कंपनी कितनी भी अच्छी व मजबूत हो, उसके शेयरों को चढ़े हुए भाव पर खरीदने में कतई समझदारी नहीं है। असल में कंपनी के शेयरों के भाव के दो भाग होते हैं। एक निवेश का और दूसरा सट्टे का। मान लीजिए कि किसी कंपनी का प्रति शेयर मुनाफा (ईपीएस) पिछले चार सालों में 10, 8, 12 व 13 रुपए रहा है। इसके आधार पर तर्कसंगत अनुमान यह हो सकता है कि भविष्य में उनकी अर्जन क्षमता 11औरऔर भी

धन देशी-विदेशी हो या काला सफेद, उसका प्रवाह ही शेयरों के भाव तय करता है। इस प्रवाह की वजह कुछ हो सकती है, कोई अच्छी खबर, भावी संभावना या ऑपरेटरों का मैन्यूपुलेशन। रिटेल ट्रेडर को इसका पता तो ज़रूर होना चाहिए। लेकिन यह उसकी ट्रेडिंग रणनीति का हिस्सा नहीं हो सकता, क्योंकि उसके पास यह जानकारी तभी आती है जब बाज़ार और शेयरों के भाव इसे सोख चुके हैं। इसलिए उसे मानकर चलना चाहिए कि स्टॉक ट्रेडिंगऔरऔर भी

अपने शेयर बाज़ार में युवा निवेशकों की संख्या बढ़ती जा रही है। जुलाई 2025 तक की स्थिति के अनुसार हर पांच में से दो निवेशकों की उम्र 30 साल से कम है। इन 40% युवा निवेशकों को अच्छे रिटर्न की उम्मीद रही होगी क्योंकि बाज़ार ने 1995 से अब तक औसतन 12.5% सालाना रिटर्न दिया है और मार्च 2020 के बाद तो निफ्टी-500 का औसत सालाना रिटर्न 29% रहा है। लेकिन पिछले एक साल ने उनको निराशऔरऔर भी

शेयर बाजार की ट्रेडिंग तात्कालिकता का खेल है, लम्बे समय के निवेश का नहीं। अगर किसी को भ्रम है कि वो कंपनी के फंडामेंटल जानकर उसके शेयरों में ट्रेडिंग कर सकता है तो उसे डूबने से कोई नहीं बचा सकता। बाज़ार में उतरनेवाले हर ट्रेडर को मन में कहीं गहरे बैठा लेना होगा कि ट्रेडिंग दांव लगाने या सट्टेबाज़ी का ही खेल है। यह भी कि अगर हम अपने रिस्क को संभालकर चलें तो सट्टेबाज़ी अपने-आप मेंऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग विशुद्ध रूप से सट्टेबाज़ी का बिजनेस है, जबकि निवेश हमेशा कंपनी के हर पहलू को देख-परखकर समझदारी से किया जाता है। फिर भी दोनों में घाटा लगने की पूरी गुंजाइश है। यही शेयर बाज़ार का रिस्क है, जिसे कोई खत्म नहीं कर सकता। फिर भी हमें सट्टेबाज़ी और सच्चे निवेश के अंतर को समझना होगा। सच्चा निवेश वो है जिसमें कंपनी का बिजनेस मजबूत हो, लेकिन उसके शेयर अपने अंतर्निहित मूल्य से कमऔरऔर भी

शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग विशुद्ध रूप से कयासबाज़ी या सट्टेबाज़ी का खेल है। इसका कोई वास्ता कंपनियों के फंडामेंटल्स या बिजनेस के हाल-चाल से नहीं होता। अर्थव्यवस्था और आर्थिक नीतियों से भी इसका कोई सीधा रिश्ता नहीं। ट्रेडिंग में सबसे अहम है कि शेयर के भाव अभी क्या हैं और आगे कहां तक जा सकते हैं। फर्क समझें कि शेयरों में दीर्घकालिक निवेश बैक एफडी या प्रॉपर्टी में धन लगाने जैसा काम है, जबकि ट्रेडिंग विशुद्ध बिजनेसऔरऔर भी

जो शेयर बाज़ार का स्वभाव समझते हैं, वे जानते हैं कि यह उतार-चढ़ाव या मंदी और तेज़ी के चक्र में चलता है। बाज़ार गिरता है तो वे परेशान नहीं होते और बाज़ार उठता है तो वे हैरान नहीं होते। पिछले दो-ढाई दशक के अनुभव से एक बात बहुत साफ हो जाती है कि जिन्होंने भी अच्छी क्वालिटी के स्टॉक्स वाजिब भाव पर खरीदे हॆ, उन्होंने लम्बी अवधि या पांच-दस साल में जमकर मुनाफा कमाया है। अभी कीऔरऔर भी

इस सच से कोई इनकार नहीं कर सकता कि अपने शेयर बाज़ार में 95% ट्रेडर गंवाते और केवल 5% ट्रेडर ही कमाते है। सालों-साल से इस सच पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा। खुद पूंजी बाज़ार नियामक संस्था, सेबी ने ब्रोकरों से डेटा लेकर इस हकीकत की पुष्टि अपनी कई अध्ययन रिपोर्टों में की है। लेकिन हम ब्रोकरों से लेकर एनालिस्टों, स्टॉक एक्सचेंजों और सेबी व सरकार तक से उम्मीद नहीं कर सकते कि वे बाज़ार मेंऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में उथल-पुथल। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) भागे जा रहे हैं। चालू वित्त वर्ष 2025-26 में अब तक कभी खरीद तो कभी बिक्री करते हुए शेयरों से कुल मिलाकर ₹26,317 करोड़ निकाल चुके हैं। इसमें भी अगस्त में उन्होंने ₹34,993 करोड़ की शुद्ध निकासी की है, जबकि सितंबर के पहले पांच दिन में ही ₹12,257 करोड़ निकाले हैं। बीते वित्त वर्ष 2024-25 में उन्होंने ₹1,27,041 करोड़ निकाले थे। इस बार उथल-पुथल के भरे दौर में क्याऔरऔर भी

भारत यकीनन विकसित देश बन सकता है और बनेगा भी। लेकिन किसी व्यक्ति के चमत्कार या उसके हाथों में सारी सत्ता केंद्रित कर देने से नहीं, बल्कि संस्थाओं को मजबूत करने से। ईडी, सीबीआई, एनआईए, इनकम टैक्स विभाग तो कब के अपनी स्वायत्तता खोकर सरकारी गुलाम बन चुके हैं। नीति आयोग से लेकर प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद तक जी-हुजूरियों के मंच हैं। चुनाव आयोग पूरी तरह सत्तारूढ़ दल की कठपुठली बन चुका है। हाईकोर्ट और सुप्रीमऔरऔर भी