समाज बार-बार जमकर जड़ होती और टूटकर फिर से बनती सत्ता का नाम है। यथास्थिति बनी रही तो कुशल है। अन्यथा बवाल मच जाता है। नया कुछ करनेवालों को समाज का बहुमत नकारता है। लेकिन अल्पमत को लेकर वही लोग नया समाज बनाते हैं।और भीऔर भी

शब्दों का शोर है, घटाटोप है। अर्द्धसत्य का बोलबाला है। हर कोई अपने स्वार्थ के हिसाब से सत्य को परिभाषित करने में जुटा है। ऐसे में निरपेक्ष सत्य क्या है? बहुजन के हितों का पोषक सत्य क्या है? यह खुद बहुजन को ही खोजकर निकालना होगा।और भीऔर भी

बाजार लोगों की सोच का गुलाम नहीं है। दिसंबर का महीना मंदड़ियों की जकड़ में रहा, जबकि बाजार के लोग अच्छी रैली की उम्मीद कर रहे थे। जनवरी में बाजार के लोग 10 फीसदी गिरावट की उम्मीद कर रहे हैं। लेकिन डेरिवेटिव सौदों में कैश सेटलमेंट की व्यवस्था के चलते बाजार वर्तमान सेटलमेंट के अंतिम दिन 25 जनवरी तक निफ्टी को 5000 तक ले जा सकता है। अगर ऐसा नहीं हुआ तो वे जो चाहते हैं, उन्हेंऔरऔर भी

लोकतंत्र में फैसले लेना बड़ा आसान है क्योंकि बहुमत की राय आसानी से जानी जा सकती है। फैसलों में मुश्किल तब आती है कि कोई सरकार बहुमत के नाम पर अल्पमत का हित सब पर थोपना चाहती है।और भीऔर भी