eye of the butterfly

यही कोई दोपहर बाद की बेला थी। तितली रानी दो घंटे से कमरे में फंसी हुई थी। लंबी-लंबी कांच की खिड़कियों से उसे रोशनी नजर आती तो बाहर निकलने के लिए वहीं से भागने की कोशिश करती। उसमें नरम, मुलायम, नाजुक पंख पारदर्शी कांच से टकराते और वो नहीं निकल पाती। पूरी मेहनत करती। पंख पूरे ज़ोर से चलाती। लेकिन हर बार वही हश्र क्योंकि जिसे वह खुला द्वार समझ रही थी, बाहर छिटकी हरियाली तक पहुंचनेऔरऔर भी

सृजन व संगीत की मधुर स्वर लहरियां शांत मन से ही निकलती हैं। झंझावात से बवंडर ही उठते हैं। चीख-चिल्लाहट के माहौल में सृजन नहीं हो सकता। इसे यह कहकर जायज नहीं ठहराया जा सकता कि विनाश सृजन की जमीन तैयार करता है।और भीऔर भी

मन कहता है भगत सिंह हों। बुद्धि कहती है कि मेरे घर नहीं, दूसरे के घर। बोल वचन में हम किसी से कम नहीं। लेकिन कर्म की अपेक्षा दूसरों से करते हैं। दूसरे नहीं करते तो दोष उनका। यूं ही कड़ी से कड़ी चलती जाती है और होता कुछ नहीं।और भीऔर भी

तन से मुक्ति तो एक निश्चित विधान के हिसाब से अंततः हर किसी को मिल ही जाती है। लेकिन मरने से पहले तन से मुक्ति मन की मुक्ति के बिना नहीं मिलती। और, मन की मुक्ति के लिए सच्चा ज्ञान जरूरी है जो बड़ी मेहनत से मिलता है।और भीऔर भी

जख्मों पर मक्खियां और दिमाग में अनर्गल विचार तभी तक भिनभिनाते हैं, जब तक हम अचेत या अर्द्धनिद्रा की अवस्था में रहते हैं। जगते ही हमारा सचेत प्रतिरोध तंत्र सक्रिय हो जाता है तो घातक विचार व परजीवी भाग खड़े होते हैं।और भीऔर भी

हमारा मन कहीं और भागता है तो विचारों के जरिए हम उसे पकड़ते हैं, संतुलित करते हैं। इन विचारों का निरपेक्ष सत्य होना कतई जरूरी नहीं। इनकी तात्कालिक भूमिका है मन के भटकाव को रोकना।और भीऔर भी

जमाने की सीधी चढ़ाई भावनाओं के मुलायम पोरों से नहीं, बुद्धि के कठोर नखों के दम पर पाई जा सकती है। जोंक जैसा चिपकने का गुण या बाघनखी जैसी पकड़। नहीं तो बार-बार आप फिसलते ही रहेंगे।और भीऔर भी

ये शरीर, हम और हमारा अवचेतन। अभिन्न हैं, फिर भी स्वतंत्र हैं। हम सोते हैं तो अवचेतन सुश्रुत वैद्य की तरह हमारी मरहम पट्टी में लग जाता है। शरीर तो मर्यादा पुरुषोत्त्म है। बस, हम ही बावले हैं।और भीऔर भी

होलिका व प्रह्लाद तो बहाना हैं। मकसद है हर साल नियम से तन, मन, रिश्तों व धरती में जमा कंकास को जलाकर खाक करना, उल्लास मनाना। अभी तो कंकास इतना है कि हर तिमाही होली की जरूरत है।और भीऔर भी

यहां हर चीज का अपना स्वतंत्र चक्र है। तन का भी और उससे जुड़े मन का भी। खुद को दूसरे के हवाले करते ही चक्र उसकी शर्तों पर ढल जाता है। पर मुक्ति अपने चक्र के अपनी शर्तों पर चलने से मिलती है।और भीऔर भी