संस्थागत निवेशक शेयर बाजार में कभी भावों को भगवान नहीं मानते। उन्हें अच्छी तरह पता है कि वे भावों को अपनी खरीद या बिकवाली के दम पर आसमान पर पहुंचा या पाताल तक गिरा सकते हैं। इन संस्थागत निवेशकों में तमाम एफपीआई के साथ-साथ देशी म्यूचुअल फंड और एलआईसी जैसी बीमा कंपनियां शामिल हैं। हां, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की ताकत देशी सस्थाओं पर अक्सर भारी पड़ती है। इनका प्रमाण है एचडीएफसी और इन्फोसिस जैसी दमदार कंपनियोंऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में पुराने किस्म के अधिकांश ट्रेडर भावों को भगवान मानते हैं। यह रिटेल ट्रेडर के नज़रिए से एक हद तक सही भी है क्योंकि भावों पर उनका कोई वश नहीं होता। जिस तरह दरिया में दो-चार जग ही नहीं, कई बाल्टी भी पानी डाल देने से कोई फर्क नहीं पड़ता, उसी तरह रिटेल ट्रेडरों की खरीद-फरोख्त का शेयरों के भाव पर कोई खास असर नहीं पड़ता। फर्क पड़ता है बांध का पानी खोलने से। मुश्किलऔरऔर भी

शेयरों के भावों को कभी दिल पर नहीं लेगे, उनको लेकर भावुक नहीं होंगे, तभी उनके पैटर्न को समझ सकते हैं। देखने की पहली चीज यह है कि किसी शेयर में फिलहाल सटोरियों की कितनी सक्रियता है। यह उसमें डिलीवरी वाले सौदों के प्रतिशत से पता चल जाता है। बीएसई व एनएसई की वेबसाइट हर शाम इसकी जानकारी दे देती है। अगर ऐसे सौदे 60-70% से ज्यादा है तो यह उन्हें खरीदने का पहला सिग्नल है। बाकीऔरऔर भी

शेयर बाज़ार लिस्टिंग कंपनियों के उठते-गिरते भावों का ही खेल है। यहां आधे से ज्यादा सौदे तो सटोरियों के होते हैं, जिनका सचमुच खरीदने-बेचने से कोई वास्ता नहीं होता। वे तो बस भाव बोलते हैं और दिन के दिन में भावों का अंतर काटकर निकल जाते हैं। मसलन, शुक्रवार को रिलायंस इंडस्ट्रीज़ में डिलीवरी वाले सौदे 45.44%, विप्रो में 42.19%, टाइटन में 46.67% और भारती एयरटेल में 33.59% ही थे। वैसे, डिलीवरी वाले सौदों का आधे सेऔरऔर भी

डर इस बात का है कि जरा-सी आशा और गहरी निराशा के बीच डूबते-उतराते शेयर बाज़ार में सालोंसाल से ट्रेड कर रहे प्रोफेशनल व रिटेल ट्रेडर कहीं अंततः हाथ न खड़ा कर दें। बोल पड़े कि यह लै अपनी लकुटि कमरिया, बहुतहिं नाच नचायो। ट्रेडरों के लिए इसका कोई व्यावहारिक समाधान तो नहीं नज़र आता। लेकिन विकल्प हो तो उन्हें कुछ समय के लिए निवेशक बन जाना चाहिए। बाजार का कोई भरोसा नहीं। मंदी के माहौल मेंऔरऔर भी

शेयर बाज़ार के ट्रेडर का यूं फ्यूचर्स को छोड़ ऑप्शंस की तरफ भागना काफी चिंताजनक है। कारण यह है कि ऑप्शंस को खरीदना भले ही फ्यूचर्स की तुलना में बहुत सस्ता हो, लेकिन ऑप्शंस में घाटे की खोह बहुत गहरी और उसकी गणना काफी जटिल है, जबकि फ्यूचर्स में घाटे की गणना सीधी-सरल व आसान है। निफ्टी फ्यूचर्स में एक समय तीन ही सीरीज अपलब्ध होती है। जैसे अभी जुलाई, अगस्त व सितंबर की सीरीज में सौदेऔरऔर भी

भाव कोई भगवान नहीं तय करता। शेयर बाज़ार में भाव वही होते हैं जो ट्रेडर देने को तैयार होते हैं। इस समय निफ्टी फ्यूचर्स का भाव स्पॉट से बहुत मामूली प्रीमियम या डिस्काउंट तक पर इसलिए चल रहा है क्योंकि फ्यूचर्स में हर दिन मार्क-टू-मार्केट का सिस्टम है और ट्रेडर मार्क-टू-मार्केट घाटा उठाने की न तो स्थिति में हैं और न ही इसके लिए तैयार हैं। वे बहुत हाथ-पैर मार रहे हैं। लेकिन इस दुर्दशा से निकलनेऔरऔर भी

निफ्टी फ्यूचर्स का साथ इधर समस्या यह चल रही है कि निफ्टी के स्पॉट भाव से वह बेहद मामूली प्रीमियम पर रहता है और बहुत बार तो डिस्काउंट या नीचे चला जाता है। इस डिस्काउंट का सीधा-सा मतलब यह हुआ कि ट्रेडर निफ्टी के बढ़ने की गुंजाइश नहीं देख रहे तो उसके फ्यूचर्स कम भाव पर बेचने को तैयार हैं। यह बाज़ार के लिए बेहद दुखद और अफसोसनाक है। मंदी की धारणा ने उनको ऐसा जकड़ लियाऔरऔर भी

शेयर बाज़ार के आम ट्रेडर परेशान हैं, ऑप्शंस ट्रेडर हैरान हैं तो फ्यूचर्स ट्रेडर भी कोई कम हैरान-परेशान नहीं। वे तो बेहद जटिल, अनोखी व गंभीर चुनौती झेल रहे है। ऐसी पहेली जिससे हम अक्सर रू-ब-रू नहीं होते। जब सरकारी बॉन्डों की यील्ड यानी रिस्क-फ्री ब्याज दर बढ़ रही हो, तब ऑप्शंस के साथ ही फ्यूचर्स का प्रीमियम बढ़ जाना चाहिए क्योंकि तब सौदे को कैरी करने की लागत बढ़ जाती है। प्रीमियम का सीधा रिश्ता उसऔरऔर भी

इन दिनों इंट्रा-डे ट्रेडर खुश हैं क्योंकि वे लहरों की उछलकूद से अच्छा कमा सकते हैं। निफ्टी-50 अक्सर दिन भर में 50-100 नहीं, बल्कि 150-200 अंक से ज्यादा के दायरे में नीचे-ऊपर होता है। लेकिन कम पूंजी लेकर निफ्टी ऑप्शंस पर दांव लगानेवाले बड़े व्यथित हैं। मालूम हो कि ऑप्शंस साधारण बीमा की तरह हैं जिनकी मीयाद के दौरान आपने इस्तेमाल कर लिया तो ठीक, नहीं तो मीयाद खत्म होने पर उनका कोई मूल्य नहीं रह जाता।औरऔर भी