इसरो का एस-बैंड स्पेक्ट्रम निजी कंपनी को, लेफ्ट ने कहा: घोटाला

लेफ्ट पार्टियों ने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) और एक निजी कंपनी के बीच हुए करार को ‘नया घोटाला’ करार दिया है और इस मामले की गंभीरता से जांच किए जाने की मांग की है। खबरों के मुताबिक इसरो ने बिना कोई निविदा प्रक्रिया अपनाए एस-बैंड का दुर्लभ स्पेक्ट्रम एक निजी कंपनी को आवंटित कर दिया है।

सीपीएम के पॉलित ब्यूरो सदस्य सीताराम येचुरी ने राजधानी दिल्ली में संवाददाताओं के बताया, “यह एक नया मसला है। इसरो अंतरिक्ष विभाग के अंतर्गत आता है जो सीधे प्रधानमंत्री (मनमोहन सिंह) के अधीन है। यह एक नया घोटाला भी है।” सीपीआई के राष्ट्रीय सचिव डी राजा ने इस खुलासे को बहुत गंभीर मामला बताया है। आरएसपी के नेता अबनी रॉय ने इस नए घोटाले की जांच जेपीसी से कराने की मांग की है।

असल में अंग्रेजी अखबार ‘द हिंदू’ ने सोमवार के अंक में खबर छापी है कि नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) ने इसरो की व्यावसायिक इकाई एंट्रिक्स कॉरपोरेशन लिमिटेड और देवास मल्टीमीडिया प्राइवेट लिमिटेड के बीच वर्ष 2005 में हुए समझौते की जांच शुरू कर दी है। यह समझौता कंपनी के लिए दो उपग्रह प्रक्षेपित करने के मकसद से हुआ था।
अखबार के अनुसार, देवास मल्टी मीडिया को 20 साल की अवधि तक एस-बैंड स्पेक्ट्रम के 70 मेगाहर्ट्ज के अनियंत्रित इस्तेमाल से फायदा पहुंचता है और यह आवंटन बगैर किसी नीलामी के सीधे किया गया है। खबर कहती है कि कैग ने इस करार से सरकारी खजाने को दो लाख करोड़ रुपए का नुकसान पहुंचने का शुरुआती अनुमान लगाया है।

इस मसले पर कैग का कहना है कि अंतरिक्ष विभाग की कुछ गतिविधियों का ऑडिट अभी जारी है। लेकिन उसने यह साफ कर दिया कि इसरो और निजी कंपनी के बीच हुए करार में कथित घोटाला होने संबंधी मीडिया की खबरों को ऑडिट का ‘निष्कर्ष’ नहीं कहा जा सकता। कैग ने एक वक्तव्य में कहा कि अंतरिक्ष विभाग के ऑडिट संबंधी मीडिया में आई खबरों की ओर उसका ध्यान गया है।
कैग के अनुसार, ‘‘खबरों से ऐसा लगता होता है कि हमारा ऑडिट पूरा हो चुका है। कार्यालय स्पष्ट करता है कि अंतरिक्ष विभाग की कुछ गतिविधियों का ऑडिट अभी जारी है।’’ नियंत्रक और महालेखा परीक्षक के अनुसार, हमारी ओर से काफी शुरुआती सवालात उठाए गए हैं जिनका विभाग से जवाब मिलना बाकी है। चूंकि ऑडिट अभी शुरुआती चरण में है, लिहाजा किसी भी तरह की कल्पना करते हुए यह नहीं कहा जा सकता कि मीडिया की खबरों में दी गई जानकारी विभाग के निष्कर्ष हैं।

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