पर्यावरण मंत्रालय ने सोमवार को लंबे समय से लटकी चली आ रही पॉस्को की स्टील परियोजना को सशर्त मंजूरी दे दी। यह परियोजना उड़ीसा के जगतसिंहपुर जिले में लगाई जानी है। इसकी प्रस्तावित सालाना क्षमता 120 लाख टन है। पॉस्को दक्षिण कोरिया की कंपनी है और उसका प्रस्ताव इस स्टील परियोजना में 52,000 करोड़ रुपए का निवेश करना है। यह देश में अब तक का सबसे बड़ा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) होगा। परियोजना के लिए कुल 1621औरऔर भी

साल 2010 में दुनिया भर के विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) 1122 अरब डॉलर का आधे से अधिक हिस्सा विकासशील देशों में आया है। ऐसा पहली बार हुआ है जब विकासशील देशों में विकसित देशों से अधिक एफडीआई आया है। अंकटाड की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि जहां सिंगापुर, हांगकांग, चीन, इंडोनेशिया, मलयेशिया और वियतनाम में एफडीआई में वृद्धि हुई, वहीं भारत में इसके प्रवाह में कमी आने से दक्षिण एशिया में एफडीआई में 14% कीऔरऔर भी

देश में जहां एफआईआई (विदेशी संस्थागत निवेशक) निवेश बढ़ता जा रहा है, वहीं प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) घट रहा है। एफआईआई निवेश में एक तरह का उबाल आया हुआ है। लेकिन पिछले छह महीनों में एफडीआई घटकर लगभग आधा रह गया है। इस बीच हमारा व्यापार घाटा भी बढ़ रहा है। यूरो ज़ोन के संकट ने हमारे व्यापार संतुलन पर विपरीत असर डाला है। चिंता के ये सारे मसले खुद वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने उठाए हैं।औरऔर भी

फ्रांसीसी कंपनियां साल 2012 तक भारत में 10 अरब यूरो (13.37 अरब डॉलर) का निवेश करने को प्रतिबद्ध हैं। फ्रांस की वित्त मंत्री क्रिस्टीन लगार्ड ने सोमवार को उद्योग संगठन फिक्की द्वारा आयोजित भारत-फ्रांस व्यापार मंच की बैठक में कहा, ‘‘यह सिर्फ आंकड़ा (10 अरब यूरो) नहीं है। यह फ्रांसीसी कंपनियों की 2008 से 2012 के बीच भारत में निवेश को लेकर प्रतिबद्धता है।’’ उन्होंने यह भी कहा कि हर बिजनेस ‘आपसी लाभ’ के सिद्धांत पर कामऔरऔर भी

जैसे-जैसे दलबल के साथ अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के भारत आने की तारीख करीब आती जा रही है, सरकार के तमाम मंत्री व आला अधिकारी मल्टी ब्रांड रिटेल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की वकालत करते नजर आ रहे हैं। इसकी खास वजह यह है कि अमेरिका का भारी दबाव इस बात पर है कि भारत मल्टी ब्रांड रिटेल को विदेशी पूंजी निवेश के लिए खोल दे। प्रमुख अमेरिकी स्टोर व दुनिया के सबसे बड़े रिटेलर वॉलऔरऔर भी

ब्रिटेन का बिजनेस दैनिक फाइनेंशियल टाइम्स भारतीय बाजार में उतरना चाहता है, पर इसके लिए उसे अनुमति नहीं मिल पाई है। अखबार के संपादक ने कहा है कि भारत आने की अनुमति नहीं मिलने से उन्हें काफी निराशा है। इस आर्थिक अखबार के संपादक लायनल बार्बर ने कहा, ‘‘हम भारत में सीधे प्रतिस्पर्धा करना चाहते हैं। हम पिछले 20 साल से यहां आने का प्रयास कर रहे हैं। यह निराशाजनक है।’’ बार्बर ने भारत के प्रिंट मीडियाऔरऔर भी

भारी ऊंच-नीच और इंट्रा-डे सौदों की मार दिखाती है कि बाजार में मंदी से कमाई करनेवाले मंदड़िये आक्रामक हो गए हैं। हालांकि बाजार पर पूरा नियंत्रण अब भी तेजड़ियों का है और उनकी लय-ताल को तोड़ना कठिन ही नहीं, आत्मघाती भी है क्योंकि हकीकत यह है कि बाजार में रिटेल और एचएनआई (हाई नेटवर्थ इंडीविजुअल) निवेशकों की एंट्री हो चुकी है। नोट करने की बात यह है कि मंदड़ियों के आक्रमण के बावजूद निफ्टी कल से नीचेऔरऔर भी

बाजार तेजी के नए दौर में प्रवेश कर चुका है। वोलैटिलिटी सूचकांक अब तक के सबसे न्यूनतम स्तर 18 फीसदी पर है। रीयल्टी स्टॉक्स की धूम है। दूसरा सेक्टर जिसमें बाजार तेजी की राह पकड़ रहा है, वह है सीमेंट। देखिएगा कि अगले तीन महीनों तक इस सेक्टर के स्टॉक कहां से कहां तक जाते हैं। मैं मानता हूं कि नवंबर से पहले एसीसी चार अंकों में चला जाएगा। बाकी आपको समझना है। निफ्टी सारी रुकावटें तोड़औरऔर भी

हमारी लगभग एक लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था का 40 फीसदी हिस्सा खुदरा बिक्री से आता है। दूसरे शब्दों में जीडीपी में 40,000 करोड़ रुपए का योगदान हमारी रोजमर्रा की खरीद का है। इसका लगभग 94 फीसदी हिस्सा गली-मोहल्लों में फैली किराना दुकानों से आता है और केवल 6 फीसदी हिस्सा ही पैंटालून (बिग बाजार), रिलायंस रिटेल, स्पेंसर, आदित्य बिड़ला रिटेल और भारती के बड़े-बड़े स्टोरों से आता है। मतलब, आसपास की जिन दुकानों को हम दोऔरऔर भी

अफवाहें तो उड़ती हैं, उड़ाई जाती हैं। लेकिन बाजार के लिए रत्ती-रत्ती खबर भी कीमती होती है। कंपनी के अंदर की खबर बाहर निकले तो सबको एक साथ पता चले ताकि बाजार में कोई भेदभाव न हो सके। इसीलिए इनसाइडर ट्रेडिंग का नियम बना हुआ है। जाहिर है अंदर की बातें निकालकर ट्रेड करना बाजार के स्वस्थ विकास के लिए अच्छा नहीं है। ऐसे में अपने निवेश के जोखिम को कम करने का सबसे सही तरीका हैऔरऔर भी