विज्ञापन लोगों के मासूम मन को छलनेवाला ऐसा करतब है जिस पर नियामक बैठाने की बात तो बार-बार हुई है, लेकिन अभी तक कंपनियों व विज्ञापन जगत के नुमाइंदों से बने संगठन एएससीआई (एडवर्टाइजिंग स्टैंडर्ड काउंसिल ऑफ इंडिया) को पंच बनाकर रखा हुआ है जिसकी कमान एक क्लर्कनुमा सज्जन, एलन कोल्लाको को सालोंसाल से सौंप रखी है। यह तो वही बात हुई कि ठगों को ही ठगी को रोकने का थानेदार बना दिया। इसीलिए अक्सर लगता हैऔरऔर भी

बाजार इस समय जिस तरह हर दिन धड़ाम-धड़ाम गिर रहा है, उसमें हमारे-आप जैसे निवेशकों के लिए सबसे बेहतर यह होगा कि बिजनेस चैनलों को देखना बंद कर दें, अगले साल-डेढ़ साल के खर्चों के इंतजाम के लिए पर्याप्त धन बैंक एकाउंट में रख दें और इसके बाद वह अतिरिक्त धन अलग कर लें जिसे हम कई सालों के लिए निवेश कर सकते हैं बगैर इस बात की चिंता किए कि रोज़-ब-रोज़ उसमें कितनी घट-बढ़ हो रहीऔरऔर भी

कॉस्मो फिल्म्स कोई मरी-गिरी कंपनी नहीं है। 1981 में उसने देश में पहली बार बीओपीपी (बाय-एक्सिली ओरिएंटेड पॉलि प्रोलिपीन) फिल्म बनाने की शुरुआत की। इन फिल्मों का व्यापक इस्तेमाल पैकेजिंग व लैमिनेशन के काम में होता है। कंपनी थर्मल लैमिनेशन फिल्म भी बनाती है। उसकी दो उत्पादन इकाइयां औरंगाबाद (महाराष्ट्र) और कर्जण (गुजरात) में हैं। यूं तो कंपनी देश में भी माल बेचती है। लेकिन उसका मुख्य जोर निर्यात पर है क्योंकि अमेरिका व यूरोप से उसेऔरऔर भी

कंपनियों के सामने चुनौती होती है साल दर साल ही नहीं, हर तिमाही लगातार बढ़ते रहने की। कभी 15 तो कभी 20 फीसदी या इससे भी ज्यादा तो और भी अच्छा। किसी तिमाही झटका लगा तो हम-आप मुंह बनाने लगते हैं कि कैसी कंपनी है जो बढ़ती नहीं। निरंतर विकास की इसी जरूरत को पूरा करने के लिए वित्तीय बाजार, खासकर शेयर बाजार अस्तित्व में आया। लेकिन धीरे-धीरे यह लोगों की बचत को खींचने का नहीं, लूटनेऔरऔर भी

शेयरों के भाव किस हद तक ग्लोबल और किस हद तक लोकल कारकों से प्रभावित होते है, इसका तो ठीकठाक कोई पैमाना नहीं है, लेकिन इतना तय है कि आज के जमाने में कंपनियों के धंधे पर दोनों कारकों का भरपूर असर पड़ता है। इसीलिए शायद अंग्रेजी के इन दोनों शब्दों को मिलाकर नया शब्द ‘ग्लोकल’ चला दिया गया है। ये ग्लोकल असर कैसे कंपनी को कस लेते हैं, इसका एक उदाहरण है भारत की सबसे बड़ीऔरऔर भी

शेयर बाजार ही वह ठौर है जहां पहुंचाकर अपनी बचत को हम मुद्रास्फीति के क्षयकारी असर से बचा सकते हैं। चूंकि भारत सरकार की तरफ से सरकारी दामादों को छोड़कर किसी भी भारतीय को सामाजिक सुरक्षा नहीं मिली है, इसलिए हारी-बीमारी से लेकर बच्चो की पढ़ाई-लिखाई, शादी-ब्याज व अपने रिटायरमेंट तक के लिए हमें खुद ही बचाना पड़ता है। लेकिन सरकार शायद लंबे समय तक सामाजिक सुरक्षा दे भी नहीं सकती। यूरोप में तो थी व्यक्ति कोऔरऔर भी

बहुत सारी कंपनियां बहुत सारी वजहों से इल्लिक्विड हो जाती हैं। लेकिन बी ग्रुप की किसी अच्छी-खासी कंपनी में अगर बिना किसी वजह के दिन भर में केवल एक शेयर की खरीद-फरोख्त हो तो हमारे पूंजी बाजार नियामक, सेबी को जरूर सोचना चाहिए कि बाजार में ऐसा सन्नाटा क्यों है भाई? यहां बुरे का बोलबाला, अच्छे का मुंह काला क्यों है? दक्षिण भारत की कंपनी श्रीराम सिटी यूनियन फाइनेंस के साथ बीते हफ्ते यही हुआ। शुक्रवार, 2औरऔर भी

अच्छे लोग, बुरे लोग। अच्छी कंपनियां, बुरी कंपनियां। अब अगर आप निवेश के लिए किसी ईश्वर भुवन होटल्स जैसी गुमनाम कंपनी को चुनते हैं तो सचमुच ईश्वर ही आपका मालिक है। कंपनी आपकी बचत लेकर गधे के सिर से सींग की तरह गायब हो जाएगी। लेकिन क्या करें! हम तो फास्टफूड के आदी हो चुके हैं। सब कुछ पका-पकाया चाहिए। किसी ने बताया, टिप दी, खरीद लिया। डूब गए तो शेयर बाजार को लाख-लाख गालियां देने लगे।औरऔर भी

मैकनल्ली भारत इंजीनियरिंग कंपनी इस साल अपनी स्वर्ण जयंती बना रही है। कोलकाता के विलियमसन मैगर समूह की कंपनी है। 1961 से कार्यरत कंपनी का तंत्र बाहर तक फैला है। फ्रांस, रूस, पोलैंड, जर्मनी, चीन व यूक्रेन तक की कंपनियों से तकनीकी सहयोग समझौता है। दो साल पहले 2009 में इसने जर्मन कंपनी केएचडी हमबोल्ट वेडाग की कोयला व खनन टेक्नोलॉजी डिवीजन खरीद ली। हंगरी में भी इसकी सब्सडियरी है। लेकिन सारे तामझाम के बावजूद है यहऔरऔर भी

भारती एयरटेल ने अफ्रीका में 5 करोड़ से ज्यादा मोबाइल ग्राहक हासिल कर लिए हैं। कंपनी ने बुधवार को आधिकारिक तौर पर यह जानकारी दी। बता दें कि अफ्रीका में ग्राहकों को यह आधार उसे कुवैती टेलिकॉम कंपनी ज़ैन के अफ्रीकी कारोबार के अधिग्रहण से हासिल हुआ है। जून 2010 में उससे यह सौदा करीब 900 करोड़ डॉलर में किया था जिससे अफ्रीका के 15 देशों में उसकी पहुंच बन गई है। भारती एयरटेल इस समय एशियाऔरऔर भी