बीमाधारक की शिकायत तीन दिन से दो हफ्ते में सुलझेगी, बना नया नियम

यूलिप पर पूंजी बाजार नियामक संस्था सेबी और बीमा नियामक संस्था आईआरडीए (इरडा) की तकरार का नतीजा भले ही कानून बनाकर इरडा को बचाने के रूप में सामने आया हो, लेकिन इसने इरडा को पॉलिसीधारकों के प्रति ज्यादा जबावदेह बनने को मजबूर कर दिया है। वह लगातार नए-नए कदम उठा रही है। ताजा दिशानिर्देश में उसने तय किया है कि जीवन बीमा और साधारण बीमा कंपनियों को पॉलिसीधारकों की शिकायतों की निपटारा तीन दिन से लेकर दो हफ्ते के बीच में कर देना होगा। नए दिशानिर्देश 1 अगस्त 2010 से लागू हो जाएंगे।

इरडा ने सभी जीवन बीमा व साधारण बीमा कंपनियों को बुधवार को भेजे पत्र में दिशानिर्देश का पूरा ब्योरा दिया है। इसमें शिकायत की परिभाषा से लेकर उसे सुलझाने की समय सीमा और पॉलिसीधारक की संतुष्टि तक का लेखाजोखा दिया गया है। पहली बात तो यह तय की गई है कि हर बीमा कंपनी को शिकायत निवारण की स्पष्ट नीति निदेशक बोर्ड से स्वीकृत कराने के बाद इरडा के पास भेजनी होगी। दूसरे, शिकायतों को निपटाने का जिम्मा कंपनी के किसी ऐरे-गैरे अधिकारी को नहीं सौंपा जा सकता। यह या तो सीईओ होगा या कम्प्लायंस ऑफिसर। इसके अलावा बीमा कंपनी को अपने हर ऑफिस में शिकायतों पर निगरानी के लिए एक अलग अधिकारी रखना होगा।

शिकायतों के निस्तारण के समय में बारे में बीमा नियामक ने कुछ साफ-साफ प्रावधान किए हैं। बीमा कंपनी को शिकायत मिलने के तीन कामकाजी दिनों के भीतर पॉलिसीधारक को इसकी लिखित पावती भेजनी होगी जिसमें बनाना होगा कि अमुक अधिकारी उसकी शिकायत पर गौर कर रहा है। आम तौर पर शिकायत का निस्तारण तीन दिन में हो जाना चाहिए। अगर ऐसा होता है तो पावती के साथ इसकी सूचना भेज देनी होगी। लेकिन अगर ऐसा नहीं होता तो दो हफ्ते के भीतर कंपनी पॉलिसीधारक की शिकायत को दूर कर उसे इसकी सूचना भेजेगी। अगर पॉलिसीधारक समाधान से संतुष्ट नहीं हुआ तो कंपनी को उसे बताता होगा कि वह आगे क्या कर सकता है। साथ ही पॉलिसीधारक से लिखित रूप से लेना होगा कि उसकी समस्या हल हो चुकी है।

अगर बीमा कंपनी को आठ हफ्ते के भीतर पॉलिसीधारक की तरफ से कोई जवाब नहीं मिलता, तभी माना जाएगा कि शिकायत का हल हो चुका है और वह समाधान से संतुष्ट है। इरडा का कहना है कि अगर कोई कंपनी शिकायत निस्तारण के लिए मुकर्रर समय और तरीके का पालन नहीं करती तो उस पर पेनाल्टी लगाई जाएगी। कंपनी को शिकायत दर्ज कराने के लिए फोन से लेकर ई-मेल तक की सुविधा देनी होगी और सारी शिकायतों का विवरण अपनी वेबसाइट पर साफ-साफ पेश करना होगा। साथ ही हर बीमा कंपनी को कॉरपोरेट गवर्नेंस से जुड़े इरडा के पूर्व-घोषित दिशानिर्देशों के मुताबिक अलग से पॉलिसीहोल्डर प्रोटेक्शन कमिटी (पीपीसी) बनानी होगी।

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