कभी फुरसत में कुछ भी नहीं होने की कल्पना कीजिए। एकदम सन्नाटा, कोई ख्याल नहीं। है न बड़ा मुश्किल! लेकिन यह शून्य बेहद अहम है। यह शून्य ही वो आखिरी अंक है जिसकी खोज हमने की। यह न होता तो आज दुनिया ज्ञान-विज्ञान में शून्य होती।और भीऔर भी

सारी दुनिया दौलत के पीछे भाग रही है। काम, काम, काम। भागमभाग। लगे रहो ताकि धन बराबर आता रहे। लेकिन इससे कहीं ज्यादा अहम है इसकी चिंता करना कि हम अपने घर-परिवार के साथ ज्यादा भावपूर्ण रागात्मक ज़िंदगी कैसे जी सकते हैं।और भीऔर भी

इस दुनिया में हम ही हम नहीं, दूसरे भी हैं तमाम। इसलिए यहां समझौते करके ही चलना पड़ता है। अपने अहम को गलाकर दूसरे को स्वीकार कर चलना पड़ता है। और, इसकी शुरुआत होती है परिवार से।और भीऔर भी

जब चील गुरुत्वाकर्षण को तोड़ दूर गगन से धरती का निरीक्षण कर सकती है, इंसान जब हज़ारों मील ऊपर जहाज उड़ा सकता है, तब हम अपने अहम व पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर सच को क्यों नहीं देख सकते।और भीऔर भी

ज्ञान अगर कर्म की सेवा न करे तो वह अपने अहम को संतुष्ट करने का साधन बनकर रह जाता है। दरअसल हर शिक्षा, विद्या या ज्ञान का काम यही है कि वह हमारे कर्मजगत की राहों को साफ-सुथरा बना दे।और भीऔर भी

चीजें तो जैसी हैं, वैसी ही रहती हैं। नियमों से बंधी, भावनाओं से रहित। सीधी-सरल, देखने की नजर हो पारदर्शी। लेकिन हमारा अहम, हमारे पूर्वाग्रह उसे जटिल बना देते हैं। रस्सी को सांप बना देते हैं।और भीऔर भी

ये अहम, ये ईगो हमारे अंदर का ऐसा ब्लैक होल है जो हमारा सब कुछ सोख कर बैठा रहता है। भ्रमों के जंगल से, माया के जाल से हमें निकलने नहीं देता। निकलने की कोशिश करते ही खींचकर पुनर्मूषको भव कर देता है।और भीऔर भी

इसे अहम कहें या आत्ममुग्धता, हम अपने में खोए और आक्रांत रहते हैं। खूंटे से बंधी गाय की तरह हमारा वृत्त बंध गया है। आम से लेकर खास तक, ज्ञानी और विद्वान तक अंदर के चुम्बक से पार नहीं पा पाते।और भीऔर भी