सेबी को सहारा से नाम जानने का पूरा हक

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को सहारा समूह की यह दलील खारिज कर दी कि उसकी जिन दो कंपनियों – सहारा इडिया रीयल एस्टेट कॉरपोरेशन और सहारा हाउसिंग इनवेस्टमेंट कॉरपोरेशन को पूंजी बाजार नियामक संस्था, सेबी ने पब्लिक से धन जुटाने से रोका है, उस पर सेबी का कोई अधिकार नहीं बनता और वे कंपनी रजिस्ट्रार के अधिकार क्षेत्र में आती हैं।

मुख्य न्यायाधीश एस एच कपाडिया की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा, “हम यह स्पष्ट करते हैं कि सेबी को इन कंपनियों के ओएफसीडी (ऑप्शनली फुली कनवर्टिबल डिबेंचर्स) के निवेशकों के नाम सहित सभी आवश्यक जानकारियां मांगने का हक है।” बता दें कि सेबी ने सहारा प्राइम सिटी के प्रॉस्पेक्टस में कुछ गलतबयानी के सिलसिले में सहारा समूह से ओएफसीडी इश्यू के निवेशकों का ब्यौरा मांगा था। लेकिन सहारा समूह ने उसे कोई जानकारी नहीं दी, जिसके बाद उसने 24 नवंबर को उक्त दो कंपनियों द्वारा पब्लिक से धन जुटाने पर बैन लगा दिया।

इसके बाद सहारा समूह इलाहाबाद हाई कोर्ट चला गया जिसने 13 दिसंबर को अंतरिम आदेश में सेबी के फैसले पर स्टे दे दिया। सेबी ने हाई कोर्ट के इसी आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी। सुप्रीम कोर्ट ने यह तो कहा कि सेबी को जांच का पूरा हक है। लेकिन कंपनियों को धन जुटाने से रोकने से उनसे इनकार कर दिया। हालांकि उसने कहा है कि इलाहाबाद हाई कोर्ट इस मसले पर 12 जनवरी से बिना किसी स्थगन के नियमित सुनवाई करे ताकि इसे जल्द से जल्द निपटाया जा सके। सेबी को हाई कोर्ट में 7 जनवरी तक अपना पक्ष पेश करना है।

बता दें कि सहारा समूह की उक्त दो कंपनियां निवेशकों से ओएफसीजी के जरिए 20-20 हजार करोड़ रुपए जुटा रही हैं। इसमें से वे कंपनी रजिस्ट्रार की सूचना के मुताबिक 4843.37 करोड़ रुपए जुटा भी चुकी हैं। सहारा समूह का दावा है कि उसने यह रकम गिने-चुने परिचित निवेशकों व कर्मचारियों के बीच प्राइवेट प्लेसमेंट से जुटाई है। लेकिन सेबी का कहना है कि उसके निवेशकों की संख्या किसी भी हालत में 50 से ज्यादा है। इसलिए ओएफसीडी के इश्यू को पब्लिक इश्यू माना जाएगा और कंपनी बिना सेबी की पूर्व मंजूरी के इसे जारी नहीं कर सकती।

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