कमाल की बात है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद मानते हैं कि वे श्रेय की राजनीति करते हैं। 9 फरवरी को राज्यसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव में उहोंने कहा था, “गांधी जी कहते थे श्रेय और प्रिय। हमने श्रेय का रास्ता चुना।” अनजाने में कही यह बात उनकी हर हरकत में झलकती है। मगर, दिक्कत यह है कि उपलब्धियों का श्रेय लेने में वे झूठ की अति कर देते हैं। लेकिन कमियों-खामियों पर फूटीऔरऔर भी

नेकी कर दरिया में डाल। यह महज एक कहावत नहीं, बल्कि भारत की लम्बी परम्परा है। इतिहास गवाह है कि रेगिस्तान से घिरे, पानी को तरसते राजस्थान में जब वहां के सेठों ने पक्की बावडियां बनवाईं तो उन पर कहीं नाम नहीं लिखवाया। लोगों ने बहुत कहा तो वे बावड़ी की तलहटी में अपना नाम लिखवाने को तैयार हुए। लेकिन आज वही भारत है, जहां ऐसा प्रधानमंत्री है जो देश में किए गए हर छोटे-बड़े काम काऔरऔर भी

बाज़ार की शक्तियां जितना मुक्त होकर काम करेंगी, उनकी दक्षता उतनी ही अधिक होगी। लेकिन रिजर्व बैंक देश के भीतर ही नहीं, देश के बाहर भी रुपए से जुड़े करेंसी डेरिवेटिव्स को कंट्रोल करने की फिराक में है। उसने इसी साल अप्रैल में प्रस्ताव रखा ताकि वो ऑफशोर बगैर-डिलीवरी वाले फॉरवर्ड (एनडीएफ) बाज़ार पर नियंत्रण कर सके। उसका कहना है कि इस बाज़ार में सक्रिय इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म (ईटीएफ) उसके पास पंजीयन कराएं क्योंकि इन पर भारतऔरऔर भी

बाज़ार जितना विकसित, जितने ज्यादा भागीदार और वोल्यूम जितना ज्यादा, उसमें ताकतवर शक्तियों द्वारा जोड़-तोड़ करने की गुंजाइश उतनी ही कम हो जाती है। यह बात आम बाज़ार के साथ ही शेयर व करेंसी बाज़ार समेत समूचे वित्तीय बाज़ार पर लागू होती है। नियामक संस्थाओं का काम बाज़ार का नियंत्रण नहीं, बल्कि नियमन है ताकि वो अच्छी तरह विकसित हो सके। लेकिन इस साल के शुरू में बैंकिंग व मुद्रा क्षेत्र के नियामक रिजर्व बैंक ने ऐसाऔरऔर भी

कहा और माना जाता है कि अपने यहां रुपया पूरी तरह बाज़ार के हवाले हैं, फ्लोटिंग विनिमय दर की व्यवस्था है। लेकिन ऐसा है नहीं। रिजर्व बैंक बराबर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपए की विनिमय दर को मैनज करता है। रुपया ज्यादा न गिरे, इसके लिए विदेशी मुद्रा भंडार से बाज़ार में डॉलर डाल देता है और रुपया ज्यादा न चढ़े, इसके लिए बाज़ार से डॉलर खींच लेता है। हालांकि वो कहता है कि विनिमय दर कीऔरऔर भी

ग्लोबल होती जा रही दुनिया में देश की मुद्रा का कमज़ोर होना कोई बुरी बात नहीं, बशर्ते वो देश आयात से ज्यादा निर्यात करता हो। लेकिन रुपए का कमज़ोर होते जाना भारत के लिए कतई अच्छा नहीं है क्योंकि हमारा निर्यात सीमित है और हम कहीं ज्यादा आयात करते हैं। यह उन भारतीय परिवारों के लिए भी बुरा है जो अपने बच्चों को अमेरिका या यूरोप पढ़ने के लिए भेजते हैं। डॉलर की तो बात ही छोड़िए,औरऔर भी

बाज़ी हाथ से सरकती जा रही है। सामाजिक नीति व अर्थनीति ही नहीं, राजनीति तक में। दस साल तक देश में जिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तूती बोलती थी, आज जब वे पोलैंड और यूक्रेन के दौरे से वापस देश लौटते हैं तो गिनती के दो अधिकारी उन्हें रिसीव करने पहुंचते हैं। अफसरशाही में लैटेरल एंट्री का फैसला लेते हैं, लेकिन अंदर-बाहर के दवाब में उन्हें चंद दिनों में ही वापस लेना पड़ता है। यूट्यूबर को रोकनेऔरऔर भी

समाचार एजेंसी रॉयटर्स की मानें तो भारत में सालाना ₹30 लाख से ज्यादा कमानेवाले अमीर परिवारों की संख्या वित्त वर्ष 2020-21 के 1.07 करोड़ से 2030-31 तक बढ़कर 3.5 करोड़ हो सकती है। दूसरी तरफ साल में ₹1.25 लाख से भी कम कमानेवाले गरीब परिवारों की संख्या वित्त वर्ष 2020-21 के 4.52 करोड़ से घटते-घटते 2030-31 में 1.99 करोड़ और 2046-47 तक मात्र 72 लाख पर आ सकती है। तब देश के ज्यादातर गरीब परिवार ग्रामीण इलाकोंऔरऔर भी

भारत का मध्य वर्ग पिछले दस साल से मोदी सरकार और भाजपा का समर्थक रहा है क्योंकि उसे लगता था कि वो आर्थिक विकास को गति देकर रोज़ी-रोज़गार व समृद्धि के अवसर पैदा करेगी। लेकिन अब उसे लगने लगा है कि मोदी सरकार इसके बजाय अपने मुठ्ठी भर यारों पर देश के संसाधन लुटा रही है, जबकि मध्य वर्ग की हालत खस्ता है और उसे अपनी गाढ़ी कमाई पर लगातार ज्यादा से ज्यादा टैक्स देना पड़ रहाऔरऔर भी

उपभोक्ता साजोसामान बनानेवाली विदेशी कंपनियां और फाइनेंस के खेल से जमकर कमाने की चाह में लगे विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक दशकों से भारत पर फिदा हैं क्योंकि यहां का मध्य वर्ग उन्हें कई देशों से बड़ा बाज़ार नज़र आता है। भारत सरकार के पास अभी तक इसकी कोई गणना नहीं है कि देश के मध्य वर्ग का आकार कितना है। लेकिन विदेशी संस्थाओं के मुताबिक यह हमारी 144 करोड़ की आबादी का लगभग 30% यानी 43.20 करोड़ केऔरऔर भी