अपना-पराया
कोई भी घर-परिवार, देश या समाज अपना रह गया है या नहीं, इसकी एक ही कसौटी है कि वहां आप भय-मुक्त और निश्चिंत रहते हैं कि नहीं। जो आक्रांत करता है, वह अपना कैसे हो सकता है? वह तो बेगाना ही हुआ न!और भीऔर भी
कोई भी घर-परिवार, देश या समाज अपना रह गया है या नहीं, इसकी एक ही कसौटी है कि वहां आप भय-मुक्त और निश्चिंत रहते हैं कि नहीं। जो आक्रांत करता है, वह अपना कैसे हो सकता है? वह तो बेगाना ही हुआ न!और भीऔर भी
पुराने के भीतर नया पनपता रहता है। प्रकृति में पुराना हमेशा नए को जगह दे देता है। लेकिन समाज में पुराना अपनी जगह सहजता से छोड़ने को तैयार नहीं होता। इसलिए संघर्ष होता है, खून-खच्चर होता है।और भीऔर भी
प्रकृति और हमारे बीच मां-बच्चे का रिश्ता है। इसलिए उसे समझना और उसके हिसाब से ढलना मुश्किल नहीं होता। लेकिन समाज और उसके विभिन्न अवयवों को बगैर माथापच्ची के नहीं समझा जा सकता।और भीऔर भी
आकर्षण तभी तक है जब तक हम में नया कुछ रचने की क्षमता है। स्थूल रूप में देखें तो सृजन की क्षमता खत्म होते ही चेहरे और शरीर की रौनक चली जाती है। सृजन और सामाजिक स्वीकृति में भी यही रिश्ता है।और भीऔर भी
ठगों से भरी बस्ती में किसी पर विश्वास करना घातक है। तो क्यों न बस्ती ही बदल दी जाए? ऐसा संभव है क्योंकि सहज विश्वास मूल मानव स्वभाव है, जबकि ठगी समाज की देन है। और, समाज को बदला जा सकता है।और भीऔर भी
शरीर जरूरत से ज्यादा नहीं पचा सकता। इसी तरह कोई भी शख्स अपने पास जरूरत से बहुत-बहुत ज्यादा नहीं रख सकता। उसे अतिरिक्त संपदा को सामाजिक स्वरूप देना ही पड़ता है। यही प्रकृति का नियम है।और भीऔर भी
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