दूर तक मार मिर्ज़ा इंटरनेशनल की

कोई मानें या न माने, हम अब भी कहीं न कहीं दलितों व मुस्लिमों के प्रति सवर्ण और हिंदू मानसिकता से ग्रस्त हैं। नहीं तो क्या वजह है कि जिस मिर्ज़ा इंटरनेशनल का धंधा पिछले तीन सालों में 14.06 फीसदी और शुद्ध लाभ 115.60 फीसदी की सालाना चक्रवृद्धि दर से बढ़ा हो, उसका शेयर मार्च 2008 से लेकर मार्च 2012 तक घूम-फिरकर 20 रुपए के आसपास अंकड़ा क्यों पड़ा है? वैसे, इधर अचानक इस स्टॉक में सक्रियता बढ़ गई है। कल बीएसई में इस स्मॉल कैप कंपनी के 2.20 लाख शेयरों में ट्रेडिंग हुई है जिसमें से 38.33 फीसदी डिलीवरी के लिए थे, जबकि एनएसई में ट्रेड हुए 4.79 लाख शेयरों में से 49.30 फीसदी डिलीवरी के लिए थे।

मिर्ज़ा इंटरनेशनल मूलतः कानपुर की 33 साल पुरानी कंपनी है। उसका गठन 1979 में मिर्ज़ा टैनर्स प्रा. लिमिटेड के नाम से हुआ। चमड़े के जूते-चप्पल, जैकेट व दूसरे सामान बनाकर देश में बेचने के अलावा यूरोप, ब्रिटेन, मध्य-पूर्व व दक्षिण अफ्रीका के देशों को निर्यात करती है। देश से जूतों की सबसे बड़ी निर्यातक है और सरकार ने उसे निर्यात हाउस का दर्जा दे रखी है। चौंकानेवाली बात यह है कि लेदर उत्पादों का कच्चा माल, गाय का चमड़ा वह देश से नहीं जुटाती, बल्कि यूरोप से मंगाती है। उसका दो रुपए अंकित मूल्य का शेयर कल, 6 मार्च 2012 को बीएसई (कोड – 526642) में 20.10 रुपए और एनएसई (कोड – MIRZAINT) में 20.20 रुपए पर बंद हुआ है।

दिसंबर 2011 तक के नतीजों के आधार पर उसका ठीक पिछले बारह महीनों का ईपीएस (प्रति शेयर लाभ) 3.87 रुपए है। इस तरह उसका शेयर फिलहाल 5.19 के पी/ई अनुपात पर ट्रेड हो रहा है। यह शेयर मार्च 2008 में भी अधिकतम 20.10 रुपए तक गया था। लेकिन तब उसका पी/ई अनुपात, आप यकीन नहीं मानेंगे, 53.72 था। आज बाजार अगर इसे तब का एक चौथाई भाव भी देने लग जाए तो इसे 20 रुपए से बढ़कर 50 रुपए के ऊपर पहुंच जाना चाहिए। जानकारों का कहना है कि ऐसा अगले तीन-चार सालों में हो सकता है। फिलहाल इसकी समकक्ष कंपनियों में बाटा इंडिया का शेयर 16.72, रिलैक्सो फुटवियर का 14.04 और लिबर्टी शूज का शेयर 24.34 के पी/ई अनुपात पर ट्रेड हो रहा है।

मिर्ज़ा इंटरनेशनल ने 2010-11 में 478.38 करोड़ रुपए की बिक्री पर 39.18 करोड़ रुपए का शुद्ध लाभ कमाया और उसकी बिक्री साल भर पहले से 24.83 फीसदी ज्यादा थी, जबकि शुद्ध लाभ 108.63 फीसदी बढ़ गया था। चालू वित्त वर्ष 2011-12 में दिसंबर तक के नौ महीनों में वह 424.79 करोड़ रुपए की बिक्री पर 31.22 करोड़ रुपए का शुद्ध लाभ कमा चुकी है। इसमें से दिसंबर 2011 तिमाही में उसकी बिक्री 17.80 फीसदी बढ़कर 147.36 करोड़ रुपए और शुद्ध लाभ 24.08 फीसदी बढ़कर 13.09 करोड़ रुपए हो गया।

लेकिन इसमें 5.11 करोड़ रुपए का वह असामान्य लाभ शामिल है जो उसे ब्रिटेन की सब्सिडियरी में अपना हिस्सा बेचने से कर वगैरह चुकाने के बाद मिला है। अन्यथा, साल भर पहले की तुलना में उसका शुद्ध लाभ 24.36 फीसदी घट गया है। इससे पहले सितंबर तिमाही में भी उसका शुद्ध लाभ 0.97 फीसदी और जून तिमाही में 13.27 फीसदी घटा था। उसके शुद्ध लाभ में कमी ब्याज अदायगी के बढ़ने के चलते आई है। दिसंबर 2010 की तिमाही में उसने 4.59 करोड़ रुपए का ब्याज दिया था, जबकि दिसंबर 2011 की तिमाही में यह अदायगी 7.58 करोड़ रुपए हो गई। नहीं तो इस दरमियान उसका परिचालन लाभ मार्जिन (ओपीएम) 16.2 फीसदी से सुधरकर 17.1 फीसदी हो गया है।

क्या इस मुकाम पर मिर्ज़ा इंटरनेशनल में निवेश करना मुनासिब होगा? शायद हां, क्योंकि कर्ज वगैरह लेकर जितना विस्तार करना था, वह अब कर चुकी है। ग्रेटर नोएडा स्थित उसकी नई इकाई में व्यावसायिक उत्पादन शुरू हो चुका है। आगे जो भी खर्च होगा, वह आंतरिक प्राप्तियों से होगा। इसलिए कंपनी पर चढ़ा 131.09 करोड़ रुपए का कर्ज आगे बढ़ेगा नहीं, कम ही होगा। वैसे भी उसका ऋण-इक्विटी अनुपात अभी 0.73 है जिसे ज्यादा नहीं माना जा सकता। कंपनी के पास 159.99 करोड़ रुपए के रिजर्व हैं। इक्विटी 18.54 करोड़ रुपए है। इस तरह उसकी नेटवर्थ 178.53 करोड़ रुपए है जिसे कुल जारी शेयरों की संख्या, 9.27 करोड़ से भाग देने पर प्रति शेयर बुक वैल्यू 19.26 रुपए निकलती है जो शेयर के बाजार भाव 20.10 रुपए के एकदम करीब है।

हमारा मानना है कि इस वक्त कंपनी में कम से कम चार-पांच साल के नजरिए के साथ निवेश करना अच्छा रहेगा। कंपनी को काफी लंबा चलना है क्योंकि दुनिया के ज्यादातर विकसित देशों में चमड़े का काम पर्यावरण के सरोकारों के चलते बंद कर दिया गया है। लेकिन लोग लेदर के जूते व जैकेट पहनना तो छोड़ेंगे नहीं। इसलिए मिर्जा इंटरनेशल जैसी कंपनियों को बढ़ना ही है। दूसरे, कंपनी दुनिया के प्रमुख फुटवियर रिटेलरों को अपना माल सप्लाई करने के साथ-साथ रेडटेप व ओकट्रैक जैसे ब्रांडों के साथ खुद भी रिटेल बिक्री करने लगी है। इस समय भारत में उसके केवल 50 एक्सक्लूसिव स्टोर हैं। लेकिन उसकी योजना जल्दी ही इन स्टोरों की संख्या बढ़ाकर 300 तक पहुंचा देने की है।

कंपनी की 65.97 फीसदी इक्विटी प्रवर्तकों के पास है। इसमें से कोई भी शेयर उन्होंने गिरवी नहीं रखा है। एफआईआई ने इसमें निवेश नहीं कर रखा है, जबकि डीआईआई का निवेश 0.06 फीसदी के मामूली स्तर पर है। कंपनी के कुल शेयरधारकों की संख्या 26,730 है। इनमें से 25,812 शेयरधारक एक लाख रुपए से कम लगानेवाले छोटे निवेशक हैं, जिनके पास कंपनी के 22.99 फीसदी शेयर हैं। कंपनी में प्रवर्तकों के अलावा एक फीसदी से ज्यादा शेयर रखनेवाले इकलौते निवेशक चंदर भाटिया हैं जिनके पास उसके 1.35 फीसदी शेयर हैं। हां, कंपनी पिछले पांच सालों से हर साल बिलानागा लाभांश देती रही है। उसकी लाभांश यील्ड 2.48 फीसदी है।

1 Comment

  1. Kabhi Kanpur aana ho aapka toh bataiyega…aapko poori manufacturing unit dikhaunga…
    its out of the world…whatever you quoted is BANG ON !!!
    i agree….

    regards,
    Shishir

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