व्हर्लपूल में यूं ही उठती रहती हैं लहरें

व्हर्लपूल ऑफ इंडिया का शेयर पिछले एक महीने में 18.87 फीसदी बढ़ा है। 21 मार्च को यह 243 रुपए था और 21 अप्रैल को 288.85 रुपए पर बंद हुआ है। साल भर पहले 22 अप्रैल 2010 को यह 172.55 रुपए पर था। उससे पहले 8 फरवरी 2010 को यह इससे भी नीचे 128 रुपए था। असल में यह शेयर 9 सितंबर 2010 को 338.50 रुपए का उच्चतम स्तर हासिल करने के बाद 2 फरवरी 2011 तक बराबर गिरता रहा। लेकिन 3 फरवरी को दिसंबर 2010 की तिमाही के अच्छे नतीजों की घोषणा के बाद इसमें बढ़त का सिलसिला शुरू हुआ है।

कंपनी 9 मई 2011 को वित्त वर्ष 2010-11 के सालाना नतीजे घोषित करेगी। उसी दिन कंपनी का निदेशक बोर्ड दस सालों में पहली बार लाभांश की भी घोषणा करने जा रहा है। हालांकि अनुमानित लाभांश की दर मात्र 10 फीसदी है यानी 10 रुपए अंकित मूल्य के शेयर पर मात्र एक रुपए। अभी तक की बात करें तो उसका ठीक पिछले बारह महीनों का ईपीएस (प्रति शेयर मुनाफा) 14.06 रुपए है और उसका शेयर इस समय 20.54 के पी/ई अनुपात पर ट्रेड हो रहा है। यूं तो यह थोड़ा महंगा है। लेकिन व्हर्लपूल जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनी के लिए इसे ठीकठाक माना जाएगा।

व्हर्लपूल ऑफ इंडिया लिमिटेड (बीएसई – 500238, एनएसई – WHIRLPOOL) की 126.87 करोड़ रुपए की इक्विटी में पब्लिक की हिस्सेदारी अपने न्यूनतम स्तर 25 फीसदी पर है। बाकी 75 फीसदी हिस्सा व्हर्लपूल मॉरीशस लिमिटेड के पास है। यह होता है महीन खेल टैक्स बचाने का। असल में मूल कंपनी, व्हर्लपूल कॉरपोरेशन (मिशिगन) अमेरिका की है। लेकिन चूंकि मॉरीशस के भारत की दोहरा कराधान निवारण संधि है। इसलिए वहां की कंपनियों को भारत में हासिल कैपिटल गेन्स पर कोई टैक्स नहीं देना पड़ता और मॉरीशस में कैपिटल गेन्स लगता ही नहीं तो कंपनी कैपिटल गेन्स से पूरी तरह बच जाती है। यह चालाकी होती है किसी भी विदेशी निवेशक या कंपनी की।

आपको बता दें कि मूल अमेरिकी कंपनी व्हर्लपूल कॉरपोरेशन भारतीय बाजार में अस्सी के दशक के आखिरी सालों में टीवीएस ग्रुप के साथ संयुक्त उद्यम बनाकर उतरी। इसने पहली उत्पादन इकाई पुडुचेरी में लगाई। 1995 में इसने केल्विनेटर का अधिग्रहण कर लिया और देश के रेफ्रिजरेटर बाजार में पहुंच गई। उसी साल उसने टीवीएस के साथ बने संयुक्त उद्यम में अपनी इक्विटी हिस्सेदारी बढ़ा दी। 1996 में केल्विनेटर व टीवीएस के संयुक्त उद्यम का विलय कर दिया और इस तरह अस्तित्व में आ गई व्हर्लपूल ऑफ इंडिया।

व्हर्लपूल क्या-क्या बनाती है, यह कंपनी आपको विज्ञापनों से बराबर बताती ही रहती है। लेकिन शायद आपको नहीं पता होगा कि वह दुनिया के 70 से ज्यादा देशों को अपने उत्पाद निर्यात करती है। वह दरअसल भारत से होम एप्लायंसेज की सबसे बड़ी निर्यातक है और उसे एक्सपोर्ट हाउस का दर्जा भी मिला हुआ है। कंपनी की तीन अत्याधुनिक फैक्ट्रियां फरीदाबाद (हरियाणा), तिरुभुवनाई (पुडुचेरी) और रंजनगांव (महाराष्ट्र) में हैं।

कंपनी बीते वित्त वर्ष की पहली तीन तिमाहियों में अच्छा लाभ कमाती रही है। उसका शुद्ध लाभ जून तिमाही में 38.87 फीसदी, सितंबर तिमाही में 22.54 फीसदी और दिसंबर तिमाही में 49.13 फीसदी बढ़ा है। 2009-10 में कंपनी की बिक्री 29.08 फीसदी बढ़कर 2219.23 करोड़ रुपए और शुद्ध लाभ 105.66 फीसदी बढ़कर 145.03 करोड़ रुपए हो गया था। 2010-11 की पहली तीन तिमाहियां तो यही बताती हैं कि चौथी तिमाही और पूरा साल भी इसी तरह अच्छा रहेगा।

कंपनी के साथ बस एक लोचा है कि इसमें पब्लिक की शेयरधारिता बहुत कम है। पब्लिक के हिस्से में आए 25 फीसदी में से एफआईआई की हिस्सेदारी 3 फीसदी और डीआईआई की हिस्सेदारी 6.62 फीसदी है। बाकी बचे 15.38 फीसदी। इसमें से भी 4.68 फीसदी शेयर एसबीआई म्यूचुअल फंड, एचडीएफसी ट्रस्टी कंपनी और अमांसा इनवेस्टमेंट्स के पास हैं। इस तरह उसका वास्तविक फ्लोटिंग स्टॉक बहुत कम हो जाता है। सो, इसमें वोल्यूम बहुत कम रहता है। जैसे, गुरुवार 21 अप्रैल 2011 को बीएसई में इसके मात्र 13,368 शेयरों के सौदे हुए जिसमें से 72.65 फीसदी डिलीवरी के लिए थे, जबकि एनएसई में हुआ वोल्यूम 29,294 शेयरों का था जिसमें से 44.30 फीसदी डिलीवरी के लिए थे।

खैर, इतना वोल्यूम हमारे-आप जैसे आम निवेशकों के लिए काफी है। कंपनी एफ एंड ओ (डेरिवेटिव्स) में नहीं है तो इसमें बहुत ज्यादा सट्टेबाजी की गुंजाइश नहीं है। कल को 75 फीसदी हिस्सेदारी वाले प्रवर्तक अगर इसे डीलिस्ट भी कराते हैं तो अच्छा-खासा दाम देकर जाएंगे। मेरी अपनी राय है कि 9 मई को नतीजे घोषित होने से पहले अंदाज लेने के लिए इसमें थोड़ा निवेश कर देना चाहिए। बाद की बाद में देखी जाएगी। आपकी क्या राय है? यह तो आप ही जानते हैं और आपके निवेश का फैसला भी उसी के हिसाब से होना चाहिए, मेरे या किसी और के कहने से नहीं।

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