इस बार औसत बारिश नहीं होने की आशंका निजी मौसम निगरानी संस्था स्काईमेट ने भी जताई है। उसका आकलन है कि इस बार मानसून सामान्य नहीं, बल्कि उससे कमज़ोर रहेगा और बारिश औसत की 94% ही हो सकती है। ऐसा अल-निनो के चलते होगा। इसके असर से पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में काफी कम बारिश होगी और सूखे के हालात बन सकते हैं। नतीज़तन, खरीफ की फसलों पर बुरा असर पड़ेगा। धान से लेकर मोटेऔरऔर भी

आशावाद अच्छी चीज़ है। लेकिन इसे झूठ नहीं, सच आधारित होना चाहिए। विश्व बैंक व आईएमएफ से लेकर रेटिंग एजेंसियों के आकलन के विपरीत भारतीय रिजर्व बैंक कहता है कि हमारी अर्थव्यवस्था ज्यादा बढ़ेगी। इसी तर्ज में मौसम विभाग भी कह रहा है कि इस बार मानसून में दीर्घकालिक औसत (एलपीए) की 96% बारिश होगी, जिसे सामान्य माना जाएगा। उसके मुताबिक, अल-निनो का असर हुआ भी तो जुलाई से सितंबर तक की अवधि के आखिरी हिस्से मेंऔरऔर भी

शेयर बाज़ार हमें ट्रेडिंग और निवेश से कमाने का मौका ही नहीं देता, वो हमें देश की अर्थव्यवस्था के अंग-अंग के साथ ही दुनिया की अर्थव्यवस्था और वित्तीय जगत को भी जानने-समझने को उकसाता है क्योंकि हम देश-दुनिया के आर्थिक व वित्तीय हालात को जितनी अच्छी तरह से जानेंगे, शेयर बाज़ार से जुड़े हमारे फैसले उतने ही सटीक हो सकते हैं। हमें जानना चाहिए कि मौसम विभाग ने इस बार मानसून में 4% कम बारिश की आशंकाऔरऔर भी

कहते हैं कि चीन के आंकड़ों पर भरोसा नहीं किया जा सकता। लेकिन इधर अपने भी आंकड़े दिखाते कम और छिपाते ज्यादा है। मसलन, नया आंकड़ा आया है कि मार्च में थोक मुद्रास्फीति की दर घटकर 29 महीनों के न्यूनतम स्तर 1.34% पर आ गई है। मार्च में रिटेल मुद्रास्फीति भी रिजर्व बैंक द्वारा तय 6% की ऊपरी सीमा के भीतर 5.66% पर आ चुकी है। क्या इसका मतलब यह कि महंगाई की मार घट रही है?औरऔर भी

चीन का औसत व्यक्ति भारत के औसत व्यक्ति से 5.4 गुना ज्यादा अमीर है। चीन अब जनसंख्या के मामले में भारत से पीछे जाता दिख रहा है। अभी उसकी आर्थिक विकास दर भले ही भारत से कम हो गई हो। लेकिन कभी वह कुलांचे भर रहा था। चीन का जीडीपी 1970 में 19.30% की अधिकतम दर से बढ़ा था, जबकि भारत की अधिकतम विकास दर 1988 में 9.63% ही रही है। चीन की विकास दर 22 सालोंऔरऔर भी

चीन व भारत दुनिया की दो सबसे बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाएं हैं। चीन दुनिया में दूसरे नंबर और भारत पांचवें नंबर की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। एशिया की बात करें तो भारत व चीन साथ मिलकर एशिया के जीडीपी में आधे से ज्यादा योगदान देते हैं। सोचने की बात है कि साल 1987 में भारत व चीन का जीडीपी लगभग बराबर था। लेकिन फिर ऐसा क्या हुआ कि साल 2021 तक चीन भारत से 5.46 गुना बड़ी अर्थव्यवस्थाऔरऔर भी

पहले विश्व बैंक ने चालू वित्त वर्ष 2023-24 में भारत की आर्थिक विकास दर का अनुमान 6.6% से घटाकर 6.3% किया। अब आईएमएफ (अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष) ने भी कह दिया है कि इस साल हमारा जीडीपी 6.1% के बजाय 5.9% ही बढ़ सकता है। फिर भी अगर रिजर्व बैंक विकास दर का अनुमान दो महीने में ही 6.4% से बढ़ाकर 6.5% कर दिया तो इसकी राजनीतिक वजह ही हो सकती है। मई 2024 में लोकसभा चुनाव होने हैंऔरऔर भी

भारत की सबसे बड़ी ताकत विशाल प्राकृतिक व मानव संसाधनों के साथ उसकी उद्यमशीलता है। जीडीपी के आकार में हम भले ही दुनिया में पांचवें नंबर और प्रति व्यक्ति आय में 197 देशों की रैकिंग में 142वें पायदान पर हों, लेकिन स्टार्ट-अप्स की संख्या के मामले में हम समूची दुनिया में अमेरिका व चीन के बाद तीसरे स्थान पर हैं। भारत की यह मूलभूत ताकत उसे कहीं का कहीं पहुंचा सकती है। लेकिन इसका रोडमैप सोचने सेऔरऔर भी

पहले विश्व बैंक ने आगाह किया कि अगले कुछ सालो में विश्व अर्थव्यवस्था की विकास दर घटकर 2.2% पर आ सकती है। अब आईएमएफ ने भी आर्थिक सुस्ती की चेतावनी दे दी है। ऐसे में भारत अप्रभावित नहीं रह सकता। एचडीएफसी समूह के मुखिया और देश की मशहूर कॉरपोरेट हस्ती दीपक पारेख मानते हैं कि वैश्विक हालात को देखते हुए भारत की विकास दर आगे धीमी पड़ सकती है। उन्होंने बीते शनिवार को एक समारोह में कहाऔरऔर भी

विश्व बैंक का कहना है कि भारत की आर्थिक विकास दर चालू वित्त वर्ष 2023-24 में इसलिए कम रहेगी क्योंकि उधार महंगा होने और आमदनी में कम बढ़त से निजी उपभोग में कमी आएगी। लेकिन रिजर्व बैंक कहता है कि हमारा जीडीपी ज्यादा बढ़ेगा क्योंकि रबी की अच्छी फसल से ग्रामीण मांग बढ़ेगी, सरकार के ज्यादा पूंजीगत व्यय से मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र में क्षमता इस्तेमाल का स्तर उठेगा, बैंक ऋण दहाई अंक में बढ़ रहे हैं और जिंसोंऔरऔर भी