नोटों से बेड़ा गरक करेंगे बरनान्के!

कोई अपने फायदे के लिए नोट छापे तो गुनाह है। लेकिन केंद्रीय बैंक नोट पर नोट छापता जाए और दावा करे कि वह ऐसा देश और देश की अर्थव्यवस्था के कल्याण के लिए कर रहा है तो उसे सही मान लिया जाता है। अमेरिका के केंद्रीय बैंक, फेडरल रिजर्व के चेयरमैन बेन बरनान्के यही कर रहे हैं, किए जा रहे हैं। तीन महीने पहले 13 सितंबर को उन्होंने क्यूई-3 या तीसरी क्वांटिटेटिव ईजिंग की घोषणा की थी जिसके अंतर्गत तय किया था कि जब तक अमेरिका में नौकरियों की स्थिति बेहतर नहीं होगी, तब तक फेडरल रिजर्व हर महीने बाजार से 40 अरब डॉलर के बांड खरीदता रहेगा। अब 12 दिसंबर को फिर उन्होंने ऐलान कर दिया है कि फेडरल बैंक तब तक हर महीने 85 अरब डॉलर (पहले से 45 अरब डॉलर ज्यादा) के बांड खरीदता रहेगा, जब तक बेरोजगारी की दर कम से कम 6.5 फीसदी तक नहीं आ जाती। इसे क्यूई-4 या चौथी क्वांटिटेटिव ईजिंग कहा जा रहा है।

हालांकि खुद बरनान्के को क्यूई-4 की सफलता पर पूरा यकीन नहीं है। बुधवार, 12-12-12 को इस फैसले की घोषणा के बाद उन्होंने बड़े इंसानी अंदाज़ में कहा, “मुझे खुशी होती जो मेरे पास कोई जादू की छड़ी होती और मैं बेरोज़गारी की दर को 5 फीसदी तक नीचे ला पाता।” नोट करने की बात है कि अमेरिका के केंद्रीय बैंक की तिजोरी नोटों से पटी नहीं पड़ी हैं। बल्कि, वह हर महीने 85 अरब डॉलर के नोट छापकर खरीदे गए सरकारी बांडों के एवज में उन्हें अर्थव्यवस्था में डाल देगा। बरनान्के का मानना है कि इससे नई मांग पैदा होगी जिससे रोजागार के नए अवसर पैदा होंगे। लेकिन ज्यादा नोट कम उत्पाद व सेवाओं के बरख्श होंगे तो मुद्रास्फीति भी तो बढ़ सकती है? इस पर फेड चेयरमैन ने तय कर रखा है कि उनका क्यूई-4 तभी तक चलेगा, जब तक मुद्रास्फीति की दर 2.5 फीसदी की सीमा में रहती है।

फेडरल रिजर्व के चेयरमैन बरनान्के का कहना है कि वे ब्याज दरों को लगभग शून्य के स्तर पर बनाए रखना चाहते हैं। क्यूई-4 का एक मकसद यह भी है। जानकारों का सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या नोट छापकर किसी अर्थव्यवस्था को संकट से उबारा जा सकता है? अभी तक चले नोट छापने के तीन दौर ऐसा कोई कमाल तो दिखा नहीं पाए हैं। फिर क्यूई-4 के सफल होने की क्या गारंटी है? जब तक कोई अर्थव्यवस्था बड़े ठहराव की शिकार है, तब तक नोट छापकर डाल देने से शायद शेयरों के भाव तो बढ़ जाएं और बैंकरों के बोनस बढ़ जाएं, लेकिन अर्थव्यवस्था की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा।

हर महीने 85 अरब डॉलर के नए नोट छापने से फेडरल रिजर्व का मौद्रिक आधार बढ़ता रहेगा, उसकी बैलेंस शीट फैलती रहेगी। एक अर्थशास्त्री का आकलन है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था में माल व सेवाओं में एक डॉलर का इजाफा होगा तो फेडरल रिजर्व बैलेंस शीट में तीन डॉलर जुड़ जाएंगे। वहीं फेडरल रिजर्व की बैलेंस शीट में एक डॉलर बढ़ने पर सिस्टम में 10 डॉलर की अतिरिक्त उधारी पैदा होती है। इस तरह अमेरिकी सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में एक डॉलर का बढ़ना सिस्टम में 30 डॉलर की उधारी पैदा कर देगा। इस तरह अर्थव्यवस्था भले ही पटरी पर न आए, केंद्रीय बैंक का पेट फूलता जाएगा। छापे गए नोट बैंकिंग सिस्टम में जाते रहेंगे और ज्यादातर वहीं कहीं कोने-अंतरे में पड़े रहेंगे।

आखिर ऐसा कब तक चलेगा? क्या पता! शायद बरनान्के को पता होगा। लेकिन दुनिया में कमोडिटी बाजार के गुरु माने जानेवाले जिम रोजर्स की मानें तो बरनान्के को ‘न तो फाइनेंस की जानकारी है और न ही अर्थशास्त्र की। वे तो बस नोट छापना जानते हैं।’ रोजर्स का कहना है कि 2006 में जब से बरनान्के फेडरल रिजर्व बैंक के चेयरमैन बने हैं, तब से लेकर अब तक वे किसी भी मसले पर सही नहीं रहे हैं। लेकिन दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के केंद्रीय बैंक का चेयरमैन इतना गलत कैसे हो सकता है? हो सकता है कि अमेरिका को गर्त से निकालने का यही तरीका हो। भविष्य किसने देखा है? कल को बरनान्के ही सही निकल जाए तो!

वैसे इतिहास गवाह है कि 18वीं सदी की शुरुआत, 1715 में मूलतः स्कॉटलैंड के जुआरी किस्म के अर्थशास्त्री जॉन लॉ ने फ्रांस में वहां के शासक को नोट छापकर अर्थव्यवस्था सुधारने की करतब सुझाया था। इसके कुछ ही समय बाद फ्रांस की मुद्रा खाक में मिल गई और जॉन लॉ को देश छोड़कर भागना पड़ा था। अर्जेंटीना भी 1980 के दशक में ऐसे ही अनुभव से गुजर चुका है। मार्च 1990 आते-आते वहां कीमतें 20,000 फीसदी तक बढ़ गईं। तब की सरकार ने अवाम का ध्यान बंटाने के लिए फॉकलैंड द्वीप पर हमला कर दिया। ज़िम्बाब्वे में रॉबर्ट मुगाबे यही हिकमत आजमा चुके हैं और उन्होंने देश का बेड़ा कैसे गरक किया, यह सभी जानते हैं। अमेरिका में क्या होगा, कोई नहीं जानता। लेकिन अमेरिका में कुछ ऊंच-नीच हुआ तो वह अपने साथ सारी दुनिया को डुबा ले जाएगा क्योंकि उसके खजाने के तार चीन, जापान, जर्मनी, ब्रिटेन व फ्रांस ही नहीं, भारत समेत हर देश तक फैले हैं।

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