जीडीपी का डेटा ऊपर-ऊपर जैसा दिखाता है, अंदर घुसने पर पता चलता है कि वैसा कतई नहीं है और हकीकत बड़ी दारुण है। आखिर जीडीपी का बढ़ना और निजी क्षेत्र के घटिया प्रदर्शन एक साथ कैसे? जीडीपी में निजी क्षेत्र से जुड़े दो सबसे बड़े हिस्से हैं पीएफसीई (प्राइवेट फाइनल कंजम्पशन एक्सपेंडिचर) या निजी खपत पर होनेवाला खर्च और निजी क्षेत्र का पूंजी निवेश। निजी खपत बढ़ती है तो निजी पूंजी निवेश भी बम-बम करता है। लेकिनऔरऔर भी

संयोग या प्रयोग से सत्ता में हाथ में आ जाए और लोकतांत्रिक संस्थाओं को पंगु बनाकर येनकेन प्रकारेण सत्ता में बने रहने की सिद्धि हासिल कर ले तो किसी भी सत्ताधारी दल को गुमान हो जाता है कि वो भोलेभाले आम लोगों को ही नहीं, मीडिया से लेकर बुद्धिजीवियों व अर्थशास्त्रियों तक को चरका पढ़ा सकता है। लेकिन इतिहास गवाह है कि ऐसा कभी लम्बे समय तक नहीं चलता। शासन की नंगई एक न एक दिन सबसेऔरऔर भी

जब विश्व अर्थव्यवस्था की विकास दर 2.5% से 2.6% पर अटकी पड़ी हो, सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका के इस साल 2025 में बहुत हुआ तौ 1.6% बढ़ने का अनुमान वहां का केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व जता रहा हो, दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन की विकास दर घटकर 4.5% पर आ गई हो, तब भारत की अर्थव्यवस्था का इस साल जून तिमाही में 7.8% और सितंबर तिमाही में 8.2% बढ़ जाना किसी को भी हतप्रभ कर सकता है।औरऔर भी

देश के राष्ट्रीय आर्थिक आंकड़ों पर आईएमएफ के एतराज पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की प्रतिक्रिया को बेहयाई नहीं, केवल थेथरई कहा जा सकता है। मोदी तो अभी भी देश को राष्ट्रगीत वंदे मातरम तक के नामं पर 2047 विकसित बनाने का झांसा दिए जा रहे हैं। वहीं, निर्मला सीतारमण राष्ट्रीय खातों की विसंगतियों को महज आधार वर्ष को बदलने के तकनीकी पेंच में उलझा देना चाहती हैं। महोदया, असल सवाल यह हैऔरऔर भी

जो बात दबी जुबान से कई सालों से कही जा रही थी, ‘अर्थकाम’ जिसको लेकर हल्ला मचाता रहा है, जिसे वो अर्थव्यवस्था के साथ वोट-चोरी जैसा अपराध बताता रहा है, जिसे देशभक्त व जागरूक अर्थशास्त्री बराबर उठाते रहे हैं और जिसे हाल में बिजनेस चैनल व पोर्टल भी उठाने लगे थे, वो अब जगजाहिर हो गई है। अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) ने अपनी ताजा सालाना समीक्षा में कहा है कि भारत के जीडीपी, जीवीए और मुद्रास्फीति जैसे राष्ट्रीयऔरऔर भी

एकांगी सोच से जीवन में कभी सफलता नहीं मिलती। इसी तरह शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में भी अगर आप केवल अपनी सोचेंगे तो सफल नहीं होंगे। बराबर समझने की कोशिश करें कि अगर आप खरीदने पर आमादा हैं तो सामने कौन है जो बेचने को आतुर है। दोनों को क्यों ऐसा ही करने में फायदा दिखता है! ध्यान रखें कि बाजार में हमेशा ऐसे लोगों का धन उन जानकार व समझदार लोगों के बैंक खातों में जाताऔरऔर भी

शेयर बाज़ार ट्रेडिंग के हर दिन, हर पल बराबर बोलता है, बात करता है। क्या आप उसे सुनते हैं या सुन पाते हैं? अगर नहीं तो दोषी आप हैं, कोई दूसरा नहीं। हां, बाज़ार साफ-साफ खुलकर नहीं बोलता। लेकिन वो हिन्ट ज़रूर देता है, संकेतों की भाषा में बात करता है। फिर भी वो इतने निशान छोड़ जाता है कि आप उसके पीछे-पीछे चलकर उसकी थाह ले सकते हैं, सफलता की मंज़िल तक पहुंच सकते हैं। जिसऔरऔर भी

कस्तूरी कुंडली बसे, मृग ढूंढय वन मांहि। यही हाल ट्रेडिंग में कामयाबी का है। शेयर बाज़ारों से कमाने का सूत्र पकड़ने के लिए लाखों लोग टिप्स के चक्कर में कहां-कहां नहीं फिरते। टीवी चैनल देखते हैं। ऑनलाइन गुरुओं की सलाह, वॉट्स-ऐप्प ग्रुप्स की सदस्यता और ट्रेडिंग टिप्स पर महीनों के हज़ारों लुटा देते हैं। फिर भी ठन-ठन गोपाल। इसलिए, क्योंकि ट्रेडिंग से कमाई का सूत्र कहीं बाहर नहीं, बल्कि खुद अपने पास है और वो है रिस्कऔरऔर भी

शेयरों की ट्रेडिंग मूलतः शेयर बाज़ार में हर दिन सक्रिय ट्रेडरों की मानसिकता व आवेग को जानकर उनके बर्ताव को पहले से भांप लेने का खेल है। लेकिन यह कितना संभव है? आप अपने को समझ सकते हैं, अपने जैसे अन्य ट्रेडरों की चाल को समझ सकते हैं, लेकिन जहां देश के कोने-कोने के हमारे जैसे लाखों लोग ही नहीं, विश्व स्तर पर करोड़ों धनवान सक्रिय हों जिनकी नुमाइंदगी फाइनेंस की दुनिया के दिग्गज प्रोफेशनल कर रहेऔरऔर भी

अगर आप शेयर बाज़ार में अच्छी तरह ट्रेड करना चाहते हैं तो आपको मानव मन को अच्छी तरह समझना पड़ेगा। आखिर बाज़ार में लोग ही तो हैं जो आशा-निराशा और लालच व भय जैसी तमाम मानवीय दुर्बलताओं के पुतले हैं। ये दुर्बलताएं ही किसी ट्रेडर के लिए अच्छे शिकार का जानदार मौका पेश करती हैं। निवेश व ट्रेडिंग के मनोविज्ञान पर यूं तो तमाम किताबें लिखी गई हैं। लेकिन उनके चक्कर में पड़ने के बजाय यही पर्याप्तऔरऔर भी