विदेशी पोर्टपोलियो निवेशक (एफपीआई) तो प्रवासी पक्षियों की तरह हैं जहां अनुकूल मौसम जितने समय के लिए मिलेगा, वहां उतने समय के लिए चले जाएंगे। एफपीआई को कम से कम रिस्क में ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना है। उन्हें भारत से कोई विशेष अनुराग नहीं है। जहां ज्यादा मुनाफा मिलेगा, उधर का ही रुख कर लेंगे। जान लें कि भारत को अपने शेयर व वित्तीय बाज़ार की चमक बनाए रखने के लिए ज्यादा से ज्यादा एफपीआई कीऔरऔर भी

भारतीय शेयर बाज़ार के लिए विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) का बने रहना कितना अहमियत रखता है, इसका अंदाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि हमारा सालाना बजट अभी 39.45 लाख करोड़ रुपए का है, जबकि एफआईआई द्वारा भारत में प्रबंधित आस्तियां (ऐसेट अंडर कस्टडी या एयूसी) घटने के बावजूद फरवरी माह में 49.75 लाख करोड़ रुपए हैं जिसमें से 45.55 लाख करोड़ रुपए उन्होंने शेयर बाज़ार में लगा रखे थे। जनवरी में इनका एयूसी 52.13 लाख करोड़औरऔर भी

विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाज़ार से भागे जा रहे हैं। एनएसडीएल के आंकड़ों के मुताबिक इस मार्च महीने में 25 तारीख तक उन्होंने हमारे कैश सेगमेंट में 41,550 करोड़ रुपए की शुद्ध बिकवाली की है। जनवरी से जोड़ ले तो अब तक उन्होंने हमारे शेयर बाज़ार के कैश सेगमेंट से कुल 1,10,445 करोड़ रुपए निकाले हैं। वहीं, ऋण सेगमेंट या बांडों से उन्होंने इस दौरान मात्र 6141 करोड़ रुपए निकाले हैं। जानकार कहते हैं कि इसकी खासऔरऔर भी

विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) भले ही भारत की विकासगाथा को लेकर फिलहाल निराशा दिखा रहे हों। लेकिन हकीकत यह है कि हमारे आर्थिक विकास की संभावना अभी खत्म नहीं हुई है। इसकी मूल वजह है कि भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में शुमार है। यहां की 54 प्रतिशत आबादी 25 साल से कम उम्र की है और यह स्थिति 2035 से 2040 तक बनी रहेगी। काम करनेवाले ज्यादा, उनके ऊपर निर्भर लोग कम। भारत का यहऔरऔर भी

छह महीनों से भारतीय शेयर बाज़ार में लगातार बेच रहे विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक अब खरीद थोड़ा-थोड़ा बढ़ाने लगे हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध से लंदन मेटल एक्सचेंज में धातुओं व अन्य जिंसों के दाम तेज़ी से बढ़ गए तो एफपीआई ने मेटल स्टॉक्स में खरीद बढ़ा दी है। साथ ही सुरक्षित क्षेत्र जानकर वे हेल्थकेयर व एफएमसीजी सेक्टर की तरफ झुके हैं। सवाल उठता है कि आगे की राह क्या है? विदेशी निवेशक पहले भी भारतीय शेयर बाज़ार सेऔरऔर भी

जनवरी में एफआईआई के बेचने से आईटी व हेल्थकेयर कंपनियों के शेयर गिरते रहे, जबकि फरवरी में उनकी बिकवाली का दबाव आईटी कंपनियों पर कहर बरपाता रहा। पिछले दो महीनों के दौरान विदेशी संस्थाओं ने गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) में जमकर मुनाफावसूली की। इसका साफ असर एचडीएफसी जैसी मजबूत कंपनियों के शेयरों तक पर पड़ा। एफआईआई को लगता है कि रिजर्व बैंक नए वित्त वर्ष 2022-23 में 6-8 अप्रैल को होनेवाली पहली मौद्रिक समीक्षा में ब्याज दरऔरऔर भी

हमारी अर्थव्यवस्था का अच्छा हो या बुरा हो, आज के हालात में शेयर बाज़ार के लिए इसका कोई मतलब नहीं रह गया है। लेकिन विदेशी संस्थागत या पोर्टपोलियो निवेशक (एफआईआई/एफपीआई) अगर शेयर बाज़ार में खरीदने से ज्यादा बेचते हैं तो इसका सीधा असर बाज़ार के सूचकांक और स्टॉक्स पर पड़ता है। चिंता की बात यह है कि पिछले कुछ महीनों से एफआईआई भारतीय शेयर बाज़ार से निकलते जा रहे हैं। एनएसडीएल के डेटा के मुताबिक एफआईआई भारतऔरऔर भी

हमारे रिजर्व बैंक ने तो ब्याज दरों को मई 2020 से थाम रखा है। लेकिन अमेरिका के फेडरल रिजर्व ने दिसंबर 2018 से ब्याज दरें नहीं बढ़ाई थीं। हमारा भी मकसद है कि देश में उद्योग व उपभोक्ता को कम ब्याज पर धन मिल सके और निवेश बढ़ने के साथ खपत भी बढ़े। अमेरिका की भी यही सोच रही है। लेकिन अभी जो हालात हैं, उसमें हमारी अर्थव्यवस्था की हालत सुधरती नहीं दिख रही। रिजर्व बैंक नेऔरऔर भी

दुनिया भर का वित्तीय प्रवाह जहां से चलता है, उस अमेरिका ने ब्याज दर बढ़ा दी तो बाकी देशों में भी यह सिलसिला शुरू हो गया है। इसके अगले ही दिन ब्रिटेन के केंद्रीय बैंक, बैंक ऑफ इंग्लैंड ने ब्याज दर बढ़ा दी। हांगकाग ने भी ब्याज दर बढ़ा दी। दरअसल, दुनिया का हर प्रमुख देश ऐसा करेगा। नहीं तो वहां का धन निकलकर अमेरिका की तरफ भागेगा। अपने यहां भारत में रिजर्व बैंक ने 22 मईऔरऔर भी

बाज़ार जब तेज़ी पर था तो जिस भी कंपनी का शेयर खरीदो, अमूमन बढ़ ही जाता था। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। इसलिए हमें अपनी रणनीति बदलनी होगी. निवेश प्रकिया में बेहद सावधानी व अनुशासन बरतना होगा। मूलभूत नियम यह है कि उभरती व मजबूत बिजनेस आधार वाली कंपनी के शेयर जितना हो सके, उतने कम भाव पर खरीदें। बाज़ार में आई गिरावट से अच्छी कंपनियों के शेयर सस्ते में उपलब्ध करा दिए हैं। लेकिन इसऔरऔर भी