शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग एक तरह का बिजनेस है, टैक्स के लिहाज़ से भी और धंधे व समय के लिहाज़ से भी। इसलिए इसमें व्यापारी की तरह सारे खर्च घटाकर ही अपना शुद्ध लाभ गिनना चाहिए। स्टॉप-लॉस तो इस बिजनेस का अनिवार्य व अपरिहार्य खर्च है ही, जिसके कोई ट्रेडर बच नहीं सकता। साथ ही उसे यह भी साफ-साफ पता होना चाहिए कि वह ब्रोकरेज़, एसटीटी (सिक्योरिटी ट्रांजैक्शन टैक्स), जीएसटी, एक्सचेंज ट्रांजैक्शन चार्ज, इम्पैक्ट कॉस्ट व सेबीऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में तेज़ी के मौजूदा दौर में जब कचरा स्टॉक्स तक उड़े जा रहे हों, तब तक रिटेल ट्रेडर के लिए पहला नियम यह होना चाहिए कि वो हमेशा मूलभूत रूप से मजबूत कंपनियों के स्टॉक्स ही चुने। इनमें भी तभी एंट्री ली जाए, जब वे तात्कालिक मुनाफावूली के चलते थोड़ा नीचे आ गए हों। अगर हल्की कंपनी के स्टॉक्स ले लिए तो वे उड़ते-उड़ते कभी भी धड़ाम हो सकते हैं। वहीं, मजबूत कंपनी के शेयरऔरऔर भी

शेयर बाज़ार साफ तौर पर तेज़ी के दौर या अंग्रेज़ी में कहें बुल फेज़ में है। जो भी कंपनियां मूलभूत रूप से या फंडामेंटली मजबूत हैं, उनमें से ज्यादातर के शेयर ऐतिहासिक शिखर तक जा पहुंचे हैं। जिनके शेयर ठंडे पड़े हैं, उनमें निवेश तो किया जा सकता है, लेकिन ट्रेडिंग नहीं। ऐसे में आज आम ट्रेडर के दिमाग में सबसे बड़ा सवाल है कि वह किन स्टॉक्स में ट्रेड करे। इंट्रा-डे ट्रेडर के लिए कोई समस्याऔरऔर भी

शेयर बाज़ार बहुत-बहुत धनवालों और बैंकों, म्यूचुअल फंडों, बीमा कंपनियों व एफपीआई जैसे बड़े-बड़े संस्थागत निवेशकों का खेल है। इसमें आम लोगों को म्यूचुअल फंड के ज़रिए ही एंट्री लेनी चाहिए क्योंकि तब वे भी बड़ी निवेशक संस्था का हिस्सा बन जाते हैं। दुनिया भर का यही रिवाज़ है क्योंकि इसी में आम निवेशकों की सुरक्षा है। रिटेल ट्रेडर तो शुरू से ही महारथियों से पंगा लेता है। इसलिए आम या रिटेल ट्रेडर को बहुत हुआ तोऔरऔर भी

अभी भारतीय मध्यवर्ग की आबादी कितनी होगी, इसका कोई पक्का अनुमान या आधिकारिक आंकड़ा नहीं है। इसे हम 20 करोड़ मान लें तो इसका 67.85% हिस्सा फिलहाल शेयर बाज़ार से जुड़ चुका है। देश के सबसे पुराने स्टॉक एक्सचेंज बीएसई की वेबसाइट के मुताबिक, 12 जुलाई 2023 तक अपने यहां रजिस्टर्ड निवेशकों की संख्या 13,56,95,100 पर पहुंच चुकी है। इसमें साल भर में 23.86% की शानदार वृद्धि हुई है। सबसे ज्यादा 2,67,47,397 पंजीकृत निवेशक महाराष्ट्र में हैं।औरऔर भी

मध्यवर्ग ही वह तबका है जिसके पास अपनी तात्कालिक और आकस्मिक ज़रूरतों को पूरा करने के बाद इतना धन बचता होगा कि वह शेयर बाज़ार में निवेश कर सके। जिन 81.5 करोड़ लोगों को सरकार मुफ्त पांच किलो अनाज दे रही है, वे तो पेट भर लें, यही काफी है। वहीं, साल भर में 8 लाख रुपए या महीने भर में 66,667 तक कमानेवालों को आरक्षण के लिए आर्थिक रूप से गरीब माना गया है। वैसे, हमऔरऔर भी

भारत में मध्यवर्ग ही है जो मॉल लेकर मल्टीप्लेक्स तक मेला लगाता है। इसी पर दुनिया के बड़े ब्रांड फोकस करते हैं। यही मध्यवर्ग है जिसका एक हिस्सा शेयर बाज़ार में निवेश व ट्रेडिंग करता है। आखिर यह वर्ग कितना बड़ा है और इसकी आबादी कितनी होगी? दो-तीन दशक पहले तक इसकी संख्या 15 से 25 करोड़ बताई जाती थी। अब तो यह संख्या 40 से 50 करोड़ कही जाने लगी है। लेकिन जानकार इस वर्ग कीऔरऔर भी

एचएनआई देश छोड़कर भागे जा रहे हैं तो विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई या एफआईआई) की मार का सामना कौन करेगा? क्या यह काम देशी संस्थागत निवेशक (डीआईआई) कर सकते हैं? कभी नहीं। आप शेयर बाज़ार में हर दिन कैश सेगमेंट में हो रही खरीद-फरोख्त के आंकड़े देखें तो पता चलेगा कि एफपीआई के साथ तो उनकी जबरदस्त जुगलबंदी चल रही है। वे खरीदते हैं तो ये बेचते हैं और इनकी खरीद को वे अपनी बिकवाली से पूराऔरऔर भी

खूब हल्ला है कि मोदी सरकार के नौ सालों में दुनिया की पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाने के बाद भारत का पासपोर्ट बहुत मजबूत हो गया है। हकीकत क्या है? जापान का पासपोर्ट दुनिया में सबसे मजबूत है क्योंकि वो हो तो 193 देशों में या तो वीसा लेने की जरूरत नहीं होती या पहुंचने पर वीसा मिल जाता है। फिर सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, जर्मनी व स्पेन का नंबर है। फिनलैंड जैसे छोटे देश का पासपोर्टऔरऔर भी

अच्छी बात यह है कि रोज़ी-रोज़गार से लेकर बेहतर जीवन के अवसरों की तलाश में परदेश चले गए भारतीय अपने लोगों को नहीं भूल जाते। वे बराबर अपनी कमाई का एक हिस्सा परिजनों को भेजते रहते हैं। साल 2022 में उनके द्वारा देश में भेजी गई रकम 24% बढ़कर 111 अरब डॉलर पर पहुंच गई। यह रकम दक्षिण एशिया में प्रवासी नागरिकों द्वारा भेजी गई कुल विदेशी मुद्रा का 63% थी और विश्व बैंक के 100 अरबऔरऔर भी