रूठे क्यों हैं निवेशक?

।।किशोर ओस्तवाल।।

हमारे शेयर बाजार में रिटेल निवेशकों को झांसा देने का काम आज से नहीं, दसियों साल से हो रहा है। यही वजह है कि देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 35 फीसदी हिस्सा अब भी बचत के रूप में किनारे पड़ा हुआ है। क्यों? इसलिए कि रिटेल निवेशकों का पूंजी बाजार से भरोसा उठ गया है। सवाल उठता है कि रिटेल निवेशकों की यह हालत क्यों है, इसके लिए कौन जिम्मेदार हैं और उनके भरोसे को कैसे वापस लाया जा सकता है?

कड़वा सच यह है कि हमारे शेयर बाजार के कर्ता-धर्ता लोगों के लिए रिटेल निवेशक कभी महत्वपूर्ण रहे ही नहीं। शेयरों का सारा खेल विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई), घरेलू निवेशक संस्थाओं (डीआईआई) और अमीर लोगों (एचएनआई) तक सीमित है। स्टॉक एक्सचेंजों में हर दिन के कारोबार का 98 फीसदी हिस्सा एफआईआई, डीआईआई और एचएनआई से आता है। महज 2 फीसदी कारोबार आम भारतीय निवेशक करते हैं। डीमैट खातों की संख्या बमुश्किल 1.7 करोड़ तक पहुंची है। इसमें से भी सक्रिय खाते लगभग 35 लाख हैं। रिटेल निवेशकों के नाम पर बोगस डीमैट खाते खोलकर आईपीओ में कैसे घोटाला हुआ था, इससे आप सभी वाकिफ होंगे।

पहले तो ब्रोकर फर्म ऐसे फुटकर निवेशकों को तरजीह ही नहीं देती थी क्योंकि इन पर उन्हें तरह-तरह के अतिरिक्त खर्च उठाने पड़ते थे। ऑनलाइन ट्रेडिंग ने खेल के नियम बदल दिए हैं और अब फिर से इन निवेशकों पर ध्यान दिया जा रहा है। लेकिन बहुत सारे मसले हैं जिनके चलते ये निवेशक पूंजी बाजार को लेकर सहज नहीं हो पाते, उनका भरोसा कतई जमता ही नहीं। इसके लिए दोषी कौन है?

1996 के बाद से नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) और बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) ने लगभग 1500 कंपनियों में ट्रेडिंग रोक रखी है। इनमें निवेशकों के 58,000 करोड़ रुपए से ज्यादा फंसे पड़े हैं। एक्सचेंज कहते हैं कि इसके लिए ये कंपनियां दोषी हैं। लेकिन न तो पूंजी बाजार नियामक सेबी, न एक्सचेंज प्रशासन और न ही सरकार ने दोषी प्रवर्तकों के खिलाफ कठोर कार्रवाई कर निवेशकों को भरोसा लौटाने की जहमत उठाई है।

समस्या की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जहां बहुराष्ट्रीय कंपनियां स्टॉक एक्सचेंजों को भारी रकम चुकाकर अपने शेयरों को डीलिस्ट करा रही थीं, वहीं इन 1500 कंपनियों ने एकदम मुफ्त में अपने शेयरों को डीलिस्ट करा लिया और निवेशकों का सारा निवेश डूब गया। जब इन्हें डीलिस्ट कराया गया, तब तक तकरीबन सभी कंपनियों में प्रवर्तकों का हिस्सा घटकर एक फीसदी तक आ चुका था। मतलब, वे लोग पहले ही अपने शेयर बेचकर कमाई कर चुके थे।

फिर, एक्सचेंजों को किसी शेयर को इस ग्रुप से हटाकर उस ग्रुप में डालने की खूली छूट मिली हुई है। इसने निवेशकों को कैश सेगमेंट से डरा कर रख दिया है क्योंकि कब कौन-से शेयर में वोल्यूम खत्म हो जाए, भरोसा नहीं रहता। यहीं से हमारे शेयर बाजार एक खतरनाक धंधा शुरू हुआ है जबरन वोल्यूम पैदा करने का। निवेशक किसी शेयर में हुए कारोबार या वोल्यूम को निवेश के लिए एक तरह का बेंचमार्क मानते हैं। लेकिन अब तो प्रोफेशनल एजेंसियों की मदद से बाजार में झूठा वोल्यूम खड़ा करना अपवाद नहीं, नियम बन गया है। इसके ऊपर से जले पर नमक छिड़कने के लिए एक्सचेंजों ने ठंडे पड़े या इल्लिक्विड शेयरों की अलग श्रेणी ही बना डाली है जिनके लिए ब्रोकरों को चेतावनी दी जाती कि वे इन शेयरों में ट्रेड न करें। असल में एक्सचेंज पहले खुद किसी शेयर को इल्लिक्विड बनाते हैं। फिर निवेशकों में भय पैदा कर देते हैं। ऐसी तकरीबन 2000 कंपनियां हैं जिनके शेयर इल्लिक्विड हो चुके हैं।

ऐसे बहुतेरे उदाहरण हैं जिनसे साबित किया जा सकता है कि रिटेल निवेशक हमारे बाजार और नियामक संस्था के लिए आखिरी प्राथमिकता बन गए हैं। हमने डीएसक्यू, हिमाचल और पेंटामीडिया में निवेशकों को अपनी पूंजी गंवाते देखा है जिनमें प्रवर्तकों की हिस्सेदारी एक फीसदी तक पहुंच गई थी। छोटे निवेशकों के हित को ध्यान में रखते हुए ऐसा कानून क्यों नहीं बन सकता कि लिस्टेड कंपनी में प्रवर्तकों की हिस्सेदारी एक सीमा, मसलन 24 फीसदी से नीचे नहीं जा सकती? आखिर इसकी ऊपरी सीमा 75 फीसदी तो बनाई ही गई है न! अगर न्यूनतम सीमा को नियम होता तो सत्यम के प्रवर्तक निवेशकों को बेवकूफ नहीं बना पाते क्योंकि सत्यम के स्टॉक में 100 से 150 करोड़ डॉलर का मूल्य तो बचा रहता। इसके अभाव में घोटाले के उजागर होने पर निवेशकों को सत्यम का शेयर 6 रुपए तक में बेचना पड़ा।

बाजार में मार्केट मेकिंग पर कोई रेगुलेशन नहीं है। इनवेस्टमेंट/मर्चेंट बैंकर आईपीओ का बढ़ा-चढ़ा मूल्यांकन करते हैं और नतीजा रिटेल निवेशकों को भुगतना पड़ता है। रिलायंस पावर इसका सटीक उदाहरण है। अगर विकसित देशों की तरह हमारे यहां भी नियम होता कि आईपीओ के बाद कम से कम एक साल तक मार्केट मेकिंग अनिवार्य होगी और शेयर का भाव आईपीओ के मूल्य से 10 फीसदी से ज्यादा नहीं जाना चाहिए तो रिलायंस पावर जैसा वाकया हुआ ही नहीं होता।

अब अहम सवाल यह है कि निवेशकों के भरोसे को फिर से कायम करने के क्या उपाय हैं? बाजार की चाल-ढाल बदल रही है। ज्यादा से ज्यादा ब्रोकर रिटेल ग्राहकों को खींचने के लिए छोटे शहरों में अपने टर्मिनल लगा रहे हैं। वैश्विक बाजार हिल चुका है और ब्रोकरों के लिए एफआईआई ट्रेडर ज्यादा रिस्की होते जा रहे हैं। भारत सरकार तक को सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के शेयर भारी डिस्काउंट देने के बावजूद रिटेल निवेशकों को बेचने में दिक्कत आ रही है। इससे जाहिर होता है कि अभी ऐसा बहुत कुछ किए जाने की गुंजाइश है ताकि लोगों की बचत को पूंजी बाजार में लाया जा सकता है।

इल्लिक्विड स्टॉक्स को लिक्विड बनाने के उपाय किए जाने चाहिए। एनएसई क्रिसिल के जरिए एक रिसर्च करवा रहा है कि इल्लिक्विड शेयरों से निवेशकों को कैसे मुक्ति दिलाई जा सकती है। इस काम में लघु व मध्यम इकाइयों (एसएमई) तक पहुंच रखनेवाली दूसरी प्राइवेट रिसर्च फर्मों की भी मदद ली जानी चाहिए। शेयरों में फिल्टर की तब्दीली, सेगमेंट व लॉट साइज के बदलने जैसे कामों के लिए सुपरिभाषित नियम-कायदों के साथ स्वचालित निगरानी प्रणाली अपनाई जानी चाहिए। और, इससे निवेशकों को भलीभांति परिचित कराया जाना चाहिए ताकि वे समझदारी से शेयर रखने या बेचने का फैसला ले सकें।

कंपनी में प्रवर्तकों की न्यूनतम हिस्सेदारी का भी नियम बनाया जाना चाहिए। उन धूर्त किस्म के प्रवर्तकों पर भारी जुर्माना लगाना चाहिए जो लिस्टिंग समझौते को तोड़कर अपनी कंपनी के शेयरों में ट्रेडिंग सस्पेंड कराने की चाल चलते हैं। मर्चेंट बैंकरों को आईपीओ के मूल्य के लिए जवाबदेह बनाया जाए। इसके लिए आईपीओ के बाद 12 महीने अनिवार्य मार्केट मेकिंग के लिए न्यूनतम मूल्य तय किया जा सकता है। ऐसा होने पर आम लोगों की बचत, ट्रस्टों का धन, प्रोविडेंट फंड व दूसरे सरकारी फंड आईपीओ के जरिए पूंजी बाजार में आने लगेंगे क्योंकि निवेश की जोखिम पर लगाम लग चुकी होगी।

–  लेखक सीएनआई रिसर्च के चेयरमैन व प्रबंध निदेशक हैं।

4 Comments

  1. जानकारीपरक और महत्वपूर्ण पोस्ट, साधुवाद

  2. किशोर जी,
    अच्छा लेख। अगर भारत में नियम जनता के हित में बनाये जायें और सरकार सबसे, क्या नेता, क्या अभिनेता, क्या पूँजीपति और छोटे बड़े व्यापारी, और क्या आम जनता, उन जनहित के नियमों का पालन करवा सके तो विकास की गति कई गुना बढ़ जायेगी और लाभ निम्नतम स्तर तक पहुँचेगा। अनियमित विकास के लाभ से ज्यादा नुकसान हैं किसी भी देश के लिये। छोटे निवेशकों के निवेश को सम्मान देना उन्हे मुख्य धारा में लाना भी है और इन सब बातों का देश में कानून व्यवस्था और शांति स्थापित करने में बहुत बड़ा योगदान होता है। यह बात हरेक देश के लिये सच है और भारत भी इससे अलग नहीं है। बाजार से भ्रष्ट मानसिकता को दूर करना सरकार का काम है और ज्यादातर सरकारें उच्च स्तर के भ्रष्टाचार के सामने बेबस ही सिद्ध हुयी हैं चाहे वे किसी भी पार्टी की सरकारें क्यों न रही हों।

  3. who gives money to political parties to raise money for the campaign?

  4. A very good article

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