देश की मौद्रिक संस्था भारतीय रिजर्व बैंक कहने को अब भी स्वायत्त है। हालांकि मोदी सरकार ने पिछले बारह सालों में उसका ऐसा बधियाकरण किया है कि सरकार की हां में हां मिलाना उसकी फितरत बन गई है। मुद्रास्फीति पर नियंत्रण रखना, आर्थिक विकास को सुगम बनाना और इसके अनुरूप नीतियां बनाना उसकी ज़िम्मेदारी है। लेकिन सरकार को खुश रखने के चक्कर में वो इतना असंगत हो गया है कि उसका रुख, अनुमान और फैसला एक दिशाऔरऔर भी

करीब नौ महीने अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) ने 14 अप्रैल 2025 को जारी वर्ल्ड इकनॉमिक आउटलुक रिपोर्ट में अनुमान जताया था कि कैलेंडर वर्ष 2025 या वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का जीडीपी 4.187 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है जो जापान के अनुमानित जीडीपी 4.186 ट्रिलियन डॉलर से थोड़ा ज्यादा होगा। इस तरह भारत तब दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है। उस समय सरकार के तमाम मंत्रियों और भाजपा नेताओं के साथ ही नीतिऔरऔर भी

भारत की अर्थव्यवस्था के साथ दुनिया में चल रही ‘ब्लैक फ्राइडे’ जैसी डील चल रही है। सरकार के राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) ने जब शुक्रवार, 29 अगस्त को घोषित किया था कि चालू वित्त वर्ष 2025-26 की पहली, यानी जून तिमाही में हमारे जीडीपी की असली विकास दर 7.8% रही है, तब आम विद्वान ही नहीं, नॉर्थ ब्लॉक और भारतीय रिजर्व बैंक तक में बैठे नीतियां बनानेवाले बड़े-बड़े अफसरान तक चौंक गए थे। लेकिन इस बार 28औरऔर भी

स्वतंत्रता दिवस, 15 अगस्त 2020 को शनिवार का दिन था। शनि का दिन यानी मानें तो दुर्बुद्धि का दिन। पिछली बार 15 अगस्त को गुरुवार का दिन था। गुरु का दिन, बुद्धिमत्ता का दिन। लेकिन तब 15 अगस्त 2019 के दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लालकिले की प्राचीर से बड़ी दुर्बुद्धि वाली बात कही थी। उन्होंने ‘बेतहाशा जनसंख्या विस्फोट’ का जिक्र करते हुए कहा था, “जनसंख्‍या विस्‍फोट हमारे लिए, हमारी आनेवाली पीढ़ी के लिए अनेक नए संकटऔरऔर भी

आर्थिक मोर्चे से बुरी खबरों का आना रुक नहीं रहा। औद्योगिक गतिविधियों की रीढ़ माना गया इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र भी अब अपना दुखड़ा रोने लगा है। देश के 262 ताप विद्युत संयंत्रों में 133 संयंत्रों को मांग न होने के कारण बंद करना पड़ा है। इससे पहले परिवहन में इस्तेमाल होनेवाले डीजल और सड़क निर्माण में इस्तेमाल होनेवाले बिटूमेन की मांग घटने की खबर आ चुकी है। इस बीच देश के सबसे बडे बैंक एसबीआई ने अपनी रिसर्चऔरऔर भी

गंगोत्री से गंगा की धारा के साथ बहते पत्थर का ऊबड़-खाबड़ टुकड़ा हज़ारों किलोमीटर की रगड़-धगड़ के बाद शिव बन जाता है, मंगल का प्रतीक बन जाता है। आंख में ज़रा-सा कण पड़ जाए तो हम इतना रगड़ते हैं कि वह लाल हो जाती है। लेकिन सीप में परजीवी घुस जाए तो वह उसे अपनी लार से ऐसा लपटेती है कि मोती बन जाता है। ऐसे ही हैं हमारे रीति-रिवाज़ और त्योहार जो हज़ारों सालों की यात्राऔरऔर भी

आज दुनिया कितनी ग्लोबल हो गई है, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है कि अमेरिका में ऋण सीमा पर लटकी तलवार से उससे ज्यादा परेशानी चीन और जापान को हो रही है। इन देशों के मंत्रीगण अमेरिका को पटाने में लगे हैं कि किसी भी सूरत में ऐसी नौबत न आने दी जाए क्योंकि ऐसा हो गया तो उन्होंने अमेरिका को जो भारी भरकम कर्ज दे रखा है, उसे वापस पाना मुश्किल हो जाएगा। सोचिए, ऐसा तब हो रहाऔरऔर भी