जूपिटर बायोसाइंसेज दवा उद्योग व बायोटेक्नोलॉजी से जुड़ी 1985 में बनी कंपनी है। बहुत कुछ नायाब बनाती है। लगातार बढ़ रही है। अधिग्रहण भी करती है। हाथ भी मिलाती है। 2006 में हैदराबाद की कंपनी का अधिग्रहण किया तो 2008 में स्विटजरलैंड की एक उत्पादन इकाई खरीद डाली। 2007 में रैनबैक्सी के साथ रणनीतिक गठजोड़ किया। इस मायने में भी यह बड़ी विचित्र कंपनी है कि इसकी 62.43 करोड़ रुपए की इक्विटी में प्रवर्तकों की हिस्सेदारी मात्रऔरऔर भी

उम्मीद पर दुनिया कायम है और शेयर बाजार भी। किसी कंपनी ने लाख अच्छा किया हो, लेकिन अगर वो बाजार की उम्मीद पर खरी नहीं उतरी तो उसका शेयर गिर जाता है। नहीं तो क्या वजह है कि टीवीएस मोटर कंपनी का शुद्ध लाभ मार्च तिमाही में साल भर पहले की तुलना में दोगुना हो गया। पहले 20.29 करोड़ रुपए था। अब 105.42 फीसदी बढ़कर 41.68 करोड़ रुपए हो गया। फिर भी शुक्रवार 29 अप्रैल को नतीजोंऔरऔर भी

किसी भी शेयर में निवेश करते समय हम यह सोचते हैं कि इससे हम कितना कमा सकते हैं। लेकिन पहले सोचना यह चाहिए कि हम इसमें कितना गंवा सकते हैं क्योंकि निवेश के सभी माध्यमों में सबसे ज्यादा जोखिम शेयरों में ही होता है। इसलिए जोखिम की पूरी मानसिक तैयारी के बिना इसमें कूद पड़ता ‘स्वास्थ्य के लिए हानिकारक’ है। आज चर्चा इलेक्ट्राल बनानेवाली कंपनी एफडीसी की। दवा उद्योग की कंपनी है। बल्क फार्मूलेशन और एंटी ऑक्सीडेंटऔरऔर भी

पहले नाम बड़ा था – गुजरात हैवी केमिकल्स लिमिटेड। अब छोटे में जीएचसीएल लिमिटेड हो गया है। 1988 से चल रही कंपनी है। रसायनों से लेकर टेक्सटाइल्स तक में सक्रिय है। 2009-10 में 1213.96 करोड़ रुपए की बिक्री पर 140.85 करोड़ रुपए का शुद्ध लाभ कमाया था। बीते वित्त वर्ष 2010-11 में दिसंबर तक के नौ महीनों में उसकी बिक्री 1051.05 करोड़ और शुद्ध लाभ 91.18 करोड़ रुपए रहा है। अगर ठीक पिछले बारह महीनों की बातऔरऔर भी

कोरोमंडल इंटरनेशनल दक्षिण भारत के मुरुगप्पा समूह की कंपनी है। फर्टिलाइजर, स्पेशियलिटी न्यूट्रिएंट व फसल बचाने के उत्पादों के साथ-साथ रिटेल के धंधे में भी है। 2007 में उसने दो रिटेल आउटलेट से शुरुआत की थी। अभी उसके पास आंध्र प्रदेश के ग्रामीण अंचल में 425 से ज्यादा रिटेल स्टोर हैं जहां खाद वगैरह के साथ ही कपड़े-लत्ते व रोजम्रर्रा की तमाम चीजें मिलती हैं। कंपनी फॉस्फेट खाद में देश की दूसरी सबसे बड़ी निर्माता है। मतलबऔरऔर भी

कॉरपोरेट दुनिया में हालात इतनी तेजी से बदल जाते हैं कि बहुत सावधान न रहिए तो चूक हो ही जाती है। हमने 17 जून 2010 को जब बसंत कुमार बिड़ला समूह की नामी कंपनी केसोराम इंडस्ट्रीज के बारे में लिखा था, तब उसका शेयर 328.95 रुपए पर था। शेयर की बुक वैल्यू इससे ज्यादा 335.97 रुपए थी। टीटीएम ईपीएस 51.88 रुपए तो शेयर मात्र 6.3 पी/ई अनुपात पर ट्रेड हो रहा था। लगा कि बिड़ला परिवार कीऔरऔर भी

ऐसी कंपनी जिसका नाम हो, लेकिन वह बदनाम न हो, उसके शेयरों में निवेश करना हमेशा सुरक्षित व लाभकारी होता है। आईएफबी इंडस्ट्रीज ने ऐसा ही नाम कमा रखा है, खासकर ऑटोमेटिक वॉशिंग मशीन में। वैसे, वह इसके अलावा भी कई उत्पाद बनाती है। उसकी छवि ऐसी बनी है जैसे वो कोई विदेशी कंपनी हो, जबकि हकीकत में वो एकदम देशी कंपनी है। हालांकि 1974 में उसकी शुरुआत स्विटजरलैंड की कंपनी हीनरिच श्मिड एजी के सहयोग सेऔरऔर भी

व्हर्लपूल ऑफ इंडिया का शेयर पिछले एक महीने में 18.87 फीसदी बढ़ा है। 21 मार्च को यह 243 रुपए था और 21 अप्रैल को 288.85 रुपए पर बंद हुआ है। साल भर पहले 22 अप्रैल 2010 को यह 172.55 रुपए पर था। उससे पहले 8 फरवरी 2010 को यह इससे भी नीचे 128 रुपए था। असल में यह शेयर 9 सितंबर 2010 को 338.50 रुपए का उच्चतम स्तर हासिल करने के बाद 2 फरवरी 2011 तक बराबरऔरऔर भी

सिर्फ बाजार भाव से नहीं पता चलता है कि कोई शेयर सस्ता है या नहीं। भाव बढ़ जाने के बावजूद वह सस्ता हो सकता है या महंगा। इसका पता इससे चलता है कि उसके मूल्यांकन का स्तर क्या है। और, मूल्यांकन का पैमाना है पी/ई अनुपात। यानी, बाजार भाव को उसके सालाना ईपीएस (प्रति शेयर लाभ) से भाग देने पर निकला अनुपात। आप कहेंगे कि यह तो अलग-अलग कंपनियों की बात हुई। कंपनियों के किसी सेट काऔरऔर भी

कुछ लोगों को यकीनन बुरा लग सकता है कि जिस कंपनी की शुद्ध बिक्री दिसंबर 2010 की तिमाही में 287.49 करोड़ रुपए रही हो, जिसने पिछले वित्त वर्ष 2009-10 में 812.26 करोड़ की शुद्ध बिक्री हासिल की हो, उसके शेयर को चिरकुट क्यों कहा जा रहा है। लेकिन आम निवेशक के नजरिए से मुझे रोहित फेरो-टेक लिमिटेड एक चिरकुट कंपनी लगती है और उसका शेयर भी एकदम चिरकुट। वह भी तब, जब इसका ठीक पिछले बारह महीनोंऔरऔर भी