इंद्रियां हैं, हार्मोंस हैं, तभी जीवन है। नहीं तो मर गए समझो। मेलमिलाप, सुख-दुख इन्हीं से तो है। कोई इंद्रजीत नहीं। संत नहीं, ढोंगी हैं। हां, दुनिया-समाज को समझने के लिए अपने से बाहर निकलना पड़ता है जिसके लिए इंद्रियों का शमन करना पड़ता है।और भीऔर भी

जब आप एक ध्येय के साथ संघर्ष कर रहे होते हो, तब दरअसल आप अपने अंदर एक पात्रता पैदा कर रहे होते हो। इस पात्रता में इतना दम होता है कि समर्थन खुद ब खुद आपकी तरफ दौड़ा चला आता है।और भीऔर भी

जब तक आप इंद्रियों के जाल में फंसे हो, पुरुष स्त्री और स्त्री पुरुष को देखकर खिंचती है, खाने को देखकर लार टपकती है, तब तक आप बन रहे होते हैं, बड़े नहीं होते। वयस्क होने के बावजूद छोटे रहते हो।और भीऔर भी

आकर्षण तभी तक है जब तक हम में नया कुछ रचने की क्षमता है। स्थूल रूप में देखें तो सृजन की क्षमता खत्म होते ही चेहरे और शरीर की रौनक चली जाती है। सृजन और सामाजिक स्वीकृति में भी यही रिश्ता है।और भीऔर भी