जन आंदोलनों से जरूरी सुधारों का माहौल भर बनता है, सुधार नहीं होते। सुधारों को पक्का करना है तो राजनीति में उतरना अपरिहार्य है। इसके बिना सारा मंथन झाग बनकर रह जाता है। गुबार जरूर निकल जाता है, लेकिन समाज में सुधरता कुछ नहीं।और भीऔर भी

सृजन व संगीत की मधुर स्वर लहरियां शांत मन से ही निकलती हैं। झंझावात से बवंडर ही उठते हैं। चीख-चिल्लाहट के माहौल में सृजन नहीं हो सकता। इसे यह कहकर जायज नहीं ठहराया जा सकता कि विनाश सृजन की जमीन तैयार करता है।और भीऔर भी