकरशाही के मकड़जाल में फंस जाता है, इसका ताज़ा उदाहरण है इसी हफ्ते सोमवार, 1 सितंबर को लॉन्च हुई मुंबई से सिंधुदुर्ग तक की रो-रो फेरी। यह प्रोजेक्ट 2014-19 में फडणवीस के पिछले कार्यकाल में पेश किया गया था। लेकिन केंद्रीय जहाजरानी मंत्रालय और राज्य बंदरगाह विभाग से 147 मंजूरियां लेने में दस साल यूं ही निकल गए। सरकारी भ्रष्टाचार व वसूली से आम लोग ही नहीं, निजी उद्योग भी त्रस्तऔरऔर भी

सरकारी मंजूरियां देश में बिजनेस करनेवालों के जी का जंजाल बनी हुई है। एक एमएसएमई इकाई शुरू करने के लिए बार-बार 57 अनुपालन और केवल पर्यावरण, स्वास्थ्य व सुरक्षा से जुड़े 18 विभिन्न अधिकारियों से 17 अनुमोदन/लाइसेंस लेने पड़ते हैं। हमारे कानून में उद्योग-धंधे संबंधी 75% रेग्य़ुलेशन ऐसे हैं जिनमें जेल तक की सज़ा का प्रावधान है। तमाम सरकारी एजेंसियां बिजनेस करनेवालों से डरा-धमकाकर वसूली करती रहती हैं। भ्रष्टाचार को पालते-पोसते ऐसे माहौल के ऊपर हर बिजनेसऔरऔर भी

मोदी सरकार देश की अर्थव्यवस्था के साथ 11 सालों से जीडीपी को बढ़ाकर दिखाने का छल कर रही है, जबकि ज़मीनी स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। खपत घट रही है। लोगों पर कर्ज बढ़ रहे हैं। कंपनियां देश में नया निवेश न करके बाहर भाग रही हैं। आम लोगों पर ही नहीं, उद्योग धंधों पर भी टैक्स का बोझ बढ़ता जा रहा है। जिस सॉफ्टवेयर क्षेत्र ने जमकर नौकरी दे रखी थी, वो छंटनीऔरऔर भी

जब रिजर्व बैंक तक मौद्रिक नीति समीक्षा में चालू वित्त वर्ष 2025-26 की पहली या जून तिमाही में जीडीपी की विकास दर के बहुत हुआ तो 6.5% रहने का अनुमान जा रहा था, तब सरकार ने शुक्रवार, 29 अगस्त को घोषित किया कि हमारा जीडीपी असल में 7.8% बढ़ा है। मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. नागेश्वरन ने जब प्रेस कॉन्फेंस में यह घोषणा की तो सभी अचंभित रह गए। हर तरफ जब अर्थव्यवस्था में समस्याएं ही समस्याएं दिखऔरऔर भी

रूस-यूक्रेन युद्ध थमने का नाम नहीं ले रहा। मध्य-पूर्व में इस्राइल ने सबके साथ युद्ध छेड़ रखा है। कभी ईरान तो कभी सीरिया और कभी यमन। गाज़ा में युद्ध-विराम की कोशिशों के बावजूद वो फिलिस्तीनियों को मिटाने तुला है। अपने यहां पहलगाम का आतंकी हमला। फिर ऑपरेशन सिंदूर और पाकिस्तान के साथ जंग। हर तरफ छाए युद्ध के इन हालात से भारत ही नहीं, दुनिया भर के शेयर बाज़ार हलकान हैं। लेकिन इसका मतलब नहीं कि बिजनेसऔरऔर भी

ट्रम्प की टैरिफ यंत्रणा से तिरुपति के टेक्सटाइल, आंध्र प्रदेश व ओडिशा के श्रिम्प व्यापार, सूरत के हीरा कारोबार, कानपुर के चमड़ा व भदोही के कालीन उद्योग और उत्तर, दक्षिण व पूरब-पश्चिम तक फैले कृषि निर्यातकों को गहरा सदमा लगेगा। लेकिन सनफार्मा, डॉ. रेड्डीज़ या फाइज़र जैसी दवा कंपनियों पर कोई फर्क पड़ेगा। साथ ही रिलायंस इंडस्ट्रीज़ के पेट्रोलियम उत्पाद और एप्पल के आईफोन भी पहले की तरह बेफिक्र अमेरिका पहुंचते रहेंगे। सरकार चीन, रूस, जापान, ब्रिटेन,औरऔर भी

डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत पर 25% टैरिफ के ऊपर 25% पेनाल्टी (भारतीय निर्यात पर कुल 50% टैक्स) लगाने का श्रीगणेश कल 27 अगस्त को गणेश चतुर्थी के दिन से कर दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने परममित्र से सीधे बात नहीं कर रहे, जबकि विदेश मंत्री एस. जयशंकर और वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल की चिल्लपो नक्कारखाने में तूती की आवाज़ बनकर रह गई है। प्रधानमंत्री मोदी स्वदेशी, आत्मनिर्भर भारत, निर्यात के नए रिकॉर्ड और किसी भी दबाव मेंऔरऔर भी

मोदी सरकार जनता की कीमत पर अपने मित्रों और अपना खज़ाना भरने में कितनी तत्पर है, इसका ताज़ा उदाहरण है रूस से किया जा रहे सस्ते कच्चे तेल का आयात। अमेरिका के ट्रेजरी सचिव ने बिना नाम लिए आरोप लगाया है कि इससे मुकेश अंबानी ने 1600 करोड़ डॉलर का अतिरिक्त मुनाफा कमाया है। कमाल है कि सरकार ने इस साल अप्रैल में पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज़ ड्यूटी घटाने के बजाय प्रति लीटर दो रुपए बढ़ा दी। सरकारऔरऔर भी

विदेश मंत्री एस. जयशंकर मॉस्को तक में रोना रो रहे हैं कि चीन रूस से सबसे ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है और भारत काफी कम। फिर भी भारत पर 25% टैरिफ के ऊपर 25% पेनाल्टी क्यों? इसका जवाब अमेरिका के दो शीर्ष पदाधिकारी पहले ही दे चुके हैं, जिसे जयशंकर सुनना नहीं चाहते। वहां के ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेस्सेंट का जवाब है कि चीन य़ूक्रेन युद्ध के पहले रूस से कच्चा तेल खरीदता रहा है। पहलेऔरऔर भी

शेयर बाज़ार डर और लालच की आदिम भावनाओं से चलता है। अक्सर ये भावनाएं इतनी हावी हो जाती हैं कि कंपनियों की मूलभूत स्थिति कोई मायने ही नहीं रखती। कंपनी का कोई धंधा ही नहीं। है भी तो अभी चल नहीं रहा। फिर भी उसके शेयर आसमान छूने लगते हैं। अडाणी ग्रीन एनर्जी का शेयर इसका शानदार उदाहरण रहा है, जब सच्चाई को नज़रअंदाज़ लालच उसके सिर चढ़कर बोल रहा था। हालांकि कभी-कभी कंपनियों के प्रवर्तकों सेऔरऔर भी