दुनिया भर में शेयर बाज़ार में निवेश व ट्रेडिंग के उस्तादों पर जैक श्वैगर ने ‘मार्केट विज़ार्ड्स’ नाम की किताबों की पूरी सीरीज लिख रखी है। जॉर्ज सोरोस और उनके पूर्व पार्टनर जिम रोजर्स ने अपनी निवेश रणनीति पर अनेक किताबें लिखी हैं। वॉरेन बफेट पर तो बाज़ार में अनगिनत किताबें हैं। उन्हें दुनिया के महानतम निवेशकों में गिना जाता है। उन्होंने सात दशकों में करीब 10,000 करोड़ डॉलर (करीब 8 लाख करोड़ रुपए) की दौलत कमाईऔरऔर भी

भारत में विकासगाथा में अटूट विश्वास शेयर बाज़ार के निवेश में राकेश झुनझुनवाला की अप्रतिम सफलता का मूलाधार बन गया। जिस वॉरेन बफेट से उनकी तुलना की जाती है, उन्होंने उनसे ज्यादा कमाया। लेकिन वॉरेन बफेट की सफलता और निवेश रणनीति पर अनेकों-अनेक किताबें हैं, जबकि राकेश झुनझुनवाला पर एक भी नहीं। अपने यहां यही दिक्कत है कि राजनेताओं के मरने से पहले ही उनके जीवनवृत्त लिख लिए जाते हैं और मरने के चंद दिन बाद छापऔरऔर भी

अपने शेयर बाज़ार में हर्षद मेहता निपट गए। केतन पारेख का चांद भी डूब गया। लेकिन राकेश झुनझुनवाला का सितारा मरते दम तक चमकता रहा, दौलत बढ़ती रही। इसकी दो साफ वजहें हैं। एक तो यह कि राकेश ने कभी ठगी या फ्रॉड का सहारा नहीं लिया, न ही उन्होंने कभी फिक्सर का काम किया, जबकि हर्षद मेहता से लेकर केतन पारेख तक हमेशा सिस्टम को मैन्यूपुलेट करते रहे, उससे खेलते रहे। वहीं, झुनझुनवाला समय व हालातऔरऔर भी

दुनिया के अधिकांश शीर्ष निवेशकों ने दूसरों का धन निवेश करके रिटर्न कमाया। उनका प्रमुख माध्यम हेज फंड रहा। लेकिन राकेश झुनझुनवाला अपना ही धन गुना-दर-गुना करते रहे। आम लोगों के लिए उनकी सलाह यही रहती कि सीधे स्टॉक्स के बजाय म्यूचुअल फंड के जरिए शेयर बाज़ार में निवेश करो। लेकिन वे खुद जमकर रिस्क लेते थे। यहां तक कि उधार लेकर भी धन लगाते थे। वे भारतीय बाज़ार की तेज़ी को लेकर इतने आश्वस्त थे किऔरऔर भी

दुनिया में जॉर्ज सोरोस, स्टेनली ड्रकेनमिलर व वॉरेन बफेट जैसे दिग्गज निवेशकों का रिटर्न अमूमन 20% तक रहता आया है। कभी-कभार ही वह 30% से ऊपर पहुंचता है। निवेश से जमकर कमाना कोई बाएं हाथ का खेल नहीं है। लेकिन राकेश झुनझुनवाला ने अपनी बहुत छोटी-सी टीम के साथ अकेले दम पर शेयर बाज़ार से शानदार रिटर्न कमाया। उनके ज्यादा रिटर्न कमानेवाले जेम्स साइमंस एक तो खुद गणितज्ञ हैं, दूसरे उन्होंने बेहद मेधावी गणितज्ञों व भौतिकविदों कीऔरऔर भी

बताते हैं कि राकेश झुनझुनवाला में 1985 में ₹5000 से अपनी निवेश यात्रा शुरू की। 14 अगस्त 2022 को जब हार्ट-अटैक से उनका निधन हुआ, तब उनके निवेश का कुल बाज़ार मूल्य एक अनुमान के मुताबिक ₹50,000 करोड़ और दूसरे अनुमान के मुताबिक ₹30,000 करोड़ रुपए था। पहले अनुमान में उनके सालाना चक्रवृद्धि रिटर्न की दर (सीएजीआर) 64.52% निकलती है, जबकि दूसरे अनुमान में यह 62.26% निकलती है। इतना रिटर्न न वॉरेन बफेट कमा पाए हैं, नऔरऔर भी

राकेश झुनझुनवाला को भारत का वॉरेन बफेट कहा जाता था। बफेट दुनिया में महानतम निवेशकों में शुमार हैं। 1930 में जन्मे बफेट 92 साल की उम्र में अब भी सक्रिय हैं, जबकि 1960 में जन्मे झुनझुनवाला महीने भर पहले 62 साल की उम्र में दुनिया से विदा हो गए। लेकिन शायद ही कोई जानता है कि निवेश में झुनझुनवाला बफेट से कहीं ज्यादा कामयाब रहे। बफेट ने अपने पहले निवेश उद्यम में 1957 से 1968 तक 31.6%औरऔर भी

कभी तेज़ी तो कभी मंदी के बीच हिचकोले खाता हमारा शेयर बाज़ार आखिर लम्बी तेज़ी का हाईवे कब पकड़ सकता है? इसका जवाब सीधे-सीधे अर्थव्यवस्था में पूंजी निवेश के चक्र से जुड़ा हुआ है। साल 2003 से 2007 के बीच देश में जमकर पूंजी निवेश का चक्र चला तो उस दौरान बीएसई सेंसेक्स सात गुना बढ़ गया, जबकि बीएसई स्मॉलकैप सूचकांक तो 16 गुना चढ़ गया। जानकार मानते हैं कि हम फिलहाल वैसे ही पूंजी निवेश केऔरऔर भी

वैसे तो शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग से लेकर निवेश तक में सफलता का सारा खेल प्रायिकता पर निर्भर है। लेकिन आज के दौर में जब पलड़ा न इधर भारी हो न उधर, तब प्रायिकता या प्रोबैबिलिटी पर आधारित रणनीति ही सबसे माकूल हो सकती है। प्रायिकता की गणना सांख्यिकी का विषय है। लेकिन आम बोलचाल में हम इसे किसी स्टॉक या सूचकांक के बढ़ने की संभावना और गिरने की आशंका से समझ सकते हैं। यह भी एकऔरऔर भी

ट्रेडर भागते हैं तो निवेशक संभाल लेते हैं और निवेशक भागते हैं तो ट्रेडर आगे आ जाते हैं। शायद यही वजह है कि अपने यहां अक्टूबर 2021 से विदेशी पोर्टपोलियो निवेशकों के बराबर निकलते रहने के बावजूद शेयर बाज़ार धराशाई नहीं हुआ। भारतीय निवेशकों व ट्रेडरों में अभी तक कहीं न कहीं आस बची हुई है। अमूमन, जब हर तरह के निवेशकों व ट्रेडरों पर तेज़ी का सुरूर सवार हो जाता है, तब तेजी का नया दौरऔरऔर भी