अगर वित्तीय बाज़ार का कोई ट्रेडर अखबार या वेबसाइट से मिली किसी जानकारी को लाभ कमाने के मौके में न बदल सके तो उसका पढ़ना निरर्थक है। वैसे, बिजनेस अखबारों या चैनलों पर आई खबर चूसकर फेंक दी गई गन्ने की खोइया जैसी होती है। इसलिए कुछ अनुभवी ट्रेडर कहते हैं कि हमें दस मिनट से ज्यादा समय ऐसे अखबार पढ़ने पर नहीं जाया करना चाहिए। हेडलाइंस देखी और आगे बढ़ गए। वही लेख या समाचार पूराऔरऔर भी

वित्तीय बाज़ार में जानकार निवेशक या ट्रेडर को कोई सर्टिफिकेट नहीं देता, न ही कोई माला पहनाता है। बाजार से होनेवाली कमाई ही उसका सर्टिफिकेट है, उपहार है। इसलिए यहां किसी को खुद मियां-मिठ्ठू नहीं बनना चाहिए। अपनी सफलता का राग बघारना हद दर्जे की मूर्खता है। आप कितने सफल हैं, यह आपका बैंक या ट्रेडिंग खाता बता देता है। इससे यह भी पता चलता है कि अभी आपको अपनी जानकारी कितनी बढ़ानी और व्यावहारिक बनानी है।औरऔर भी

सिद्धांत कहता है कि कंपनी का शेयर उसके इन्ट्रिन्जिक या अंतर्निहित मूल्य से नीचे लेना बाज़ार से लाभ कमाने का सबसे सुरक्षित तरीका है। दुनिया के सबसे सफल निवेशक वॉरेन बफेट ने यही तरीका अपनाकर अरबों-खरबों कमाए हैं। लेकिन अपने यहां आज की हकीकत क्या है? बहुत सारे शेयर अपने अंतर्निहित मूल्य से काफी नीचे ट्रेड हो रहे हैं, जबकि तमाम हल्की कंपनियों के शेयर धन के प्रवाह की बदौलत आसमान छूते जा रहे हैं। देश-विदेश काऔरऔर भी

शेयर बाज़ार का निवेश हमारे-आप के लिए कभी खुशी तो कभी गम का मामला है। शेयर उछलता जाता है तो खुशी होती है, जबकि बहुत सोच-समझकर लिया गया शेयर भी जब डूबने लग जाए या डूबता चला जाए तो हमारा गम हद से पार चला जाता है। लेकिन हमारा धन उछले या डूबे, इससे हर हाल में ब्रोकरों, स्टॉक एक्सचेंजों, सरकार और यहां तक कि पूंजी बाज़ार नियामक संस्था, सेबी तक को बहुत खुशी होती है। कारण,औरऔर भी

शेयर बाज़ार के लिए देश की ब्याज दरों की कितनी अहमियत है, इसे इस तथ्य से समझा जा सकता है कि शेयरों का मूल्य निकालने के लिए दुनिया भर में स्वीकृत सीएपीएम (कैपिटल एसेट प्राइसिंग मॉडल) फॉर्मूले में सरकारी बांडों की ब्याज दर का इस्तेमाल किया जाता है। यह मॉडल रिस्क और रिटर्न के रिश्ते को जानने का मूलाधार है। साथ ही आप्शन प्राइसिंग का सूत्र भी ब्याज दर पर टिका है। इसके लिए बाकायदा ब्लैक-शोल्स फॉर्मूलाऔरऔर भी

ब्याज दरों की भ्रामक स्थिति का सीधा असर बैंकों व गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) पर पड़ना तय है। चूंकि निफ्टी-50 में बैंकिंग व वित्तीय सेवाओं का भार सबसे ज्यादा 37.17% है तो इसका असर सारे बाज़ार पर पड़ेगा। सरकारी बांडों में लगभग सारा का सारा निवेश बैंकों का है तो बांडों के दाम घटने से उन्हें इसका प्रावधान करना पड़ेगा। साथ ही लोगों की बचत खींचने के लिए बैंकों को डिपॉजिट पर ब्याज दर बढ़ानी पड़ेगी। इसकीऔरऔर भी

अपने यहां विचित्र स्थिति है। महीने भर पहले रिजर्व बैंक ने दस साल के सरकारी बांडों की नई सीरीज़ जारी की है, जिस पर सालाना ब्याज की दर 6.10% है। इन बांडों को ब्याज दरों का बेंचमार्क माना जाता है। इससे पहले की सीरीज़ में इन बांडों पर सालाना 5.85% ब्याज दिया जाता था। जाहिर है कि जब नए बांड पर 0.25% ज्यादा ब्याज मिलेगा तो पुराने बांडों की यील्ड भी बढ़कर उसके समतुल्य हो जानी चाहिए।औरऔर भी

देश में चल रही मुद्रास्फीति से जुड़ी होती है प्रचलित ब्याज की दर। धन की लागत या ब्याज दर से मुद्रास्फीति के असर को सम किया जाता है। नहीं तो ब्याज की वास्तविक दर निकालनी पड़ती है। इसे अमूमन धनात्मक होना चाहिए। यह अलग बात है कि आर्थिक सुस्ती से निपटने के लिए दुनिया के पांच देशों ने ब्याज की दर ही शून्य या ऋणात्मक रखी है तो वास्तविक ब्याज दर की बात करना ही निरर्थक है।औरऔर भी

किसी देश या अर्थव्यवस्था में नीतिगत ब्याज दर क्या है, सरकारी बांडों पर ब्याज की वर्तमान दर क्या है, बैंक कितने ब्याज पर उद्योग जगत को उधार देते हैं और रिटेल व थोक मुद्रास्फीति क्या चल रही है, इनका बड़ा गहरा रिश्ता शेयर बाज़ार समेत कमोडिटी व फॉरेक्स बाज़ार तक से होता है। इनसे देशी मुद्रा की विनिमय दर भी जुड़ी है। इसलिए बाज़ार में कितने डॉलर आएंगे, इससे भी इनका वास्ता होता है तो विदेशी बाजारऔरऔर भी

इतिहास के डिग्रीधारी शक्तिकांत दास 11 दिसंबर 2018 को जब से भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर बने हैं, तब से उन्होंने दो खास काम कर डाले। एक, उन्होंने रिजर्व बैंक की स्वायत्तता खत्म तक उसे केंद्र सरकार का दास बना दिया। दो, पहले मौद्रिक नीति अमूमन मंगलवार को आती थी, अब शुक्रवार को आने लगी है। उन्हें मौद्रिक नीति को संभालना कितना आता है, इसका अंदाज़ा इसी से लगा सकते हैं कि सात बार से उन्होंने ब्याजऔरऔर भी