अल्बर्ट डेविड जैसे बूढ़ों को बख्श दें

बहुत-सी दवा कंपनियों के शेयर मूल्यांकन के लिहाज से इस समय सातवें आसमान पर चढ़े हुए हैं। मसलन, रैनबैक्सी अभी 92.88 के पी/ई अनुपात पर ट्रेड हो रहा है। इसी तरह एब्बट इंडिया 34.65, सिप्ला 24.77, ल्यूपिन 24, सनफार्मा 26.81 और डॉ. रेड्डीज लैब 23.22 के पी/ई अनुपात पर ट्रेड हो रहा है। ये सभी लार्ज कैप कंपनियां हैं। हालांकि पिरामल हेल्थकेयर भी लार्ज कैप कंपनी है। फिर भी उसका शेयर 13.18 के पी/ई पर ट्रेड हो रहा है। वहीं, दूसरी तरफ स्मॉल कैप व मिड कैप दवा कंपनियों में एल्डर फार्मा का शेयर 9.13 व अलेम्बिक फार्मा का शेयर 8.33 के पी/ई पर ट्रेड हो रहा है तो प्लेथिको फार्मा का 48.68 के पी/ई अनुपात पर। इसलिए किसी सेक्टर के बारे में आम राय के साथ कंपनी विशेष के बारे में खास राय बनानी जरूरी है।

आज चर्चा दवा उयोग की एक स्मॉल कैप कंपनी अल्बर्ट डेविड लिमिटेड की। 1938 में बनी कोलकाता की कंपनी है। ए के कोठारी इसके चेयरमैन व प्रबंध निदेशक है। मुख्य रूप से फार्मा फॉर्मूलेशन, बल्क ड्रग, डिस्पोजेबल सीरिंज व नीडल बनाती है। चार इकाइयां कोलकाता, गाज़ियाबाद, मंडीदीप और बैंगलोर में हैं। दुनिया में अमीनो एसिड की सबसे बड़ी निर्माता जापानी कंपनी अजीनोमोटो के साथ गठबंधन है। डिस्पोजेबल सीरिंज व नीडल के लिए उसने जर्मन कंपनी फार्मा प्लान के साथ तकनीकी समझौता कर रखा है। कंपनी अपने उत्पाद वियतनाम, रूस, मिस्र, बांग्लादेश, दक्षिण अफ्रीकी देशों, ब्राजील, अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, हॉलैंड व जर्मनी जैसे देशों को निर्यात भी करती है। वह विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की अनुमोदित सप्लायर भी है।

लेकिन इधर अल्बर्ट डेविड के दिन अच्छे नहीं चल रहे। पिछले तीन सालों में उसकी बिक्री 11.69 फीसदी और शुद्ध लाभ 13.93 की सालाना चक्रवृद्धि दर से ही बढ़ा है। बीते वित्त वर्ष 2010-11 में उसकी बिक्री 7.78 फीसदी बढ़कर 220.43 रुपए और शुद्ध लाभ 5.65 फीसदी बढ़कर 10.85 करोड़ रुपए पर पहुंच गया। यह ठंडापन इस साल बढ़ता गया है। जून 2011 की तिमाही में उसकी बिक्री 9.72 फीसदी बढ़कर 59.17 करोड़ रुपए हो गई, लेकिन शुद्ध लाभ 66.21 फीसदी घटकर महज 99 लाख रुपए पर आ गया। सितंबर 2011 तिमाही के नतीजे उसने इसी महीने 7 नवंबर को घोषित किए हैं जिसके अनुसार उसकी बिक्री 6.50 फीसदी घटकर 63.27 करोड़ और शुद्ध लाभ 28.30 फीसदी घटकर 4.46 करोड़ रुपए पर आ गया।

इन खराब नतीजों ने अपना वाजिब असर अल्बर्ट डेविड के शेयरों पर भी दिखाया है। उसका दस रुपए अंकित मूल्य का जो शेयर साल भर पहले 12 नवंबर 2010 को 177 रुपए के शिखर पर था, वह कल 17 नवंबर 2011 को 90 रुपए की घाटी तक जा गिरा है। उसके शेयर केवल बीएसई में ही लिस्टेड हैं और कल वे (कोड – 524075) कुल 5.16 फीसदी की गिरावट के साथ 91 रुपए पर बंद हुए हैं। कंपनी की कुल इक्विटी 5.71 करोड़ रुपए है जिसका 38.85 फीसदी पब्लिक और बाकी 61.15 फीसदी हिस्सा प्रवर्तकों के पास है। कंपनी का ऋण/इक्विटी अनुपात 0.77 के ठीकठाक स्तर पर है।

सवाल उठता है कि क्या इस स्तर पर अल्बर्ट डेविड में निवेश का योग बनता है या जिन्होंने इसमें पहले से निवेश कर रहा है, उन्हें भी अब निकल लेना चाहिए? सितंबर 2011 के नतीजों को मिलाकर उसका ठीक पिछले बारह महीनों (टीटीएम) का ईपीएस (प्रति शेयर लाभ) 12.54 रुपए है और उसका शेयर फिलहाल 7.26 के पी/ई अनुपात पर ट्रेड हो रहा है। बाजार भाव 91 रुपए है। लेकिन 65.20 करोड़ रुपए के रिजर्व के दम पर उसकी बुक वैल्यू 124.19 रुपए है। कंपनी पिछले पांच सालों से लाभांश भी बराबर दे रही है। पिछला लाभांश दस रुपए पर 4.50 रुपए यानी 45 फीसदी का रहा है। इन आंकड़ों को देखने से लगता है कि इसमें लंबे समय के लिए निवेश कर देना चाहिए।

लेकिन दिसंबर 2010 की तिमाही के बाद से कंपनी का धंधा जिस ढलान पर गिर रहा है, उसने इसमें निवेश का जोखिम काफी बढ़ा दिया है। इसका शेयर पिछले पांच सालों में ज्यादा से ज्यादा 11.17 के पी/ई अनुपात पर ट्रेड हुआ है, जबकि नीचे में 2.78 के पी/ई तक। इसलिए यह बढ़कर 140 रुपए और घटकर 35 रुपए तक जा सकता है। यह सच है कि भारत 2015 तक दुनिया के दस सबसे बड़े फार्मा बाजार में शामिल हो जाएगा। दवा कंपनियों में निवेश काफी सुरक्षित भी माना जाता है। लेकिन ठहराव ही नहीं, गिरावट की शिकायर अल्बर्ट डेविड जैसी पुरानी कंपनी से इस वक्त दूरी बनाना ही बेहतर है। ऊपर से यह केवल बीएसई में लिस्टेड है तो लिक्विडी की भी दिक्कत है। हो सकता है कि खरीद लिया तो बेचना मुश्कल हो जाए। फिर भी जो लोग अखाड़े में बूढ़ों पर दांव लगाना चाहते हैं तो उनकी मर्जी।

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