मानते हैं कि अर्थव्यवस्था या जीडीपी के बढ़ने और शेयर बाज़ार के चढ़ने में सीधा रिश्ता है। लेकिन हकीकत ऐसी नहीं दिखती। चीन का जीडीपी जब जमकर बढ़ रहा था, तब वहां का शेयर बाज़ार धीमी गति से चल रहा था। भारत के जीडीपी के विकास दर जब ज्यादा चल रही थी, तब सुस्त गति से बढ़ते अमेरिका के शेयर बाज़ार ने अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को भारत से कहीं ज्यादा रिटर्न दिया था। इस समय भी जब हमाराऔरऔर भी

बीते वित्त वर्ष 2022-23 के मुनाफे/ईपीएस को आधार बनाएं तो सेंसेक्स अभी 25.41 और निफ्टी 23.97 के पी/ई अनुपात पर ट्रेड हो रहा है। निफ्टी-50 में शामिल कंपनियों का शुद्ध लाभ अगले दो साल में 13% की सालाना चक्रवृद्धि दर से बढ़ता है तो उसका फॉरवर्ड पी/ई घटकर 19 के आसपास आ जाता है। इसलिए कुछ जानकार बाज़ार को सस्ता बता सकते हैं। लेकिन सब कुछ मन का धन है। कंपनियों का मुनाफा ठहरा रहता है, तबऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में सक्रिय सभी लोगों का सम्मिलित मनोविज्ञान शेयरों के भाव और शीर्ष सूचकांकों में झलकता है। इन लोगों में देशी-विदेशी संस्थागत निवेशकों के फंड मैनेजर, हाई नेटवर्थ व्यक्ति (एचएनआई), प्रोफेशनल ट्रेडर और सुलझे हुए धनवान निवेशक तक शामिल हैं। इन सबका आत्मविश्वास, आशावाद व सकारात्मक नज़रिया जब हद से पार चला जाता है तो बाज़ार में अतिशय लालच और निश्चिंतता का सुरूर चढ़ जाता है। सकारात्मक तत्व नकारात्मक हालात पैदा कर देते हैं। इतिहास गवाहऔरऔर भी

बाज़ार बढ़ जाता है तो दराज़ में रखी विशेषज्ञों की व्याख्याएं बाहर निकलकर फड़फड़ाने लगती हैं। वे बताते हैं कि मुद्रास्फीति घट रही है, ब्याज दरें बढ़ाने का सिलसिला रुक चुका है, वैश्विक अर्थव्यवस्था पटरी पर आ रही है, देश में राजनीतिक स्थिरता है, यूक्रेन पर रूस का हमला खत्म हो सकता है, आदि-इत्यादि। बाज़ार अचानक गिर जाए तो दराज़ से विशेषज्ञों की व्याख्या का दूसरा सेट निकल आएगा। सब बकवास है। पारम्परिक ज्ञान कहता है किऔरऔर भी

निफ्टी-50 सूचकांक 20,000 पर पहुंचते-पहुंचते रह गया। हफ्ते-दो हफ्तें में वहां पहुंच सकता है। फिर दो-चार साल में 30,000 तक भी चला जाएगा। हमारी अर्थव्यवस्था अभी 3.32 लाख करोड़ या ट्रिलियन डॉलर की है। कुछ साल में 5 ट्रिलियन और फिर 10 ट्रिलियन डॉलर की हो जाएगी। भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। कुछ साल में जर्मनी, जापान से आगे निकल तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। यह विकास की सहज स्वाभाविक गति है। उसीऔरऔर भी

शेयर बाज़ार समझदारों का खेल नहीं है। यह तो लालच और डर की भावनाओं में खिंचते व भागते धनवानों का खेल है। यह दरअसल नीलामी का बाज़ार का है जिसमें भविष्य की सोच कर दांव लगा दिया जाता है जो गलत भी पड़ सकता है और सौदा आगे जाकर गले की हड्डी बन सकता है। वहीं, रीयल एस्टेट बाज़ार समझदार व बुद्धिमान ग्राहक समझदार व बुद्धिमान ग्राहक के साथ सौदा करता है। इसलिए रीयल एस्टेट बाज़ार मेंऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में ओवर-ट्रेडिंग करना धन ही नहीं, तन व मन के लिए भी घातक है। साफ समझ लें कि ट्रेडिंग पूरी तरह मनोविज्ञान व सहज मानव-प्रवृत्तियों पर चलनेवाला खेल है। जितना ज्यादा आवेश में रहेंगे, उतना ही ज्यादा दूसरों के शिकार बन सकते हैं। इसलिए ट्रेडिंग में नियमित रूप से ब्रेक लेते रहना ज़रूरी है। अच्छा ट्रेड कर लिया, बड़ा मुनाफा कमा लिया, तब भी कुछ दिन शांत रहना चाहिए क्योंकि तब आपको लगने लगता हैऔरऔर भी

शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग एक तरह का बिजनेस है, टैक्स के लिहाज़ से भी और धंधे व समय के लिहाज़ से भी। इसलिए इसमें व्यापारी की तरह सारे खर्च घटाकर ही अपना शुद्ध लाभ गिनना चाहिए। स्टॉप-लॉस तो इस बिजनेस का अनिवार्य व अपरिहार्य खर्च है ही, जिसके कोई ट्रेडर बच नहीं सकता। साथ ही उसे यह भी साफ-साफ पता होना चाहिए कि वह ब्रोकरेज़, एसटीटी (सिक्योरिटी ट्रांजैक्शन टैक्स), जीएसटी, एक्सचेंज ट्रांजैक्शन चार्ज, इम्पैक्ट कॉस्ट व सेबीऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में तेज़ी के मौजूदा दौर में जब कचरा स्टॉक्स तक उड़े जा रहे हों, तब तक रिटेल ट्रेडर के लिए पहला नियम यह होना चाहिए कि वो हमेशा मूलभूत रूप से मजबूत कंपनियों के स्टॉक्स ही चुने। इनमें भी तभी एंट्री ली जाए, जब वे तात्कालिक मुनाफावूली के चलते थोड़ा नीचे आ गए हों। अगर हल्की कंपनी के स्टॉक्स ले लिए तो वे उड़ते-उड़ते कभी भी धड़ाम हो सकते हैं। वहीं, मजबूत कंपनी के शेयरऔरऔर भी

शेयर बाज़ार साफ तौर पर तेज़ी के दौर या अंग्रेज़ी में कहें बुल फेज़ में है। जो भी कंपनियां मूलभूत रूप से या फंडामेंटली मजबूत हैं, उनमें से ज्यादातर के शेयर ऐतिहासिक शिखर तक जा पहुंचे हैं। जिनके शेयर ठंडे पड़े हैं, उनमें निवेश तो किया जा सकता है, लेकिन ट्रेडिंग नहीं। ऐसे में आज आम ट्रेडर के दिमाग में सबसे बड़ा सवाल है कि वह किन स्टॉक्स में ट्रेड करे। इंट्रा-डे ट्रेडर के लिए कोई समस्याऔरऔर भी