शेयर बाज़ार बहुत-बहुत धनवालों और बैंकों, म्यूचुअल फंडों, बीमा कंपनियों व एफपीआई जैसे बड़े-बड़े संस्थागत निवेशकों का खेल है। इसमें आम लोगों को म्यूचुअल फंड के ज़रिए ही एंट्री लेनी चाहिए क्योंकि तब वे भी बड़ी निवेशक संस्था का हिस्सा बन जाते हैं। दुनिया भर का यही रिवाज़ है क्योंकि इसी में आम निवेशकों की सुरक्षा है। रिटेल ट्रेडर तो शुरू से ही महारथियों से पंगा लेता है। इसलिए आम या रिटेल ट्रेडर को बहुत हुआ तोऔरऔर भी

अभी भारतीय मध्यवर्ग की आबादी कितनी होगी, इसका कोई पक्का अनुमान या आधिकारिक आंकड़ा नहीं है। इसे हम 20 करोड़ मान लें तो इसका 67.85% हिस्सा फिलहाल शेयर बाज़ार से जुड़ चुका है। देश के सबसे पुराने स्टॉक एक्सचेंज बीएसई की वेबसाइट के मुताबिक, 12 जुलाई 2023 तक अपने यहां रजिस्टर्ड निवेशकों की संख्या 13,56,95,100 पर पहुंच चुकी है। इसमें साल भर में 23.86% की शानदार वृद्धि हुई है। सबसे ज्यादा 2,67,47,397 पंजीकृत निवेशक महाराष्ट्र में हैं।औरऔर भी

मध्यवर्ग ही वह तबका है जिसके पास अपनी तात्कालिक और आकस्मिक ज़रूरतों को पूरा करने के बाद इतना धन बचता होगा कि वह शेयर बाज़ार में निवेश कर सके। जिन 81.5 करोड़ लोगों को सरकार मुफ्त पांच किलो अनाज दे रही है, वे तो पेट भर लें, यही काफी है। वहीं, साल भर में 8 लाख रुपए या महीने भर में 66,667 तक कमानेवालों को आरक्षण के लिए आर्थिक रूप से गरीब माना गया है। वैसे, हमऔरऔर भी

भारत में मध्यवर्ग ही है जो मॉल लेकर मल्टीप्लेक्स तक मेला लगाता है। इसी पर दुनिया के बड़े ब्रांड फोकस करते हैं। यही मध्यवर्ग है जिसका एक हिस्सा शेयर बाज़ार में निवेश व ट्रेडिंग करता है। आखिर यह वर्ग कितना बड़ा है और इसकी आबादी कितनी होगी? दो-तीन दशक पहले तक इसकी संख्या 15 से 25 करोड़ बताई जाती थी। अब तो यह संख्या 40 से 50 करोड़ कही जाने लगी है। लेकिन जानकार इस वर्ग कीऔरऔर भी

एचएनआई देश छोड़कर भागे जा रहे हैं तो विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई या एफआईआई) की मार का सामना कौन करेगा? क्या यह काम देशी संस्थागत निवेशक (डीआईआई) कर सकते हैं? कभी नहीं। आप शेयर बाज़ार में हर दिन कैश सेगमेंट में हो रही खरीद-फरोख्त के आंकड़े देखें तो पता चलेगा कि एफपीआई के साथ तो उनकी जबरदस्त जुगलबंदी चल रही है। वे खरीदते हैं तो ये बेचते हैं और इनकी खरीद को वे अपनी बिकवाली से पूराऔरऔर भी

खूब हल्ला है कि मोदी सरकार के नौ सालों में दुनिया की पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाने के बाद भारत का पासपोर्ट बहुत मजबूत हो गया है। हकीकत क्या है? जापान का पासपोर्ट दुनिया में सबसे मजबूत है क्योंकि वो हो तो 193 देशों में या तो वीसा लेने की जरूरत नहीं होती या पहुंचने पर वीसा मिल जाता है। फिर सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, जर्मनी व स्पेन का नंबर है। फिनलैंड जैसे छोटे देश का पासपोर्टऔरऔर भी

अच्छी बात यह है कि रोज़ी-रोज़गार से लेकर बेहतर जीवन के अवसरों की तलाश में परदेश चले गए भारतीय अपने लोगों को नहीं भूल जाते। वे बराबर अपनी कमाई का एक हिस्सा परिजनों को भेजते रहते हैं। साल 2022 में उनके द्वारा देश में भेजी गई रकम 24% बढ़कर 111 अरब डॉलर पर पहुंच गई। यह रकम दक्षिण एशिया में प्रवासी नागरिकों द्वारा भेजी गई कुल विदेशी मुद्रा का 63% थी और विश्व बैंक के 100 अरबऔरऔर भी

भारत में दस लाख डॉलर (8.2 करोड़ रुपए) से ज्यादा की दौलतवाले करीब 3,44,600 एचएनआई (हाई नेटवर्थ इंडीविजुअल्स) हैं। इनमें से दस करोड़ डॉलर (820 करोड़ रुपए) से ज्यादा की दौलतवाले 1078 और एक अरब डॉलर (8200 करोड़ रुपए) से ज्यादा की दौलतवाले 123 लोग हैं। देश छोड़कर बाहर बसने की वजह राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक हो सकती है। हेनली एंड पार्टनर्स के सीईओ युर्ग स्टेफन का कहना है कि राजनीतिक स्थिरता, कम टैक्स और निजी स्वतंत्रताऔरऔर भी

देश छोड़कर परदेशी बनते भारतीयों में रोज़ी-रोजगार के चक्कर में खाड़ी देशों से लेकर कनाडा तक बसनेवाले गरीब ही नहीं, बल्कि करोड़पति व अरबपति तक शामिल हैं और यह सिलसिला कहीं थमता नहीं दिख रहा। जून में आई हेनली प्राइवेट वेल्थ माइग्रेशन रिपोर्ट 2023 के मुताबिक इस साल भारत से 6500 ऐसे हाई नेटवर्थ व्यक्ति (एचएनआई) विदेश जाकर बसने की तैयारी में हैं जिनकी दौलत दस लाख डॉलर (8.2 करोड़ रुपए) से ज्यादा है। पिछले साल 2022औरऔर भी

कुत्ता पीछे पड़ जाए तो भागते-भागते दम निकल जाता है और धन पीछे पड़ जाए तो शेयर बाज़ार कुलांचे मारने लगता है। अपने शेयर बाज़ार का यही हाल है। विदेशी धन के पीछे पड़ने से बाज़ार नए ऐतिहासिक शिखर पर जा पहुंचा है। अकेले दो दिन में ही विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) ने अपने शेयर बाज़ार के कैश सेगमेंट में करीब 18,750 करोड़ रुपए की शुद्ध खरीद की है। जून महीने में उन्होंने इक्विटी में कुल 47,148औरऔर भी