फाइनेंस की दुनिया ज्यादा अस्थिर, ज्यादा रिस्की हो चली है। ग्लोबल हरकतें लोकल खबरें बन गई हैं। नेट व चौबीसों घंटे चलते न्यूज़ चैनलों ने सूचनाओं को सर्वसुलभ करा दिया। पर प्रोफेशनल फंड मैनेजर सूचनाओं के आम होने से पहले ही उनका खास इस्तेमाल कर लेते हैं। खबर हम तक पहुंचे, इससे पहले वे उसका रस निकाल लेते है। लेकिन सारी हरकतें जाती हैं भाव में। इसलिए भाव को पकड़ो, भाव पर खेलो। अब देखें बाज़ार मंगल का…औरऔर भी

कभी-कभी नहीं, अक्सर हम इधर-उधर की चंद सूचनाओं के चलते या मन से किसी शेयर के बारे में धारणा बना लेते हैं कि वो बढ़ेगा/घटेगा। फिर उसके भावों का चार्ट देखते हैं। कोई न कोई आकृति, कोई न कोई इंडीकेटर हमारी पुष्टि करता दिख जाता है। दांव लगा बैठते हैं। शेयर हमारे माफिक चला तो खुश, नहीं तो सारा दोष किस्मत का। सरासर गलत तरीका। जो है, उसे देखिए। अपनी धारणा मत थोपिए। अब रुख बाज़ार का…औरऔर भी

वजह बाहरी हो या भीतरी, हकीकत यही है कि अपने यहां अभी एक शेयर 52 हफ्ते के शिखर पर है तो आठ तलहटी पर। गिरनेवालों में एसीसी, सेंचुरी प्लाई, ग्रासिम इंडस्ट्रीज़ और अल्ट्राटेक सीमेंट जैसे तमाम दिग्गज शामिल हैं। क्या तलहटी पर पहुंचा हर शेयर खरीदने लायक है? नहीं। बस नाम व दाम के पीछे भागे तो वैल्यू ट्रैप में फंस जाएंगे। हमें चुननी होगी मजबूत आधार और अच्छे प्रबंधन वाली कंपनी। लीजिए, ऐसी ही एक कंपनी…औरऔर भी

ट्रेडिंग कोई सीधा-सरल सहज नहीं, बल्कि जटिल खेल है। अनिश्चितता की भंवर में आपको फैसला करना होता है। फैसला इस आधार पर कि पल-पल बदलते भावों का पैटर्न क्या है? यह समझ कि भीड़ का झुकाव ठीक इस वक्त किधर है? तेजी और मंदी के खेमे में किसका पलड़ा भारी है? पूंजी बड़ी हो तो खरीदने-बेचने के सौदे साथ कर सकते हैं। लेकिन कम पूंजी में ऐसा मुमकिन नहीं। चलिए करें इस जटिलता को सुलझाने का अभ्यास…औरऔर भी

ट्रेडिंग में कामयाबी के लिए हमें निवेशकों का मनोविज्ञान समझना होगा। इससे एक तो हम खुद गलतियों से बच सकते हैं। गलतियां फिर भी होंगी क्योंकि यह जीने और सीखने का हिस्सा है। दूसरे, इससे हमें पता रहेगा कि खास परिस्थिति में लोगबाग कैसा सोचते हैं। इससे हम ट्रेडिंग के अच्छे मौके पकड़ सकते हैं, दूसरों की गलतियों से कमा सकते हैं क्योंकि यहां एक का नुकसान बनता है दूसरे का फायदा। देखें अब बुध की बुद्धि…औरऔर भी

केवल सरकार के बांड सुरक्षित हैं। बाकी हर निवेश में यह रिस्क है कि जितना वादा है, कहा गया है या शुरू में सोचा है, उतना रिटर्न आखिरकार नहीं मिलेगा। अब यह निवेशक पर है कि वो आंख मूंदकर फैसला करे या सारे जोखिम का हिसाब-किताब पहले से लगाकर। इस मायने में ट्रेडर अलग हैं। वे सारा कुछ नापतौल कर न्यूनतम रिस्क लेते हैं। वे बड़ा जोखिम कतई नहीं उठाते। इस हफ्ते तो भयंकर उठापटक होनी है।…औरऔर भी

धीरे-धीरे यह सेवा लेनेवालों की संख्या बढ़ रही है तो हल्की-सी घबराहट के साथ जिम्मेदारी और जवाबदेही का भाव भी बढ़ता जा रहा है। जब लोग आप पर भरोसा करने लगे तो उनके प्रति आपकी जवाबदेही बढ़ जाती है। अपनी तरफ से सच्ची सेवा देने का संकल्प है। लेकिन एक बात गांठ बांध लें कि मैं या कोई दूसरा आपको पैसे बनाकर नहीं देगा। पैसे के मामले में किसी की नहीं, सिर्फ अपनी सुनें। अब टिप्स आजऔरऔर भी

15 मार्च 2012, चालू वित्त वर्ष 2011-12 की अंतिम तिमाही में एडवांस टैक्स की आखिरी किश्त देने की आखिरी तारीख। केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) तो कई दिन बाद पूरे आंकड़े जारी करता है। लेकिन देश की आर्थिक राजधानी मुंबई से मिले शुरुआती संकेतों से पता चला है कि कॉरपोरेट क्षेत्र में ज्यादा टैक्स नहीं भरा है। जिन्होंने दिया है, उनमें बैंकिंग व बीमा कंपनियां सबसे आगे हैं। देश के सबसे बड़े बैंक, भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई)औरऔर भी

शेयर बाजार किसी भी आस्ति वर्ग से ज्यादा रिटर्न देनेवाला माध्यम है। यहां निवेश करने के दो ही रास्ते हैं। एक, अपनी रिसर्च के दम पर सीधे शेयरों को चुनकर निवेश करना और दो, म्यूचुअल फंड के जरिए निवेश करना। अगर आप अपनी रिसर्च नहीं कर सकते तो आपके लिए एकमात्र रास्ता म्यूचुअल फंडों की इक्विटी स्कीमों का है। वैसे, अपने स्तर पर रिसर्च मुश्किल नहीं है। हम इस कॉलम के जरिए यही साबित करने और सिखानेऔरऔर भी

कॉरपोरेट क्षेत्र में बहस छिड़ी है कि प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह देश के लिए वरदान हैं या अभिशाप। देश की सबसे बड़ी हाउसिंग फाइनेंस कंपनी, एचडीएफसी के प्रमुख दीपक पारेख जैसे दिग्गज कहते हैं कि डॉ. सिंह के रूप में हमें अब तक के सबसे अच्छे प्रधानमंत्री मिले हैं। वे एकदम बेदाग राजनेता हैं। इसलिए देश के वरदान हैं। वहीं दूसरा पक्ष कहता है कि डॉ. सिंह भले ही स्वच्छतम छवि के नेता हों, लेकिन उन्होंने जिसऔरऔर भी