कोरोमंडल:कमंडल में समाया भूमंडल

कोरोमंडल इंटरनेशनल दक्षिण भारत के मुरुगप्पा समूह की कंपनी है। फर्टिलाइजर, स्पेशियलिटी न्यूट्रिएंट व फसल बचाने के उत्पादों के साथ-साथ रिटेल के धंधे में भी है। 2007 में उसने दो रिटेल आउटलेट से शुरुआत की थी। अभी उसके पास आंध्र प्रदेश के ग्रामीण अंचल में 425 से ज्यादा रिटेल स्टोर हैं जहां खाद वगैरह के साथ ही कपड़े-लत्ते व रोजम्रर्रा की तमाम चीजें मिलती हैं। कंपनी फॉस्फेट खाद में देश की दूसरी सबसे बड़ी निर्माता है। मतलब बिजनेस मॉडल पूरा गठा हुआ है।

कंपनी ने हफ्ते भर पहले 21 अप्रैल को मार्च तिमाही व पूरे वित्त वर्ष 2010-11 के नतीजे घोषित किए। आप जानते ही है कि बाजार चूंकि साल की बाकी तीन तिमाहियों का हाल जान चुका होता है। इसलिए उसकी असली दिलचस्पी चौथी तिमाही के नतीजों में होती है। पता चला कि कोरोमंडल इंटरनेशनल की आय और लाभ दोनों ही मार्च 2011 की तिमाही में घट गए हैं। शेयर खटाक से करीब 10 फीसदी गिरकर 315 रुपए पर पहुंच गया। मंगलवार 26 अप्रैल को नीचे में 305.60 तक चला गया। हालांकि कल 27 अप्रैल को यह बीएसई (कोड – 506395) में 3.87 फीसदी बढ़कर 321.70 रुपए और एनएसई (कोड – COROMANDEL) में 4.24 फीसदी बढ़कर 321.95 रुपए पर बंद हुआ है।

मार्च तिमाही में कंपनी का धंधा घटा क्यों? इसकी कहानी बड़ी दिलचस्प है। असल में वह अपना प्रमुख कच्चा माल फॉस्फोरिक एसिड उत्तर अफ्रीकी देश ट्यूनीशिया से मंगाती है। लेकिन ट्यूनीशिया में राजनीतिक उपद्रव के चलते उसे ठीक से सप्लाई नहीं मिली। इसी दरम्यान बेमौसम की बारिश हो गई तो किसानों ने कम खाद खरीदी। तीसरे, सालाना रखरखाव के संयंत्र को बंद करने का जो काम कंपनी अमूमन जून की तिमाही में करती है, वो इसने इस बार मार्च तिमाही में ही कर दिया।

सोचिए, शेयर के भाव का कितना ताल्लुक सुदूर ट्यूनीशिया की राजनीति से लेकर घरेलू मौसम और कंपनी की अपनी योजनाओं से है। टिप्स, टेक्निकल एनालिसिस या चार्ट इन सब यथार्थ कारकों को नहीं देखते तो उन पर भरोसा करना किसी सड़कछाप ज्योतिषी को हाथ दिखाने जैसा है। इसलिए शेयर बाजार में निवेश से कमाना है तो हमें हर तरफ अपनी निगाह रखनी होगी।

खैर, ट्यूनीशिया में राजनीतिक उपद्रव और संयंत्र में शटडाउन के चलते कोरोमंडल इंटरनेशनल का खाद उत्पादन मार्च तिमाही में 10 फीसदी घट गया। परिचालन आय भी साल भर पहले की इसी तिमाही की तुलना में 14 फीसदी घटकर 1175 करोड़ रुपए पर आ गई। उसका परिचालन लाभ मार्जिन (ओपीएम) 9 फीसदी से घटकर 5 फीसदी पर आ गया। फिर सरकारी सब्सिडी के एवज में मिलनेवाले फर्टिलाइजर बांडों की बिक्री में कंपनी को 37 करोड़ रुपए का चूना लग गया।

परिचालन लाभ घटकर करीब-करीब आधा रह गया। लेकिन फर्टिलाइजर बांडों के लिए पहले किए गए मार्क टू मार्केट प्रावधान के चलते कंपनी के शुद्ध लाभ को ज्यादा चपत नहीं लगी। वह 12 फीसदी घटकर 72.62 करोड़ रुपए पर आ गया। आप देख रहे होंगे कि यहां बांडों पर मार्क टू मार्केट की बात आई है तो आपको बैंकिंग वगैरह की भी मोटामोटी समझ होनी चाहिए। हम अर्थकाम के जरिए यही कोशिश कर रहे हैं ताकि बाजार के निवेश का सारा परिदृश्य आपको साफ हो सके और आप किसी और के झांसे में आए बगैर अपने विवेक से निवेश का फैसला ले सकें।

अगर कोरोमंडल इंटरनेशनल पर वापस लौटें तो कंपनी का ईपीएस (प्रति शेयर लाभ) 24.66 रुपए है। शेयर भाव को इससे भाग दें तो पता चलता है कि यह 13.05 के पी/ई अनुपात पर ट्रेड हो रहा है। कंपनी का वितरण तंत्र दक्षिण भारत ही नहीं, पूर्वी उत्तर प्रदेश तक फैला हुआ है। इसलिए लंबे समय के लिए इसमें निवेश बुरा नहीं है। लेकिन पिछले साल भर में यह लगभग दोगुना रिटर्न दे चुका है। 4 मई 2010 को 150 रुपए पर था। 9 नवंबर 2010 को 373 रुपए तक चला गया। अभी 321 रुपए पर है। इसके रिटर्न के आगे सेंसेक्स पानी भी नहीं भर सकता। इसलिए हम तो यही कहेंगे कि निवेश करने से पहले इसके ताप को थोड़ा ठंडा होने दीजिए। बाकी पैसा आपका तो मर्जी भी आपकी।

हां, एक और कंपनी पर नजर डालिएगा। वो है – कोरोमंडल एग्रो प्रोडक्ट्स (बीएसई – 507543) जिसका 10 रुपए अंकित मूल्य के शेयर में ट्रेडिंग न के बराबर है। साल भर पहले उसका आखिरी भाव था 6.04 रुपए। हालांकि कंपनी बराबर सक्रिय है। दिसंबर 2010 की तिमाही में उसने 19.67 करोड़ रुपए की आय पर 1.16 करोड़ रुपए का शुद्ध लाभ कमाया है। कंपनी का ठीक पिछले बारह महीनों का ईपीएस 24.18 रुपए है। शेयर की बुक वैल्यू 131.27 रुपए है। इसके बावजूद यह शेयर क्यों डूबा हुआ है? उत्तर बहुत आसान है। क्या है? यह तो आप ही पताकर के बताएं तो अच्छा रहेगा।

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