शेयर बाज़ार कुलांचे मार रहा है। निफ्टी व सेंसेक्स रह-रहकर नई-नई ऊंचाई छूते जा रहे हैं। रिजर्व बैंक ने चालू वित्त वर्ष 2023-24 में हमारे जीडीपी के 6.5% और महीने भऱ पहले बीती जून तिमाही में 8% बढ़ने का अनुमान लगाया है जिसका आधिकारिक आंकड़ा 31 अगस्त को आएगा। इस बीच कंपनियों के जून तिमाही के नतीजे आते जा रहे हैं। बैंक ऑफ बड़ौदा द्वारा अब तक घोषित 281 कंपनियों के नतीजों के विश्लेषण से पता चलाऔरऔर भी

शेयर बाजार के बढ़ने का देश में गरीबी या बेरोज़गारी से कोई ताल्लुक नहीं है। उसका खास रिश्ता देश के जीडीपी और उसमें भी मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र के विकास से होता है। बैंकों की बैलेंस शीट पुराने ऋणों को राइट-ऑफ और एनपीए को एनकेन प्रकारेण घटाकर चमका दी गई है। यह भी सच है कि इधर कई सालों से सरकार का ज़ोर इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण, रेलवे और डिफेंस क्षेत्र को मजबूत करने पर है। इंजीनियरिंग व कंस्ट्रक्शन केऔरऔर भी

भारत विपुल संभावनाओं से भरा देश है। आर्थिक ही नहीं, राजनीतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक स्तर पर भी। हमने अभी तक जो हासिल किया है, वह हमारी अंतर्निहित सामर्थ्य से बहुत-बहुत कम है। लेकिन पूर्णता पाने के लिए सच को आधार बनाना और जिस झूठ ने हमारे व्यक्तिगत, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक जीवन को दबोच रखा है, उसे जड़ से मिटा देना ज़रूरी है। असल में, कोई भी विकास सच को आधार बनाकर ही किया जाता है।औरऔर भी

मानते हैं कि अर्थव्यवस्था या जीडीपी के बढ़ने और शेयर बाज़ार के चढ़ने में सीधा रिश्ता है। लेकिन हकीकत ऐसी नहीं दिखती। चीन का जीडीपी जब जमकर बढ़ रहा था, तब वहां का शेयर बाज़ार धीमी गति से चल रहा था। भारत के जीडीपी के विकास दर जब ज्यादा चल रही थी, तब सुस्त गति से बढ़ते अमेरिका के शेयर बाज़ार ने अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को भारत से कहीं ज्यादा रिटर्न दिया था। इस समय भी जब हमाराऔरऔर भी

बीते वित्त वर्ष 2022-23 के मुनाफे/ईपीएस को आधार बनाएं तो सेंसेक्स अभी 25.41 और निफ्टी 23.97 के पी/ई अनुपात पर ट्रेड हो रहा है। निफ्टी-50 में शामिल कंपनियों का शुद्ध लाभ अगले दो साल में 13% की सालाना चक्रवृद्धि दर से बढ़ता है तो उसका फॉरवर्ड पी/ई घटकर 19 के आसपास आ जाता है। इसलिए कुछ जानकार बाज़ार को सस्ता बता सकते हैं। लेकिन सब कुछ मन का धन है। कंपनियों का मुनाफा ठहरा रहता है, तबऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में सक्रिय सभी लोगों का सम्मिलित मनोविज्ञान शेयरों के भाव और शीर्ष सूचकांकों में झलकता है। इन लोगों में देशी-विदेशी संस्थागत निवेशकों के फंड मैनेजर, हाई नेटवर्थ व्यक्ति (एचएनआई), प्रोफेशनल ट्रेडर और सुलझे हुए धनवान निवेशक तक शामिल हैं। इन सबका आत्मविश्वास, आशावाद व सकारात्मक नज़रिया जब हद से पार चला जाता है तो बाज़ार में अतिशय लालच और निश्चिंतता का सुरूर चढ़ जाता है। सकारात्मक तत्व नकारात्मक हालात पैदा कर देते हैं। इतिहास गवाहऔरऔर भी

बाज़ार बढ़ जाता है तो दराज़ में रखी विशेषज्ञों की व्याख्याएं बाहर निकलकर फड़फड़ाने लगती हैं। वे बताते हैं कि मुद्रास्फीति घट रही है, ब्याज दरें बढ़ाने का सिलसिला रुक चुका है, वैश्विक अर्थव्यवस्था पटरी पर आ रही है, देश में राजनीतिक स्थिरता है, यूक्रेन पर रूस का हमला खत्म हो सकता है, आदि-इत्यादि। बाज़ार अचानक गिर जाए तो दराज़ से विशेषज्ञों की व्याख्या का दूसरा सेट निकल आएगा। सब बकवास है। पारम्परिक ज्ञान कहता है किऔरऔर भी

निफ्टी-50 सूचकांक 20,000 पर पहुंचते-पहुंचते रह गया। हफ्ते-दो हफ्तें में वहां पहुंच सकता है। फिर दो-चार साल में 30,000 तक भी चला जाएगा। हमारी अर्थव्यवस्था अभी 3.32 लाख करोड़ या ट्रिलियन डॉलर की है। कुछ साल में 5 ट्रिलियन और फिर 10 ट्रिलियन डॉलर की हो जाएगी। भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। कुछ साल में जर्मनी, जापान से आगे निकल तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। यह विकास की सहज स्वाभाविक गति है। उसीऔरऔर भी

शेयर बाज़ार समझदारों का खेल नहीं है। यह तो लालच और डर की भावनाओं में खिंचते व भागते धनवानों का खेल है। यह दरअसल नीलामी का बाज़ार का है जिसमें भविष्य की सोच कर दांव लगा दिया जाता है जो गलत भी पड़ सकता है और सौदा आगे जाकर गले की हड्डी बन सकता है। वहीं, रीयल एस्टेट बाज़ार समझदार व बुद्धिमान ग्राहक समझदार व बुद्धिमान ग्राहक के साथ सौदा करता है। इसलिए रीयल एस्टेट बाज़ार मेंऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में ओवर-ट्रेडिंग करना धन ही नहीं, तन व मन के लिए भी घातक है। साफ समझ लें कि ट्रेडिंग पूरी तरह मनोविज्ञान व सहज मानव-प्रवृत्तियों पर चलनेवाला खेल है। जितना ज्यादा आवेश में रहेंगे, उतना ही ज्यादा दूसरों के शिकार बन सकते हैं। इसलिए ट्रेडिंग में नियमित रूप से ब्रेक लेते रहना ज़रूरी है। अच्छा ट्रेड कर लिया, बड़ा मुनाफा कमा लिया, तब भी कुछ दिन शांत रहना चाहिए क्योंकि तब आपको लगने लगता हैऔरऔर भी